Thursday, January 6, 2022

हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त

हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त  
अब कहाँ इश्क़ ज़माने में बचा ही है दोस्त।

तेरे बारे में नहीं बोल रहा हूँ फिर भी 
मेरी हालत तेरे ज़ुल्मों की गवाही है दोस्त

कौन से सच की तरफ भाग रहा हूँ मैं भी
मेरे पीछे भी मेरा झूठ पङा ही है दोस्त

बात अच्छी है बुरी है नहीं मालूम मगर 
इश्क़ हर शख़्स को इक बार हुआ ही है दोस्त

इन महब्बत के सताये हुए लोगों के लिये 
दर्द  ये दर्द  नहीं है ये दवा ही है दोस्त

कैसे पायेंगे तरक़्क़ी का वो अमृत हम लोग
दिल में जब जह्र अदावत का भरा ही है दोस्त

बात इतनी है कि ईमान परस्तों के लिये।
आज का दौर भी इक सख़्त सजा ही है दोस्त

जिन्दगी एक सफर है तो मुझे लगता है 
मौत मंजिल नहीं दर अस्ल ये राही है दोस्त

जिसमें मजलूम की आवाज नहीं है शामिल
शेर वो शेर नहीं सिर्फ सियाही  है दोस्त 

राजीव कुमार

Friday, November 19, 2021

नफ़रत की तीरगी को मिटाने का वक़्त है।

ग़ज़ल (Happy Independence Day)

नफ़रत की तीरगी को मिटाने का वक़्त है।
उल्फ़त की रौशनी में नहाने का वक़्त है।

हर एक दुश्मनी को भुलाने का वक़्त है।
उजड़े हुए चमन को बसाने का वक़्त है।

घर से निकल के सड़कों पे आने का वक़्त है।
ज़िन्दा हैं अब भी हम ये बताने का वक़्त है।

ख़ामोशियों को शोर बनाने का वक़्त है।
जो सो रहे हैं उनको जगाने का वक़्त है।

वहशत की आग ज़िस्म जलाने लगी है पर।
किरदार अब भी अपना बचाने का वक़्त है।

इस बेहतरीन वक़्त में किस डर से हो छुपे।
यारों यही तो जान लुटाने का वक़्त है।

मौतों का सिलसिला भी अभी तक नहीं रुका।
यानी कि ये सवाल उठाने का वक़्त है।

भूखा  गरीब  रोता  हुआ  देख  कर  लगा।
चिड़ियों के साथ बाज लड़ाने का वक़्त है।

बाघों  को जिस  तरह  से बचाने में हैं लगे।
वैसे ही  अब  ये देश  बचाने  का वक़्त है।

राजीव कुमार

Monday, October 4, 2021

हैं जिनके पेट भरे वो ही ज्ञान देते हैं

डा0राहत इन्दौरी साहब को समर्पित🙏🙏

हैं   जिनके   पेट   भरे  वो ही ज्ञान देते हैं 
गरीब   लोग   तो  हर  रोज   जान देते हैं

गुलाम थे तो गुलामी का ये सबब था  पर
किसान    आज   भी  देखो लगान देते हैं

हमारे गांव में  मोहन की बांसुरी सी हसीं
सवेरे    फूल    से    बच्चे  अजान देते हैं

अजीब  दौर है  जीते जी लोग चुप है पर
नदी    में    तैरते    मुर्दे   बयान   देते  हैं

हम ऐसे लोग वही लोग हैं जो उल्फत में
कभी   जबान    कभी    इम्तिहान देते हैं

कभी  ये  सोचा   है जो बांण मार ही देंगे
उन्ही  के हाथ   में हम क्यूँ कमान देते हैं

वही लिखा है जो दिल में कई दिनों से था
वो ना पढ़ें  जो गज़ल पर ही ध्यान देते हैं 

राजीव कुमार

Friday, June 11, 2021

वहशत का दौर ऐसा भी लाया गया था दोस्त

वहशत का दौर ऐसा भी लाया गया था दोस्त 
पहरा हर इक जबां पे बिठाया गया था दोस्त

लोगो को बेवकूफ बनाया गया था दोस्त 
मौतों के आकङो को छुपाया गया था दोस्त 

इस डर से कहीं घाव बदन के न बोल दें 
हाथों से सबके मुह को दबाया गया था दोस्त 

मै चाह कर भी भूल नहीं सकता ये भी सच 
लोगो का कत्ल करके बहाया गया था दोस्त

ये बात उस चमन कि है जिसका हर एक फूल 
मसला गया था और जलाया गया था दोस्त

कातिल भी कत्ल करके साफ साफ बच गया 
हर इक सूबूत ऐसे मिटाया गया था दोस्त

क्या-क्या कहूं मैं दौर ए तबाही के नाम पर 
सांसों को फेफङों से चुराया गया था दोस्त

मातम हर एक घर में था मत पूछ किस तरह 
इमेज हुक्मरां का बचाया गया था दोस्त 

राजीव कुमार

Saturday, June 5, 2021

हम चरागों के हक़ में तागी से

ग़ज़ल-2

हम चरागों के हक़ में तागी से
आज तक लड़ रहे हैं आंधी से

दिल की बस्ती में एक जुल्मी से
दिल लगाया है अपनी मर्जी से

बात बरसों पुरानी है लेकिन 
इश्क अब भी है उस ही लङकी से

उसका चेहरा है हर्फे उर्दू तो
उसकी आंखें हैं शह्र ए हिन्दी से

सर से पा तक गज़ल है सो यारों
उसको पढते हैं हम भी  मस्ती से

मेरी चाहत है मय की इक बोतल
और इक शेर उसकी शोखी से

इश्क की दास्ताँ यही है कि
आग की दोस्ती है पानी से

याद करके अब ऐसा लगता है
दिल लगाया था कैसी जिद्दी से

इस लिये मिल न पाये हम दोनो
कानपुर से थी वो, मै दिल्ली से

राजीव कुमार

लौट आये हैं हम बलंदी से

लौट आये हैं हम बलंदी से 
इस लिये लग रहे हैं जख्मी से 

क्यु डराते हो हमको भट्टी से 
बल नहीं जाते यूं ही रस्सी से

खाक जाये तुम्हारी ताकत पर 
हम भी डरते नहीं हैं धमकी से

क्या कोई जानता है अबके साल 
मर गये लोग कितने सर्दी से

सारे फैशन ही ओल्ड फैशन हैं
आप क्युं लड़ रहे हैं  दर्जी से

मर के जिन्दा तो हो नही सकते 
इस लिये जी रहे है सुस्ती से

राजीव कुमार

Thursday, June 3, 2021

दिल की फिजा को संवारा है इश्क ने हमको पुकारा है

गीत

दिल की फिजा को संवारा है 
इश्क ने हमको पुकारा है 
फूल पे शबनम बुला रही है किरणों को 
और जमीं पर गिरा दिया है रंगों को

ख्वाब जो था सच वो हुआ 
चाहा जिसे मिल वो गया 
होश नही है अपना हमें जरा भी

जब भी करीब आती है
दिल मे लहर उठ जाती है 
जैसे सागर में उठती हैं धारायें

मिट्टी की खुश्बू  बारिस से 
आसमां चमके आतिश से 
चाहूं उसे ही और उसी से घबराउं

जैसे शजर से परिंदा है 
इश्क उसी से जिंदा है 
बाग मे तितली फूल की रंगत बोलते है
दिल की फिजा को संवारा है 
इश्क ने हमको पुकारा है 
फूल पे शबनम बुला रही है किरणों को 
जैसे जमीं पर गिरा दिया हो हीरों को

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...