ग़ज़ल-2
हम चरागों के हक़ में तागी से
आज तक लड़ रहे हैं आंधी से
दिल की बस्ती में एक जुल्मी से
दिल लगाया है अपनी मर्जी से
बात बरसों पुरानी है लेकिन
इश्क अब भी है उस ही लङकी से
उसका चेहरा है हर्फे उर्दू तो
उसकी आंखें हैं शह्र ए हिन्दी से
सर से पा तक गज़ल है सो यारों
उसको पढते हैं हम भी मस्ती से
मेरी चाहत है मय की इक बोतल
और इक शेर उसकी शोखी से
इश्क की दास्ताँ यही है कि
आग की दोस्ती है पानी से
याद करके अब ऐसा लगता है
दिल लगाया था कैसी जिद्दी से
इस लिये मिल न पाये हम दोनो
कानपुर से थी वो, मै दिल्ली से
राजीव कुमार
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