Sunday, August 18, 2019

हमें छोटा सा छ़प्पर चाहिये था हमें कब सारा अम्बर चाहिये था

हमें छोटा सा छ़प्पर चाहिये था
हमें कब सारा अम्बर चाहिये था

तुम्हे क्या सच में रहबर चाहिये था
तुम्हे तो सिर्फ सेंगर चाहिये था

वही उन्नाव पर चुप हैं अभी तक।
जिन्हें पहलू का अलवर चाहिये था।

तरक्की ले के बेटा क्या करोगे ।
तुम्हें तो सम्भू रैगर चाहिये था।

करें किससे शिक़ायत हुकमरां की।
हमें ही शाह ख़ुद सर चाहिये था।
ख़ुद- सर - अभिमानी arrogant

पुराने वक्त में पत्थर के बदले
ज़माने को जवाहर चाहिये था
जवाहर = नायाब पत्थर

जमीं जर-खेज अब वो मांगते हैं।
जिन्हें हर खेत बंजर चाहिये था।
ज़र ख़ेज - उपजाऊ

अरे क्युं सर उठा रक्खा है तुमने
तुम्हें होना ही बेसर चाहिये था

राजीव कुमार

सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा। कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।

ग़ज़ल

सकूं मिला न कहीं हर घङी उदास रहा।
कि तेरे बाद मैं जब तक अदब शनास रहा।

मेरी गज़ल में तेरा इस तरह निवास रहा
मैं दूर हो के भी तेरे ही आस पास रहा

तुम्हारे आने से पहले न मौत आ जाये
तमाम उम्र यही दिल में इक हिरास रहा
(हिरास-डर)

वो मैं नहीं था कोई और था मेरे भीतर
जो मुझसे ज्यादा तेरे गम से बद हवास रहा

तबाह जिसने किया उसका ही नजाने क्युं
हमेशा मैं भी मेरे दोस्त पुर सिपास रहा
(पुर सिपास-आभारी Thankful)

तुम्हारे झूठ यहां  पैरहन बदलते रहे
हमारा सच तो हर इक रोज बे लिबास रहा।

राजीव कुमार

दिल को न बेकरार करो जाम उठाओ ऐसा न मेरे यार करो जाम उठाओ

ग़ज़ल

दिल को न बेकरार करो जाम उठाओ
ऐसा न मेरे यार करो जाम उठाओ

सर पे न ज़िद सवार करो जाम उठाओ
दिलबर न इन्तज़ार करो जाम उठाओ

धोखा फ़रेब रंज जफ़ा ज़िन्दगी के ग़म
हर एक दर-किनार करो जाम उठाओ

दैरो हरम ओ दीन धरम सबको भूला कर
साकी पे एतबार करो जाम उठाओ

अच्छा बुरा ही सोचते रहते हो हमेशा
ख़ुद से भी थोङा प्यार करो जाम उठाओ

तुमको नहीं सलीका महब्बत का सुनो तुम।
लहजे में कुछ सुधार करो जाम उठाओ

कोई न कोई ऐब यहां हर किसी में है।
ख़ुद को भी ऐबदार करो जाम उठाओ

गर ये खता है तो ये खता मेरे अजीजों
हर रोज बार बार करो जाम उठाओ

राजीव कुमार

फूल खिलता नहीं देखा है तो क्या देखा है

ग़ज़ल

फूल खिलता नहीं  देखा है तो क्या देखा है
उनका चेहरा नहीं देखा है तो क्या देखा है

ख्वाब देखे हैं बहुत तुमने मगर ख़्वाबों  में
उसको पाना नहीं देखा है तो क्या देखा है

