इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश
तुमको बुला रहे हैं ये खिलते हुए बुरांश
इस तौर सुर्ख रू हैं ये जंगल की वादियां ।
जैसे हों इनके बीच में जलते हुए बुरांश।
देना है क्या मिसाल लबो रुख को आपके
बतला रहे हैं आज ये हँसते हुए बुरांश
कंकङ चुभे न आपके पांवों में इस लिये
शाखों से गिर गये हैं ये बिखरे हुए बुरांश
वादी ए नैनीताल की दिलकश जमीन पर
रक्खे हैं आप के लिये महके हुए बुरांश
राजीव कुमार
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