Sunday, August 27, 2017

ये इश्क यूं तो बुरा नहीं है

 ग़ज़ल

ये  इश्क  उतना  बुरा  नहीं है।
के जब तलक ये हुआ नहीं है।

हमें  पता  है  तुम्हारे  दिल में।
हमारी  ख़ातिर  वफ़ा  नहीं है।

स्याह   रातें   उदास   मौसम।
ये  दर्द  सबको  पता  नहीं है।

मैं आईना बन गया हूं लेकिन।
वो  अक्श  मेरा  बना  नहीं है।

जिसे मैं अपना समझ रहा था
वही तो सच मुच मिरा नही है।

वो  नापता  है  हमारे  कद को
जो  यार  हमसे  बड़ा  नहीं है।

शहर जलाया है जिसकी खातिर
वो  आदमी   है  ख़ुदा  नहीं  है।

अजीब दुनिया है जिसमें इन्सां
कभी  ख़ुदा  से  मिला  नहीं  है।

हमारी सोहबत में आ गया जो
वो  यार  खुद का  रहा  नहीं है।

राजीव कुमार 

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं

गजल _1

आपकी निगाहों को शोखियां समझती हैं
हम नशे में हैं सारी मस्तीयां समझतीं है।

हर सितम हवाओं के नाज गुल फजाओं के
आप के ही जैसे ये तितलियां समझतीं हैं

आप की जुदाई में अब मिरा अकेलापन  
गर्मीयां नहीं लेकिन सर्दियां समझतीं हैं

फिर बहार जायेगी फिर खिजां भी आयेगी।
दर्द इन दरख्तों का टहनियां समझतीं हैं

चोट खुद पे करना है चोट खुद ही खाना है
मुश्किलें  इबादत की घंटियां समझतीं हैं

राजीव कुमार

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।

गजल-1

मुल्क की हूकूमत को कुर्सीयां समझतीं हैं।
हम अवाम हैं हमको सिसकियां समझतीं हैं

शह्र के खुदाओं ने आग क्युं लगायी है
खाक हो गयी हैं जो बस्तीयां समझतीं हैं

हर तरफ तबाही का ये हजूम कैसा है।
उठ रही किसानों की अर्थीयां समझतीं हैं

आप का महल वो जो हाथ से बनाते है
उन गरीब लोगों को झुग्गीयां समझतीं हैं

आज एक इन्सां जो आप का मसीहा है।
आप तो नहीं उसको लड़कियां समझतीं हैं।

राजीव कुमार

Monday, August 14, 2017

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।

अकेले।

बस इक मैं ही नहीं तन्हा अकेले।
हर इक दुनिया से है जाता अकेले ।

बहुत कुछ जीत कर भी सोचता हुं।
मुझे खुद से भी है लङना अकेले।

मेरी ख्वाहिस हकीकत बन कभी तू।
ये जीना भी है क्या जीना अकेले।

गजल हो जायेगी मेरी मुक्मल।
कभी मिलने तो मुझसे आ अकेले ।

दिलों की दूरीयां आ कम करें हम।
कोई रिस्ता नहीं बनता अकेले।

राजीव कुमार

मुहब्बत को मिटाना चाहता है

मुहब्बत को मिटाना चाहता है
जमाना तो बहाना चाहता है।

खुदाया इस जहां में हर कोई क्यु।
किसी का दिल दुखाना चाहता है

नयी दुनिया पूराने लोग और हम
तू किसके साथ जाना चाहता है।

राजीव कुमार

पहले खुद पर तो एतबार करो

गजल

पहले खुद पर तो एतबार करो
फिर जमाने से रश्क यार करो

ये बूलंदी भी यूं नहीं मिलती।
कोशिशें दिल से बार बार करो।

जो न सोने दे चैन से तुमको।
ऐसी दौलत को दर किनार करो

अब तो फौलाद बन गया हूं मैं।
वार कोई तो जोरदार करो

छिन कर ये जमीं किसानों की
इनकी खुशियां न तार तार करो।

सुट महंगा तो था मगर यारों।
इतना महंगा न कारोबार करो ।

राजीव कुमार

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया

गजल

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया 
दुनिया भर का अपने सर इल्जाम लिया ।

ऐश परस्ती गुल्ली  डंडा लूका छिपी 
बचपन में यारों से कितना काम लिया।

नादां जिसको सदियां बर्षों कहते हैं
उन सदियों ने हमसे सुब्हो शाम लिया ।

बांट के उपर वाले को इन लोगों ने 
सिक्ख ईसाई हिन्दू और इस्लाम लिया।

जन्नत रहमत और जियारत भूल गया ।
बिटिया ने जब पापा कह के नाम लिया।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...