तुमने देखें हैं बहुत चाहने वाले लेकिन
मुझसा लङका नहीं देखा है तो क्या देखा है

अपने भीतर के बियाबान में ख़ुद को तुमने
गर भटकता नहीं देखा है तो क्या देखा है

दौरे हाज़िर की हकूमत के नुमाइन्दों सा।
तुमने झूठा नहीं देखा है तो क्या देखा है

शह्र दर शह्र महब्बत की हसीं गलियों में
ख़ून बहता नहीं देखा है तो क्या देखा है

राजीव कुमार

दुश्वारी को पांव पकङते देखा है

ग़ज़ल

दुश्वारी को पांव पकङते देखा है
पल-पल अपना वक्त बिगङते देखा है 

खोना पाना आना जाना जान गया
जिसने पत्ता पेड़ से झड़ते देखा है

आज तुम्हारा वक्त है वर्ना हमने भी
बड़े बड़ों  को नाक रगड़ते देखा है

फुटपाथों पर बैठ के पढ़ने वालों को
यारों अपने आप से लड़ते देखा है।

मंजिल पाने की दुश्वारी क्या बोलूं
चींटी को दीवार पे चढ़ते देखा है?

वो शाइर जो शेर नहीं कह सकता था 
उसको हमने आप को पढ़ते देखा है

इश्क करें या जोब इसी इक मुद्दे पर 
अक्ल को दिल से अक्सर लङते देखा है।

राजीव कुमार

Wednesday, June 5, 2019

यानी वो फिर ग़ज़ल से नहाई हुई तो है।

ग़ज़ल

खुश्बू   तमाम   शह्र   में   लाई  हुई   तो है।
यानी  वो  फिर  ग़ज़ल  से नहाई  हुई तो है।

उम्मीद   ज़िन्दगी    की   जगाई   हुई तो है।
बोतल   में  कुछ   शराब  बचाई   हुई तो है।

मंजिल  नहीं  मिलेगी भला कब तलक हमें।
रफ़्तार   हमने   अपनी   बढ़ाई   हुई  तो है।

कुछ फायदा नहीं है छुपाने से दिल कि बात।
ये   बात   दिल   में  सबने  दबाई हुई तो है।

जंगल   पहाड़   पेड़    नदी   झील   परिंदे।
यानी   ज़मीं   किसी  ने  सजाई  हुई  तो है।

लोंगों के ज़हनो दिल में लगानी है इस दफ़ा।
शह्रों   में   आग   हमने   लगाई   हुई  तो है।

क्युं चल नहीं रही  हो  महब्बत की राह पर।
हमने   तुम्हें   वो   राह   बताई   हुई  तो  है।

जंगल   के   पेङ  काटने  वालों  ने  देखिये।
गमले  में  एक   पौध  लगाई   हुई   तो   है।

क़ैदी  बना  के  ज़िस्म  का इस रूह के लिये।
सर   पर  सभी  के   मौत  बिठाई   हुई तो है।

राजीव कुमार

Saturday, June 1, 2019

मर के ज़िन्दा हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

ग़ज़ल

मर के  ज़िन्दा हुआ  मुझमें ये कोई और ही है।
हद से  गुजरा  हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

मुझको जीना था सो हर ग़म से उबर आया हूं।
ग़म  में  डूबा  हुआ  मुझमे ये कोई और ही है।

अब  तो  देती  है  सूकूं  मुझको  मेरी  तन्हाई।
आह  भरता  हुआ मुझमें  ये कोई और ही है।

मैं  तो  रस्ते  में  हूँ पर   यार  मेरी मंज़िल पर।
थक के  बैठा  हुआ मुझमे ये कोई और ही है।

सबसे जीता हुआ मुझमें वो कोई और ही था।
ख़ुद से  हारा  हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

अब  कोई  ऐसा  नहीं जिसको मनाऊं मैं भी।
मुझसे रूठा  हुआ  मुझमें ये कोई और ही है।

ज़िस्म  से रूह  ज़ुदा  यूं  ही  नहीं  हो सकती।
तुझसे बिछड़ा हुआ मुझमें ये कोई और ही है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...