Monday, April 11, 2022

उनको भी इस जहान की परवाह नहीं है

 ग़ज़ल 
उनको  भी  इस जहान की परवाह नहीं है 
हमको भी अपनी जान की परवाह नहीं है

नोवेल की हर हसीन कहानी में लिखा था 
आशिक  को  इम्तिहान  की परवाह नहीं है 

वो  भी  मेरे  बगैर   नहीं  जी   सकेगा  पर 
धरती  को  आसमान  की  परवाह  नहीं है

इस  तौर  मुझ को देख के मुह फेरते हैं वो 
जैसे  किसी  की  जान  की परवाह नहीं है

दिल है हसीन शाम है और मयकदा भी है 
शाइर  को  अब मकान की परवाह नहीं है

उनकी नजर को देख के लगता है हमें अब  
तीरों  को  भी  कमान  की परवाह नहीं है

जिनको लहू  से सींचा वही हमसे खफा हैं 
फूलों   को  बागबान  की   परवाह  नही है

जिन  की  जबान  बंद है क्यूँ आप उन्हीं से
कहते   हो   बेजुबान  की  परवाह  नहीं  है

दिल की करे तो आज भी कहता है जमाना
लङकी  को  खानदान  की  परवाह  नहीं है

राजीव कुमार

उनका  सलूक   ऐसा  है  जैसे  कि घरों में 
पैरों   को   पायदान   की  परवाह  नहीं  है

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