भोजपुरी ग़ज़ल
जाति धरम के भाव से अब काम ना चली
हमनी के ए दुराव से अब काम ना चली
अच्छा समाज एक आ दू दिन बनी ना
नेतागीरी के दाव से अब काम ना चली
हिन्दू मुसलमां सिक्ख इसाई के नाम पर
ए आपसी कटाव से अब काम ना चली
अन्याय जुल्म हार या अवसाद के नियर
बेकार के दबाव से अब काम ना चली
सोचे नी हमहूं देख के ई मतलबी समाज
भगवान ए रचाव से अब काम ना चली
महंगाई द्वेष भूख रोजगार गरीबी
जनता प एतना घाव से अब काम ना चली
बोली में अउर कुछ रहे करनी में अउर कुछ।
बाबू जी ए सुभाव से अब काम ना चली
राजीव कुमार
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