Thursday, April 11, 2019

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो। हिन्दू मुस्लिम के मुद्दों की हार बनो।

ग़ज़ल

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो।
हिन्दू  मुस्लिम  के  मुद्दों  की  हार  बनो।

थोङा  नरम  बनो  थोङा   खुद्दार   बनो।
सोच  समझ  कर  यारों दुनियादार बनो।

नफ़रत  खून  ख़राबा  दंगा  आग  जनी।
आप  सियासत का  मत कारोबार बनो।

सहज सहल बनकर तो जीवन है मुश्किल।
जीने  की  ख़ातिर  कुछ तो  दुश्वार  बनो।

झूठ  ही लिखना  पढ़ना है  गर रोज तुम्हें।
क्युं  बनते हो  शायर  तुम  अख़बार बनो।

बन   जाते  हो  ढाल  अमीरों  के  अक्सर।
आप  गरीबों  का भी  तो  हथियार  बनो।

ख़्वाब  देखते  हो  क्युं  अफ़सर  बनने का।
जाओ   जा   के  पहले  चौकीदार  बनो।

राजीव कुमार

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।

*ग़ज़ल*

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।
मेरी  नज़र  में   वो  गैरत  ख़राब  होती है।

ये  मर्ज़े  इश्क  है इसके  मरीज़  की यारों।
दवा  के  नाम  से  हालत  ख़राब  होती है।

हमारी  छोड़िये  हम  तो अवाम हैं साहब।
हमारे  जैसों  की  क़िस्मत ख़राब होती है।

शहर  का  हाल  बदलते हैं नाम से पहले।
नहीं तो  नाम की अज़्मत ख़राब होती है।

कोई बताये जो रहबर है मुल्क़ का उसको।
किसी भी मुल्क़ में नफ़रत ख़राब होती है।।

राजीव कुमार

निस्बत- सम्बंध

दुनिया में दर्द है तो दवा भी है कोई चीज़।

ग़ज़ल

दुनिया  में दर्द  है तो दवा भी है कोई चीज़।
यानी की ज़िन्दगी में नशा भी है कोई चीज़।

क्युं दिल जला रहे हो किसी शख़्स के लिये।
क्या तुम भी सोचते हो वफ़ा भी है कोई चीज़

हम भी किसी के इश्क़ में तबतक रहे तबाह।
जबतक पता नहीं था जफ़ा भी है कोई चीज़

बस्ती की आग शहर तक आ जायेगी ज़रूर
क्युं भूलते हो आप  हवा भी है कोई चीज़।

मिल कर किसी से आज ये महसूस हुआ है
इक हुस्न ही नहीं है अदा भी है कोई चीज़ ।

दौलत की आग में ये बदन हो रहा है ख़ाक।
क्यो भूलते हो तुम की शिफ़ा भी है कोई चीज़।

आंखों से आज तक नहीं देखा गया मगर।
कहते हैं  इस जहां में खुदा भी है कोई चीज़।

राजीव कुमार

Wednesday, March 13, 2019

हम ने देखा ये हादसा अक़्सर

*ग़ज़ल*

हम   ने  देखा  ये    हादसा  अक़्सर।
जो  भी  चाहा  नहीं   मिला अक़्सर।
Hume dekha ye hadisa akksar
Jo bhi chaha nahi mila akksar

खुद के टुकड़ों को जोङ कर मुझको।
दिल  भी   देता  है  हौसला  अक़्सर।
Khud ke tukdon ko jod kar mujhko
Dil bhi deta hai housla akksar

उनकी  आंखों   की  झील  में  हमसा।
डूब    जाता    है    नाखुदा   अक़्सर।
Unki ankhon ki jheel main hum sa
Dub jata hai nakhuda akksar

इश्क़   हमने    नहीं   किया   क्युंकी।
फूट   जाता   है   बुल बुला   अक़्सर।
Ishq humane nahi kiya kyun ki
Fut jata hai bul bula akksar

एक    मैं     और     मेरी       तन्हाई।
साथ   करते   हैं    रतजगा   अक़्सर।
Ek main or meri tanhai
Sath karte hain ratjaga akksar

