Tuesday, December 31, 2019

जिसको जाना था जा चुका है अभी

ग़ज़ल

जिसको जाना था जा चुका है अभी
दर खुला किस लिये रखा है अभी

क्या हुआ ये भी सोचना है अभी
वो ही क्यु हमसे मुब्तिला है अभी

आग दिल मे लगा के अपने ही
दिल को जलता भी देखना है अभी

शह्र जाना है तो चले जाओ
पर वहां धुंध की हवा है अभी

कितने लोगों ने खुदकशी की है
और कितनों को ढूबना है अभी

किस तरह पैरहन से पहचानें 
मुल्क़ में कौन मर रहा है अभी

राजीव कुमार

Thursday, December 26, 2019

जहाँ-जहाँ भी हमें मयक़दा दिखाई दिया। हर एक शख़्स वहाँ एक-सा दिखाई दिया।

ग़ज़ल-

जहाँ-जहाँ भी हमें मयक़दा दिखाई दिया।
हर एक शख़्स वहाँ एक-सा दिखाई दिया।

नयी उम्मीद नया वलवला दिखाई दिया।
हमारी राह में जब मरहला दिखाई दिया।

जब आँख बंद हुई तब भी काम आया दिल
इसी से ख़्वाब इसी से ख़ुदा दिखाई दिया।

अदाएँ,  रंग,  हया,  हुस्न  ही  नहीं  उसमें।
अलग मिज़ाज, अलग ज़ाविया दिखाई दिया।

क़ुसूर  मेरा  नहीं  आइने   का है,  जिसमें।
मेरी ही शक़्ल का इक दूसरा दिखाई दिया।

यही तो फ़र्क है इस हुक्मरां में और हम में।
हमें  लहू  तो  उसे  ज़ायका  दिखाई दिया।

तुम्हारे   शह्र  तुम्हारे  निज़ाम  में  हमको।
हर एक ज़ुल्म, हर इक सानिहा दिखाई दिया।

