ग़ज़ल
दिल से लिब्रल हैं सख्त हो जायें?
क्या करें हम भी भक्त हो जायें?
दिल की दुनिया उजाड़ कर हम भी
बोलो वहसत परस्त हो जायें ?
जैसे मेरे हुए हैं वैसे ही
सबके अरमान ध्वस्त हो जायें।
काम कोई नहीं मगर हमसे
लोग कहते है व्यस्त हो जायें
ये जो दुनिया है छोङिये इसकी
आईये खुद में मस्त हो जायें
इश्क़ वो इश्क़ ही नहीं जब तक
बहते आंसू न रक्त हो जायें
जिसने ठुकरा दिया उसी की हम
उम्र भर क्युं गिरफ्त हो जायें
जितने आशिक हैं सब बने शाइर
सारे पौधे दरख्त हो जायें
राजीव कुमार
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