Monday, October 4, 2021

हैं जिनके पेट भरे वो ही ज्ञान देते हैं

डा0राहत इन्दौरी साहब को समर्पित🙏🙏

हैं   जिनके   पेट   भरे  वो ही ज्ञान देते हैं 
गरीब   लोग   तो  हर  रोज   जान देते हैं

गुलाम थे तो गुलामी का ये सबब था  पर
किसान    आज   भी  देखो लगान देते हैं

हमारे गांव में  मोहन की बांसुरी सी हसीं
सवेरे    फूल    से    बच्चे  अजान देते हैं

अजीब  दौर है  जीते जी लोग चुप है पर
नदी    में    तैरते    मुर्दे   बयान   देते  हैं

हम ऐसे लोग वही लोग हैं जो उल्फत में
कभी   जबान    कभी    इम्तिहान देते हैं

कभी  ये  सोचा   है जो बांण मार ही देंगे
उन्ही  के हाथ   में हम क्यूँ कमान देते हैं

वही लिखा है जो दिल में कई दिनों से था
वो ना पढ़ें  जो गज़ल पर ही ध्यान देते हैं 

राजीव कुमार

Friday, June 11, 2021

वहशत का दौर ऐसा भी लाया गया था दोस्त

वहशत का दौर ऐसा भी लाया गया था दोस्त 
पहरा हर इक जबां पे बिठाया गया था दोस्त

लोगो को बेवकूफ बनाया गया था दोस्त 
मौतों के आकङो को छुपाया गया था दोस्त 

इस डर से कहीं घाव बदन के न बोल दें 
हाथों से सबके मुह को दबाया गया था दोस्त 

मै चाह कर भी भूल नहीं सकता ये भी सच 
लोगो का कत्ल करके बहाया गया था दोस्त

ये बात उस चमन कि है जिसका हर एक फूल 
मसला गया था और जलाया गया था दोस्त

कातिल भी कत्ल करके साफ साफ बच गया 
हर इक सूबूत ऐसे मिटाया गया था दोस्त

क्या-क्या कहूं मैं दौर ए तबाही के नाम पर 
सांसों को फेफङों से चुराया गया था दोस्त

मातम हर एक घर में था मत पूछ किस तरह 
इमेज हुक्मरां का बचाया गया था दोस्त 

राजीव कुमार

Saturday, June 5, 2021

हम चरागों के हक़ में तागी से

ग़ज़ल-2

हम चरागों के हक़ में तागी से
आज तक लड़ रहे हैं आंधी से

दिल की बस्ती में एक जुल्मी से
दिल लगाया है अपनी मर्जी से

बात बरसों पुरानी है लेकिन 
इश्क अब भी है उस ही लङकी से

उसका चेहरा है हर्फे उर्दू तो
उसकी आंखें हैं शह्र ए हिन्दी से

सर से पा तक गज़ल है सो यारों
उसको पढते हैं हम भी  मस्ती से

मेरी चाहत है मय की इक बोतल
और इक शेर उसकी शोखी से

इश्क की दास्ताँ यही है कि
आग की दोस्ती है पानी से

याद करके अब ऐसा लगता है
दिल लगाया था कैसी जिद्दी से

इस लिये मिल न पाये हम दोनो
कानपुर से थी वो, मै दिल्ली से

राजीव कुमार

लौट आये हैं हम बलंदी से

लौट आये हैं हम बलंदी से 
इस लिये लग रहे हैं जख्मी से 

क्यु डराते हो हमको भट्टी से 
बल नहीं जाते यूं ही रस्सी से

खाक जाये तुम्हारी ताकत पर 
हम भी डरते नहीं हैं धमकी से

क्या कोई जानता है अबके साल 
मर गये लोग कितने सर्दी से

सारे फैशन ही ओल्ड फैशन हैं
आप क्युं लड़ रहे हैं  दर्जी से

मर के जिन्दा तो हो नही सकते 
इस लिये जी रहे है सुस्ती से

राजीव कुमार

Thursday, June 3, 2021

दिल की फिजा को संवारा है इश्क ने हमको पुकारा है

गीत

दिल की फिजा को संवारा है 
इश्क ने हमको पुकारा है 
फूल पे शबनम बुला रही है किरणों को 
और जमीं पर गिरा दिया है रंगों को

ख्वाब जो था सच वो हुआ 
चाहा जिसे मिल वो गया 
होश नही है अपना हमें जरा भी

जब भी करीब आती है
दिल मे लहर उठ जाती है 
जैसे सागर में उठती हैं धारायें

मिट्टी की खुश्बू  बारिस से 
आसमां चमके आतिश से 
चाहूं उसे ही और उसी से घबराउं

जैसे शजर से परिंदा है 
इश्क उसी से जिंदा है 
बाग मे तितली फूल की रंगत बोलते है
दिल की फिजा को संवारा है 
इश्क ने हमको पुकारा है 
फूल पे शबनम बुला रही है किरणों को 
जैसे जमीं पर गिरा दिया हो हीरों को

राजीव कुमार

Sunday, May 30, 2021

हर इक नक्श उसका मिटाने से पहले

ग़ज़ल 

हर इक नक्श उसका मिटाने से पहले
मै  रोया  बहुत  खत जलाने से  पहले

कई    ख्वाहिशों  को  मिटाना  पङेगा 
बदन   की  हदों  को  मिटाने से पहले

तो  क्या  शेर  में ये भी कहना  पङेगा
मैं रखता  हूँ तुझ  को ज़माने से पहले

अजीब आदमी  है ये डरता है कितना
जो  सच  है  वही सच बताने से पहले

निभाने  का  पहले इरादा  तो कर  लो
हमे   अपना  दुश्मन  बनाने  से  पहले

न   भूलो   हमारे   लिये   है   ये मोती
कोई   आंसू   अपना  बहाने  से पहले

बहुत लोग कहते हैं अच्छा था  राजीव 
मुहब्बत  की  दुनिया में आने  से पहले

राजीव कुमार

मुसीबत से जो डर जाये वो रहबर हो नहीं सकता

ग़ज़ल 

मुसीबत   से   जो डर  जाये वो रहबर हो नहीं सकता 
चमकने    वाला   हर   पत्थर जवाहर हो नहीं सकता

ख़ुदा ख़ुद   को  समझने  लग गया है वो ज़मीं का पर 
हक़ीक़त  में  कभी  क़तरा   समन्दर   हो नहीं सकता 

व्यवस्था   वेन्टीलेटर   पर  हो  जिसकी  बादशाहत में
वो बंदा     कुछ भी हो सकता है पर्वर  हो नहीं सकता 

मुझे   अग़वा करा   दो मार   डालो या   जला  दो पर 
तुम्हारा   झूठ   मेरे    सच   से   ऊपर  हो नहीं सकता

अँधेरे  में  रहा  है   इस    लिये   ग़फ़लत  में  है   वर्ना 
कभी     ये    चाँद   सूरज  के  बराबर हो नहीं सकता

मुहब्बत   पर यक़ीं जिसको नहीं वो शख़्स दुनिया का
शहंशाह बन के   भी लोगो का अकबर हो नहीं सकता

ज़रूरत   है    हमें    इक    दूसरे   को  थामे  रहने की 
कोई   बीमार  हो   के ख़ुद   चरागर   हो  नहीं  सकता

राजीव कुमार

रहबर- पथ प्रदर्शक
जवाहर - रत्न 
अकबर -  महान
पर्वर- रक्षक
चरागर - डाक्टर

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...