ये    इलेक्सन    है   इस  इलेक्शन में।
छूट    जाता   है   मसअला  अक़्सर।
Ye election hai is election main
Chut jata hai masaala akksar

अपनी   ग़ज़लों   से  इस  ज़माने को।
हम    दिखाते    हैं   आईना  अक़्सर।
Apni ghazlon se is jamane ko
Hum dikhate hain aaina akksar
राजीव कुमार
Rajeev Kumar
नाखुदा - नाव चलाने वाला
केवट

Wednesday, February 13, 2019

जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।

ग़ज़ल

जो सच है गर उसे सच हमको बतलाना नहीं आता।
तो  हमको  झूठ से  सचमुच में टकराना नहीं आता।

कहानी  का  वो  हिस्सा भी  नहीं लगता  कहानी  है।
कि  जिस हिस्से में  यारों कोई अफ़साना नहीं आता।

सफ़र  इस ज़िन्दग़ी   का  मुश्किलों से है भरा इसमें।
वही पाता  है  मंज़िल  जिसको घबराना नहीं आता।

दरो    दीवार    कुर्सी    मेज़   बिस्तर   और   तन्हाई।
किसी को तुमसे अच्छा मुझको समझाना नहीं आता।

घुटन  वहशत  परेशानी  ये सब  तब तक ही रहते हैं।
कि जब तक  सामने आंखों के मयख़ाना नहीं आता।

बताओ  कैसे   करते  हम  मुहब्बत  इस  ज़माने  में।
हमें  सर  मार  के  पत्थर  पे  मर  जाना नहीं आता।

मियां ये  शाइरी  उसके  लिये बिल्कुल नहीं जिसको।
ख़ुद  अपने  दर्द  के  ऊपर  ही मुस्काना नहीं आता।

राजीव कुमार

Monday, February 4, 2019

कभी यादें, कभी आँखोँ में पानी भेज देता है।

ग़ज़ल

कभी  यादें,  कभी  आँखोँ  में   पानी  भेज देता है।
वो  मुझको  हिज्र  की सारी  निशानी भेज  देता है।

वो खुद मिलने नहीं आता मगर हर रोज ख़्वाबों में।
ग़ज़ल  कहने  की ख़ातिर इक कहानी भेज देता है।

ये पागल दिल भी उनके इश्क के सरहद पे मरने को।
हमेशा   मेरे   हिस्से   की   जवानी   भेज   देता  है।

मुहब्बत से  उसे  कुछ  फोन  पर  कहने को बोलूं तो।
वो  अपनी  बात  मैसेज  की   जुबानी  भेज  देता है।

वो जिसको अपनी दुनिया मानते हैं वो ही जाने क्युं।
मेरी  दुनिया  में  अक्सर  सरगिरानी  भेज  देता  है।

नहीं  मरती  हैं  रूहें  इस  लिये  आदम की शक्लों में।
ख़ुदा  भी  सबकी  ख़ातिर  जिस्म फ़ानी भेज देता है।

राजीव कुमार

सरगिरानी- परेशानियों का अम्बार

Friday, February 1, 2019

जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।

ग़ज़ल 

जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है।
जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिये है।

ऐसा न हो कि आईने में देख के खुद को
हम सोचने लगे कि ये डर किस के लिये है

इस शब के बाद भी वही वीरान सा ही दिन ।
ए दिल तुझे उम्मीद ए सहर किसके लिये है।

वो छत पे आ गये तो राज खुल गया ये की
 इस तरह बेकरार कमर किसके लिये है

हर सिम्त इक दीवार नयी उठ रही है अब
आख़िर ये पत्थरों का नगर किसके लिये है

मिल कर किसी से आज समझ आ गया हमको।
अपना भी ये जवान जिगर किसके लिये है

धोखा फरेब झूठ कज़ा और  नफरतें ।
दिल में तुम्हारे इतना ज़हर किसके लिये है

आखिर में जब हयात  सिफ़र होना ही है तो
ता उम्र मुश्किलों का सफ़र किसके लिये है

राजीव कुमार
ज़र - दौलत पैसा धन
शब - रात 
सहर - सुबह
क़मर- चाँद 
सिफर - शुन्य
हयात- जीवन

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...