ग़ज़ल
मुसीबत से जो डर जाये वो रहबर हो नहीं सकता
चमकने वाला हर पत्थर जवाहर हो नहीं सकता
ख़ुदा ख़ुद को समझने लग गया है वो ज़मीं का पर
हक़ीक़त में कभी क़तरा समन्दर हो नहीं सकता
व्यवस्था वेन्टीलेटर पर हो जिसकी बादशाहत में
वो बंदा कुछ भी हो सकता है पर्वर हो नहीं सकता
मुझे अग़वा करा दो मार डालो या जला दो पर
तुम्हारा झूठ मेरे सच से ऊपर हो नहीं सकता
अँधेरे में रहा है इस लिये ग़फ़लत में है वर्ना
कभी ये चाँद सूरज के बराबर हो नहीं सकता
मुहब्बत पर यक़ीं जिसको नहीं वो शख़्स दुनिया का
शहंशाह बन के भी लोगो का अकबर हो नहीं सकता
ज़रूरत है हमें इक दूसरे को थामे रहने की
कोई बीमार हो के ख़ुद चरागर हो नहीं सकता
राजीव कुमार
रहबर- पथ प्रदर्शक
जवाहर - रत्न
अकबर - महान
पर्वर- रक्षक
चरागर - डाक्टर
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