Monday, October 5, 2020

कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

 ग़ज़ल


कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

हमारे मुल्क़  की तस्वीर है ये


तरक्की के लिये फिरका परस्ती

 समझिये पांव की जंजीर है ये


मेरी आदत है जो सच बोलने की

मेरी गर्दन पे इक शमशीर है ये


कुआँ तालाब पीपल नीम तुलसी

हमारे गांव की तस्वीर है ये


जेहालत मुफ़लिसी बेरोजगारी 

हमारी आपकी तकदीर है ये


अजीब इन्सान है दुश्मन हमारा 

हमारे ग़म से भी दिलगीर है ये

(दिलगीर-उदास)


तुम्हारा हुस्न सर से पा सरापा 

मेरी जां सच कहूं कश्मीर है ये 


वतन सबका है पर ये मत समझना

किसी के बाप की जागीर है ये


राजीव कुमार

ख़ुद के खिलाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं

 ग़ज़ल 


ख़ुद के खिलाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं 

इतना भी साफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


कहते हैं आफताब है दुनिया की नाफ़ तो

मेरे तवाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


जो सर उठा के देख सके दूर की यहाँ 

ऐसा जिराफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


सच बोलना गुनाह अगर है तो माई लार्ड 

हम सब में माफ़ कौन है कोई भी तो नही


ख़ुद को तबाह करके हसे जो मेरी तरह 

बुद्धि से हाफ़ कौन है कोई भी तो नहीं


राजीव कुमार


नाफ़- धूरी (जिसके चारो तरफ चक्कर  लगाते है)

तवाफ़- चक्कर लगाना

बेहतर को बेहतरीन बनाने की एक ज़िद

 ग़ज़ल 


बेहतर को बेहतरीन बनाने की एक ज़िद

आदम को है मशीन बनाने की एक ज़िद


शाइर बने तो बनते ही इस दिल में बन गयी

हर वाक़िए को सीन बनाने की एक ज़िद


नफ़रत कहीं न हमको मिटा दे सो इश्क़ पर

पैदा करो यक़ीन बनाने की एक ज़िद


हर बार तू ही साँप बनेगा तो मुझे भी 

है यार आस्तीन बनाने की एक ज़िद


इक नौजवां का नौकरी पाना इस अहद में

सागर पे है ज़मीन बनाने की एक ज़िद


चैनल हमारे मुल्क़ के पाले हुए हैं अब 

सबको तमाशबीन बनाने की एक ज़िद


शाइर गुलाम रिन्द सभी बन चुके हैं हम

ख़ुद को है अब मतीन बनाने की एक ज़िद


इक रोज मेरे बाद कहोगे जहान को

मुझमें ही थी ज़हीन बनाने की एक ज़िद


राजीव कुमार


मतीन - जिसमें मतानत हो, गंभीर, धीर, शांतचित्त, संजीदः ।

हर सम्त हो रही है क़ज़ा रोक दीजिये

 ग़ज़ल 


हर सम्त हो रही है क़ज़ा रोक दीजिये 

गर आप हैं ख़ुदा तो वबा रोक दीजिये

(क़ज़ा - मृत्यु , वबा - महामारी )


रो रो के कह रहे हैं सज़ा रोक दीजिये 

मत कीजिए हम सबको जुदा रोक दीजिये


अब और आँधियों का सितम सह न पाएगा

अब चीख़ने लगा है दिया रोक दीजिये


तन्हा रहे तो जल्द ही मर जायेगे सभी 

तन्हाई में रहने की दवा रोक दीजिये।


चाहत वफ़ा ख़ुलूस नहीं है तो न सही 

मत कीजिए अब और जफ़ा रोक दीजिये


छाई हुई हैं वहशतें पहले ही शह्र पर 

उस पर ये बारिशें ये हवा रोक दीजिये


वीरान हो रहा है महकता हुआ चमन

बेनूर हो रही है फ़ज़ा रोक दीजिये।


राजीव कुमार

खेत बगइचा गइया गोरू गांव के मंदिर पिपरा ले।

 भोजपुरी ग़जल


खेत  बगइचा  गइया  गोरू   गांव  के मंदिर पिपरा ले।

सब कुछ पूछ रहल बा जैसे लौट के अइबा कहिया ले।


रोजो    माई   बोले  सबसे  फोन  लगा  दा   बाबू   के।

आंख से हमरे लउकत नइखे फोन के अब नम्बरवा ले।


शहर   बजारे  मेला  तीरथ  घुमा  दिखा  के दुनिया के।

जहवा  पापा  चल गइलन  अब ना जा पाईब तहवा ले।


किरकेट   खेले  खातिर   हमके  रोज बोलावे सपना में।

आ   जाये लन  बिट्टू   रीशू   रिंकू   लल्ला   भोला ले।


काम  से   फुर्सत  होते  नईखीं  और कमाई पूछअ मत।

चौबिस   घंटा  दउड़त-दउड़त  फाट  गईल  बा जूता ले।


गांव   में सगरे   सोचत   बाड़ें  माल  शहर  में काटत बा।

लेकिन  आलम   ई  बा  भूखे  सुत्तल  बीया  बुचिया  ले।


हालत  जस  के  तस  ही  बाटे  खेती  और  किसानी के।

कर्ज  में  सब  कुछ  डूबल  बाटे  पैर  से  लेके कपरा ले।


गांव में अपनो काम मिलित ता केकरा के ई शौक बा ऊ।

भूखे    प्यासे    दउड़े   धूपे    बोम्बे   से   कलकत्ता   ले।


राजीव कुमार


प्रीत के रीत अइसे निभाये के बा

भोजपुरी ग़ज़ल 


प्रीत के रीत अइसे निभाये के बा

जान लागी त जानो लुटाये के बा


आंख से लोर हस के बहाये के बा 

दर्द होखी त बस मुस्कुराये के बा


सबके भीतर से भय के अन्हरिया मिटे

अइसनों ए गो दियरी जराये के बा


केहू रोये त ई देख के हो खुशी 

खुद के एतना न बाउर बनाये के बा


जिन्दगी रेत पर ऊ लिखल नाम ह 

जे के लिक्खे के बा फिर मिटाये के बा


जबले बाबू जी रहलन पते ना चलल

खर्च कइले से पहिले कमाये के बा


सिर्फ थरिया बजवला से ना होई कुछ

हर  मुसीबत से खुद के बचाये के बा 


ई बेमारी के दानव के हमनी के अब 

ढक के मुंह हाथ धो के हराये के बा


राजीव कुमार 

चौका बर्तन लकङी लवना सब पर गरहन लाग गइल

 भोजपुरी ग़ज़ल 


चौका बर्तन लकङी लवना सब पर गरहन लाग गइल

उनके घर से जाते घर के भीतर गरहन लाग गइल


फूल उगावे के फेरा में एतना कांट रोपाइल की

फुलवारी के रूप रंग के ऊपर गरहन लाग गइल


चोरी चुपके देखके उनके प्रीत के अइसन लागल रोग 

देखत देखत हमरे जान के ऊपर गरहन लाग गइल


चांद भी उनके पीछे छुप के ललचाये ला सूरज के 

और कहे ला देख ल केतना सुन्दर गरहन लाग गइल


रोज अन्हरिया रात में उनकर सपना देख के लागेला 

भोर में जैसे हमरे आंख के भीतर गरहन लाग गइल


दुनिया के ई रीत ह या फिर भगवाने के मर्जी ह 

प्रेम करे वालन के ऊपर अक्सर गरहन लाग गइल


राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...