Wednesday, December 18, 2013

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,
बेघर ही हर बार तो हारा करता है/

कपड़ो के अंदर, भला क्या बचता है,
खादी ही लोगों को मारा करता है/

दफ्तर दफतर फिरते फिरते जान गया,
डिग्री से ईमान भी गुजारा करता है/

दौलत कि चाहत में अब न जाने क्युं।
रिश्तों से इंसान किनारा करता है।

जाने वाले छोड़ हमेशा जाते है
प्रेम हमारा उन्हें पुकारा करता है

राजीव कुमार

Monday, December 16, 2013

अगर जो आप कहते हो वही आबो हवा है तो

*ग़ज़ल*

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।
कहो किस डर से तुम भी हर घड़ी रंजूर रहते हो।

वो जो अख़बार में है  गर उसे तुम मानते हो सच।
तो अपने मुल्क के  सच से  बहुत ही दूर रहते हो।

तरक्की क्यूँ  नहीं चल कर  हमारे  पास आती है।
मुझे डर  है यही तुम  सोच कर  मजबूर रहते हो।

यहाँ पर  मजहबी  सैलाब  में जब  लोग  मरते हैं।
कभी  रोका  है जा कर  या वहाँ  से  दूर रहते हो?

बहुत अच्छा हुनर है झूठ को सच की तरह कहना।
मगर जब सच हो कहना तो कहाँ काफूर रहते हो।

गरीबी ज़ख्म है इस मुल्क़ के सीने पे तो क्या तुम।
कभी  बनते  हो  मरहम  या सदा नासूर  रहते हो?

तुम्हारी  देशभक्ति  पर  भरोसा  कौन   कर  लेगा!!
नसल  के नाम  पर  तुम भी  नशे में  चूर  रहते  हो।

राजीव कुमार

रंजूर - दुखी
क़ाफूर- गायब

Saturday, December 14, 2013

खबर वालों के अख़बारों के पन्ने लाल दिखते हैं,

खबर वालों के अख़बारों में खबरी लाल लिखते हैं,
ये साहब बिकते हैं पहले तभी कुछ हाल लिखते हैं/

न जाने कैसे कैसे इस जहाँ में हैं बड़े शायर,
कभी ये हुस्न लिखते है किसी के गाल लिखते हैं/

गजल कि रूह का मतलब भला वो कैसे समझेंगे,
जो कत्ले आम कि खबरे यहाँ हर साल लिखते हैं/

यहाँ लिखना सियासत में वफादारी का सिम्बल है,
यहाँ टिकते वही हैं जो किसी का काल लिखते है,

गरीबी कि बीमारी का असर  है मुल्क पर  यारों,
दवा कि पर्चियों पे भी ये रोटी दाल लिखते हैं /

हमारी सभ्यता कि आज अस्मत लुट गयी शायद ,
यहाँ तो आज कल इंसान को भी मॉल लिखते हैं /

राजीव कुमार 

मेरे जवाब पर नया सवाल कैसे हो गया ,

मेरे  जवाब  पर  नया  सवाल  कैसे  हो  गया ,
जो बात हक़ की कर दी तो बवाल कैसे हो गया ?

मेरी  शिकायते  कहाँ  थी  आप  से  मेरे  हुज़ूर ,
मुझे  बताइये  मेरा  ये  हाल  कैसे  हो  गया ?

जो मेरे हिस्से का था वो  मुझी से लूट कर ,जनाब /
मुझे  ही दे दिया तो ये मिसाल कैसे हो गया ?

खुद अपने लफ्ज में ही अपनी पीठ थप थपा गए ,
बिना  सुने  किसी  की  ये  कमाल कैसे हो गया ?

सभी  रियासतों  के  सरपरस्त  आप  ही  रहे ,
बताइये न जीना फिर मुहाल  कैसे हो गया ?

अगर हो आप वो ही जैसा  कह  दिया था आप ने ,
तो  जातियों  के नाम पर उबाल  कैसे हो  गया ?

असल में आप भी शिकार हैं सियासतों के  वरना ,
गर्व  करते  करते  ये  मलाल  कैसे  हो  गया ?

ये  जिक्र ये  अहम् फिजूल लग रहा है आप का ,
हमे  नहीं  है  फ़िक्र  ये  ख्याल  कैसे हो गया ?

रहेगा  इंतज़ार  मुझको  आप  के  जवाब  का ,
सवाल दर  जवाब  पर  सवाल  कैसे  हो  गया ?

राजीव कुमार 

Friday, December 13, 2013

नज़र मिली नहीं कि इश्क़ का बुखार चढ़ गया,


नज़र मिली नहीं कि इश्क़ का बुखार चढ़ गया, कुछ ही दिनों के साथ में खुमार ये उतर गया/ नये लिबास ने अदब का कायदा बदल दिया, निगाह क्या करे कि जब बदन निगाह पर गया/ दिलों का साथ क्या है आज का बड़ा सवाल है, जो आज इसके साथ था वो उसका साथ कर गया/ मोहब्बतों की नथ भी पार्कों में है उतर गयी, मिटा के भूख जिस्म की हर एक शक्स घर गया ।

अजी ये प्यार है जनम जनम का किसने कह दिया, मिला ये ही सबक कि जबसे गावं से शहर गया/ नयी रवायतों के दौर में शाइर आज कल, किसी की आशिक़ी में बस तड़प तड़प के मर गया/
राजीव कुमार

Thursday, December 12, 2013

अहसासों कि इन बातों का


अहसासों कि इन बातों का 
अंदाजे बयां कुछ ऐसा हो,
कागज का समंदर हो,
उसमे स्याही भी मोती जैसा हो/

बिक जाता है ईमान यहाँ
चेहरे कि भी रंगत बिकती हो,
तेरे हुनर को कोई खरीद सके
ऐसा रुपया न पैसा हो/

लफ्जों कि महक भी इतनी हो '
हर लफ्ज फिजा का फूल लगे,
हर हर्फ़ का मंजर सबनम कि,
बूंदों के चमक के जैसा हो/

राजीव कुमार 

Thursday, December 5, 2013

असर है जो मोहोब्बत का निकल जाता है सीने से,


असर है जो मोहोब्बत का निकल जाता है सीने से,
ये वो कहते हैं जो रोजी कमाते हैं पसीने से /

अगर माशूक के आँखों से ही पीते सभी शायर,
खबर फिर ये नहीं आती मरे हैं लोग पीने से /

उछल कर चाँद छूने का जो दम भरते हैं उनका तो,
ये ही सच है कि कोठे पर भी ये जाते है जीने से /

सियासत का वफ़ा से हो न हो रिश्ता कोई तो है,
किसी का हाथ पकड़े और लगा कोई करीने से /

थे जब तक हम भी चाहत में हमें भी रश्क रहता था, 
शिकायत अब हुई है जा के इस पिछले महीने से/ 

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...