करोड़ों  लोग  उसी  शह्र   के  पते  पर हैं।
जहाँ  हर एक  हमें लापता  दिखाई दिया।

तुम्हारे साथ मुझे आज का ये दिन सच में।
बहुत हसीन बहुत खुशनुमा दिखाई दिया।

राजीव कुमार

वलवला- जोश,उमंग
मरहला - मुश्किल difficulty
सानिहा  - दुर्घटना

ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।

ग़ज़ल

ये वक़्त हो के तुझसे ज़ुदा काट रहे हैं।
किस ज़ुर्म की हम यार सज़ा काट रहे हैं।

ग़म इसका नहीं बढ़ गयी है रात में सर्दी।
ग़म ये है कि हम तेरे बिना काट रहे हैं।

इक तेरे सिवा सब था कहानी में हमारी।
हम इसलिये क़िस्मत का लिखा काट रहे हैं।

सब चाहते हैं साफ हवा, ग्रीन नज़ारे।
फिर कौन हैं जो पेड़ हरा काट रहे हैं।

जब ख़त्म हुई धूप तो ये देख के तारे।
इस शब भी अंधेरे की रिदा काट रहे हैं।

ख़ामोश थे तो जान पे बन आयी हमारी।
इस वास्ते अब उनका कहा काट रहे हैं।

सर्दी में भवाली की खिली धूप का मंजर
हम लोग यहां दोस्त मजा काट रहे हैं।

राजीव कुमार

रिदा - चादर

झूठ जो बोलने का आदी है। हर तरफ उसकी ही मुनादी है।

ग़ज़ल

झूठ जो बोलने का आदी है।
हर तरफ उसकी ही मुनादी है।

आज के दौर की सियासत में।
जो कहे सच वही फसादी है।

अब दुवाओं की फिक्र है किसको।
मौत ने ज़िन्दगी बङा दी है।

कोट टाई भी ठीक है लेकिन
अब भी फैशन में यार खादी है

किससे रक्खें वफ़ा की उम्मीदें  ।
एक जुल्मी ही अपना हादी है

तुझसे  ज्यादा हसीं बहुत हैं पर
तू मेरे दिल की शाह जादी है

इश्क़ लिख दूं तो लोग कहते हैं।
अपना राजीव लव जिहादी है।

राजीव कुमार

Saturday, December 14, 2019

जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम

ग़ज़ल

जाना कहाँ था और कहाँ जा रहे हैं हम
वहशत की ज़द में देखिये फिर आ रहे है हम

अपनो से अपने घर में ही घबरा रहे हैं हम
इन्सानियत को देख के शरमा रहे हैं हम

ये जान कर भी कोई नहीं सुन रहा है पर
जम्हूरियत के दश्त में चिल्ला रहे हैं हम

हर एक सांस अपनी कज़ा करके रात दिन
इस  ज़िन्दगी को रोज़ रोज़ खा रहे हैं हम

हर फैसला खिलाफ़ है जिसका अवाम के
यारो अब उस निज़ाम को  ठुकरा रहे हैं हम

जिस अहद में दस्तूर झूठ बोलने का था
उस अहद में सच बोल के पछता रहे हैं हम

तू कह रहा है तो ये तेरा शह्र छोङ कर
जाने का मन नहीं है मगर जा रहे हैं हम

राजीव कुमार

सहराओं में बादल की रिदा ओढ़ के निकले।

ग़ज़ल

सहराओं में  बादल  की रिदा ओढ़  के निकले।
जब घर से  बुज़ुर्गों की  दुआ  ओढ़ के निकले।

हम  जानते  थे   मुश्किलें   आयेगी   सफर  में।
हम इस लिये हिम्मत की क़बा ओढ़ के निकले।

तू  आये  तो  एज़ाज  ये  हासिल हो चमन को।
जो  फूल  खिले   रंग  तेरा   ओढ़  के  निकले।

मर  कर  भी  जी  रहे  हैं वही  आज तक यहां।
जो  दिल में महब्बत की बक़ा ओढ़ के निकले।

चेहरे  पे एक  चेहरा  सभी  के  है  कहो तुम।
इस शह्र में हम कैसे वफा ओढ़ के निकले।

खतरा था भटकने का सो हम  अपने बदन पर ।
चादर की  जगह  अपना पता  ओढ़ के निकले।

राजीव कुमार

सहराओं - मरुस्थल
रिदा - चादर 
बक़ा - अमरत्व
क़बा- चोला वस्त्र

वीराने को वहशत ज़िन्दा रखती है।

ग़ज़ल

वीराने  को   वहशत  ज़िन्दा  रखती है।
यानी प्यार  को फ़ुर्क़त ज़िन्दा रखती है।

दीवानी  को  ताअत   ज़िन्दा  रखती है।
दीवाने  को   शिद्दत    ज़िन्दा  रखती है।

हर  पल एक  अजीयत ज़िन्दा रखती है।
जिन   लोगों  को गुर्बत ज़िन्दा रखती है।

घर आंगन  की सूरत  ज़िन्दा  रखती हैं।
उन  दीवारों  को छत  ज़िन्दा  रखती है।

यूं तो हर इक चीज़ की कीमत है लेकिन।
किरदारों  को   ग़ैरत   ज़िन्दा   रखती  है।

रिन्दों  की  ख़ातिर  हैं  ये  मयखाने  पर।
मुझको  इक   तेरी  लत ज़िन्दा रखती है।

वहशत  खा  जाती  है  लाखों  लोगो को।
मुल्क़ को  यारो वहदत  ज़िन्दा रखती है।

सच  बोले  तो  शाम  तलक  मर  जायेगे।
जिन लोगों  को  गीबत  ज़िन्दा  रखती है।

जीते  जी  कुछ  लोग  हैं मुर्दों की मांनिंद।
कुछ  लोगों  को  तुर्बत  ज़िन्दा  रखती  है।

सरहद  में   रह  कर   तो  ये  मर  जायेंगी।
कुछ चिङीयों को हिजरत ज़िन्दा रखती है।

शह्रों    की   सांसें   चलती   हैं   दौलत से।
गांवों  को   तो   इज्ज़त  ज़िन्दा  रखती है।

राजीव कुमार

फुर्कत- बिछङना / ताअत- समर्पण, श्रद्धा / अजीयत- तकलीफ़ दुःख / गुर्बत- ग़रीबी/ वहदत- एकता / गीबत - पीठ पीछे बुराई / तुर्बत- मकबरा / हिजरत- प्रवास

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...