Saturday, July 8, 2017

रूह को जिस्म के सांचे में बिठा रक्खा है
और इन्सान को मिट्टी का बना रक्खा है

अपनी आंखों में जिसे हमने छुपा रक्खा है
हाय उसने ही हमे खुद से जुदा रक्खा है

जेब खाली हैं मगर दोनो जहां है जिसमें
हमने सीने में उसी दिल को छुपा रक्खा है

आप इक बार तो मांगो न मेरी जां हस के
जान दे देगे कि इस जान में क्या रक्खा है

चाहने वाले बहुत लोग मिरे हैं लेकिन
खुद को तेरे लिये दुनियां से बचा रक्खा है।

राजीव कुमार

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है

ग़ज़ल

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है
मेरा मतलब जिस्त अपनी दर ब दर होने को है

अपनी मायूसी छुपाने अब कहां जायेगे हम
ये मकाने दिल तो अपना खण्डहर होने को है

बर्फ यादों की तेरी पिघला गयीं तन्हाईयां
अब शुरू आंखो से दरिया का सफर होने को है

आप ने हमको कहा हम भूल जायें आप को
ऐसा लगता है ये किस्सा मुक्तसर होने को है

रास्ते हैं ठोकरें है और हैं कुछ मंजिले
राम जाने कौन अपना हमसफर होने को है ।

कब तलक सोये रहोगे अब तो उठ जाओ मियां
देख लो अब तो सुबह भी दोपहर होने को है

राजीव कुमार

Wednesday, July 5, 2017

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था
मगर कोई तो मेरे चश्मे-तर से निकला था

हजूमे गम जो दिले बे असर से निकला था
न जाने कौन कहां कब किधर से निकला था

जिधर मेरी नजर नहीं थी हां उधर से ही।
वो साथ छोड़ के मेरा सफर से निकला था

अगर मै लौट के आया तो फिर बताउंगा
किसे तलाशने मैं भी सहर से निकला था

मिरे खिलाफ मेरा अक्स है खड़ा तब से
के जब से आईना मेरी नजर से निकला था

नहा के धूप में आई सूखाने बाल वो जब।
ख़बर उड़ी कि क़मर दोपहर से निकला था।

जला रही है मेरी आशिकी ग़ज़ल की लौ
या फिर ख़्याल ही मेरा श़रर से निकला था ।

उरूज ओ बह्र की नजरों से हो गया खारिज
हर एक शेर जो मेरे जिगर से निकला था

राजीव कुमार

चश्मे-तर - नम आंखें
सहर -- सुबह
अक्स -- प्रतिबिम्ब
क़मर-- चांद
श़रर-- चिंगारी

Tuesday, July 4, 2017

फूल के ही साथ देखो खार है

फूल के ही साथ देखो खार है
गर समझिये तो यही संसार है

गर यही दौरे तरक्की है तो क्युं
हर किसी के हाथ में तलवार है

जिन्दगी भर क्या कमाया सोचिये
मौत के आगे तो सब बेकार है

नेक नीयत आदमीयत छोड़ कर
जहनियत से आदमी बीमार है

खुदकुशी का रोक दे जो सिलसिला
हां किसानो की वही सरकार है।

राजीव कुमार 

मुझको जो तेरी नजर ए इनायत नहीं मिलती

ग़ज़ल

हर इक को इस जहां में महब्बत नहीं मिलती।
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।

अपने लिये हर शख़्स परेशान है मगर।
औरों से कभी इसकी तबीयत नहीं मिलती।

तस्वीरे मुल्क तुम जो अभी देख रहे हो
अच्छे दिनों से इसकी भी सूरत नहीं मिलती

मेरे अजीज दोस्त मिरे हाल पर न जा।
गुर्बत में किसी शख़्स से किस्मत नहीं मिलती

अच्छा हूं बुरा हूं ये मेरी जाती बात है।
रहने दे तुझसे मेरी तबीयत नहीं मिलती

यूं तो जनाब आप की भी उम्र हो गयी ।
इस उम्र में अब हुस्न की दौलत नहीं मिलती

कितना अजीब शह्र है कि दिन में भी यहां।
हमको शरीफ शख़्स की रगबत नहीं मिलती।

राजीव कुमार

Sunday, July 2, 2017

जात मजहब की खातिर न तूफान कर।

जात  मजहब  की  खातिर न तूफान कर।
खुद भी  इन्सान बन  मुझको इन्सान कर।

जिस  जमीं  पर   बसा  है  ये सारा  जहां।
उसकी  मिट्टी  का  थोड़ा तो सम्मान कर।

मयकदे  में  अगर   तुझको   आना है  तो
दफ्न  मिट्टी  में  तू  दीन  ओ  ईमान  कर

गर  मेरी  बेखुदी  से   सिकायत   है  तो।
मुझको काफिर बता मुझ पे अहसान कर।

उम्र   भर   बैठ    कर    तन्हा   रोयेगा  तू।
दिल  की  दुनिया  को  ऐसे न  वीरान कर।

बेदिली     बुजदिली      बेहयाई      जफा।
अपने   भीतर   से   बाहर  ये  सामान कर।

कौन  दिल से  जुड़ा  कौन  मतलब  से  है।
दोस्त  बनने  से  पहले  ये   पहचान    कर।

आज   बाजार   में   दिल   लिये   हूं  खड़ा।
यार   बोली    लगा   मत    परेशान    कर।

इश्क  और  जंग  मे  सब  है  जायज  यहां।
दिल  के  मैदान  पर कुछ  तो  ऐलान  कर।

बंदगी   शायरी    आशिकी     क्या     करूं।
ए  खुदा  जिस्त   थोड़ी   तो   आसान   कर।

राजीव कुमार

आईने के लिये इक आईना जरूरी है

आईने के लिये इक आईना जरूरी है
यार ऐसा है जहां में खुदा जरूरी है

आसमां सर पे उठाने से कुछ नहीं होगा।
बात करने के लिये कायदा जरूरी है

सारे अरमान सभी ख़वाब लग गये बोलो
घर बनाने के लिये और क्या जरूरी है

उम्र भर गम है उठाना इसी लिये शायद
गम भुलाने के लिये मयकदा जरूरी है

दर्द के बाद सफर का मजा भी आयेगा
चलते कदमों के लिये आबला जरूरी है

अबके बारिस में ये महसूस हो रहा है के।
सर्द मौसम में कोई हमनवा जरूरी है

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...