सूरज हो या चाँद इशारा करता है,
बेघर ही हर बार तो हारा करता है/
कपड़ो के अंदर, भला क्या बचता है,
खादी ही लोगों को मारा करता है/
दफ्तर दफतर फिरते फिरते जान गया,
डिग्री से ईमान भी गुजारा करता है/
दौलत कि चाहत में अब न जाने क्युं।
रिश्तों से इंसान किनारा करता है।
जाने वाले छोड़ हमेशा जाते है
प्रेम हमारा उन्हें पुकारा करता है
राजीव कुमार
बेघर ही हर बार तो हारा करता है/
कपड़ो के अंदर, भला क्या बचता है,
खादी ही लोगों को मारा करता है/
दफ्तर दफतर फिरते फिरते जान गया,
डिग्री से ईमान भी गुजारा करता है/
दौलत कि चाहत में अब न जाने क्युं।
रिश्तों से इंसान किनारा करता है।
जाने वाले छोड़ हमेशा जाते है
प्रेम हमारा उन्हें पुकारा करता है
राजीव कुमार