Sunday, June 25, 2017

आप से मेरी दोस्ती होती

ग़ज़ल

आप से मेरी दोस्ती होती
दुश्मनी मुंह छुपा रही होती

कुछ दुआओ में भी असर होता
इक दफा आपने तो दी होती

आईना घूरता नहीं यूं ही।
आप में गर नहीं कमी होती

आग पानी हवा जमीं अम्बर
कुल मिला कर है जिन्दगी होती

अब न गांधी रहे न ही गौतम
काश फिर वैसी सादगी होती

हमसे सुनते सूनाते कुछ अपनी
तो ग़ज़ल भी गजल हुई होती

राजीव कुमार
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फिलबदीह ग़ज़ल मुहब्बत के नाम
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गम न होता न ही खुशी होती
तू न मुझसे अगर मिली होती

तेरी यादों से शायरी होती
तू जो होती गजल हुई होती

हाय कितना हसीन मौसम है
जानेमन तू भी आ गयी होती

ये खिज़ा भी बहार हो जाती
तेरी खुश्बू अगर उड़ी होती

महजबीनो से दूर रहता तो
दिल की दुनियां नहीं बसी होती

मयकदा गम मिटा नहीं पाता
गर तू साकी नहीं बनी होती

मेरे दिलवर मिरे ख्यालों में
तू न होता तो तीरगी होती

मर गया या के मरने वाला हूं
ये खबर उनको हो गयी होती

राजीव कुमार


केकरा से प्यार कर लीं केकरा के छोड़ दीं।

भोजपुरी ग़ज़ल

केकरा से प्यार कर लीं केकरा के छोड़ दीं।
तोहरे खुशी के खातिर दुनिया के छोड़ दीं।

अब केहू और तोहरे दिल में त नइखे रहत।
क ह त  तोहरे  दिल के कमरा के छोड़ दीं।

दुनिया में  भाई  भाई  से  अब  डेरात बाटे।
छोटका   इहे  बा चाहत बड़का के छोड़ दीं।

मां  बाप   बेटा बेटी    सभे  खुशी  से  रही ।
रउआ  शराब  सिगरेट  गुटका  के छोड़ दीं।

क ह तरू तू   माई बबुआ  के  छोड़  द  त।
सो च तनी कि हम अब तोहरा के छोड़ दीं।

राजीव कुमार

Friday, June 23, 2017

तू हमार परछाई हउ

दिल के दर्द दवाई हउ
तू हमार परछाई हउ

लईका कहे सन कालेज के
तू त लक्ष्मी बाई हउ

पहिले कटरीना रहलू अब
दू लईका के माई हउ

शादी कइले बाड़ू जबसे
तब से तू भोजाई हउ

हमरे खातिर त तू जैसे
हारल एक लड़ाई हउ

राजीव 😍

जेकरा भीतर डर बइठल बा

भोजपूरी ग़ज़ल

जेकरा भीतर डर  बइठल बा
नेवा के ऊहे सर  बइठल बा 

ए धरती के ऊपर कब से
दे खअ ना अम्बर बइठल बा

के का करी देश के खातिर
सब केहू जब घर बइठल बा

हमरे भीतर  के ऊ लईका
आजो ले ममहर बइठलबा

ए बाबू हम्मन के किस्मत
जाने कौन शहर बइठल बा

महल में तू त बा ड़ लेकिन 
लोग इहां बेघर बइठल बा 

दू कौङी के जान के खातिर
खोल के ऊ दफ्तर बइठल बा 

जनता से ज्यादा इहवा के 
अतना ताकतवर बइठल बा?

राजीव कुमार

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल 

जमीने दिल की तपन में है कौन तुम हो क्या
सूकून चैनो अमन में है कौन तुम हो क्या

ग़ज़ल का आज जमाना मूरीद है कितना ।
तमाम शेरो सुखन में है कौन तुम हो क्या।

न जाने कब से नहीं सोई हैं ये आंखें भी।
ख्याले हिज्रे चुभन में है कौन तुम हो क्या।

गुलों में रंग हवाओं में खुश्बुओं का घर ।
हरेक घर के चमन में है कौन तुम हो क्या।

बदन पे रौशनी लेकर निकलते है घर से
ये जुगनुओं की थकन में है कौन तुम हो क्या

मिरे लबों से हमेशा ही सच निकलता है
मिरी जुबां के वतन में है कौन तुम हो क्या

खुदा से जब भी मिलुंगा तो मै ये पूछूंगा
जमीं पे और गगन में है कौन तुम हो क्या।

राजीव कुमार

फूल के ही साथ देखो खार है

फूल के ही साथ देखो खार है
गर समझिये तो यही संसार है

गर यही दौरे तरक्की है तो क्युं
हर किसी के हाथ में तलवार है

नेक नीयत आदमीयत छोड़ कर
जहनियत से आदमी बीमार है

जिन्दगी भर जो कमाया आपने
मौत के आगे वो सब बेकार है।

खुदकुशी का रोक दे जो सिलसिला
हां किसानो की वही सरकार है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...