ग़ज़ल
उनको भी इस जहान की परवाह नहीं है
हमको भी अपनी जान की परवाह नहीं है
उनको भी इस जहान की परवाह नहीं है
हमको भी अपनी जान की परवाह नहीं है
नोवेल की हर हसीन कहानी में लिखा था
आशिक को इम्तिहान की परवाह नहीं है
आशिक को इम्तिहान की परवाह नहीं है
वो भी मेरे बगैर नहीं जी सकेगा पर
धरती को आसमान की परवाह नहीं है
धरती को आसमान की परवाह नहीं है
इस तौर मुझ को देख के मुह फेरते हैं वो
जैसे किसी की जान की परवाह नहीं है
दिल है हसीन शाम है और मयकदा भी है
शाइर को अब मकान की परवाह नहीं है
उनकी नजर को देख के लगता है हमें अब
तीरों को भी कमान की परवाह नहीं है
तीरों को भी कमान की परवाह नहीं है
जिनको लहू से सींचा वही हमसे खफा हैं
फूलों को बागबान की परवाह नही है
फूलों को बागबान की परवाह नही है
जिन की जबान बंद है क्यूँ आप उन्हीं से
कहते हो बेजुबान की परवाह नहीं है
दिल की करे तो आज भी कहता है जमाना
लङकी को खानदान की परवाह नहीं है
उनका सलूक ऐसा है जैसे कि घरों में
पैरों को पायदान की परवाह नहीं है
पैरों को पायदान की परवाह नहीं है
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