Monday, April 11, 2022

इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

 इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

तुमको बुला रहे हैं ये खिलते हुए बुरांश


इस तौर सुर्ख रू हैं ये जंगल की वादियां ।

जैसे हों इनके बीच में जलते हुए बुरांश।


देना है क्या मिसाल लबो रुख को आपके

बतला रहे हैं आज ये हँसते हुए बुरांश


कंकङ चुभे न आपके पांवों में इस लिये  

शाखों से गिर गये हैं ये बिखरे हुए बुरांश


वादी ए नैनीताल की दिलकश जमीन पर

रक्खे हैं आप के लिये महके हुए बुरांश 


राजीव कुमार

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