Friday, May 18, 2018

गजल गोई में तब तक फायदा है

गजल गोई में तब तक फायदा है
के जब तक मेहनताना मिल रहा है

कोई महफिल की जीनत हो गयी अब।
कोई महफिल का मालिक हो गया है

भला हो फेसबुक औ वाट्सअप का।
यहां  गूंगा भी शाइर बन चुका  है ।

किसी के शान में गुस्ताखियां हैं ।
किसी का नाम ही कुछ अटपटा है।

वफा के हक में दो एक शेर पढ़ के।
गली का रोमियो भी दिलजला है।

राजीव कुमार

खाने पीने का इन्तजाम करो
जिन्दा रहने का इन्तजाम करो

मुझको सच की तलाश करनी है
कोई चखने का इन्तजाम करो।

किसको तन्हाई से महब्बत है।
इससे बचने का इन्तजाम करो ।

आधिंयां चल रही है किस जानिब।
इनके थमने का इन्तजाम करो।

चांद हासिल किसे हुआ अब तक।
जाओ सोने का इन्तजाम करो।

आप ईमानदार बन जाना ।
पहले खाने का इन्तजाम करो।

राजीव कुमार

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।

कोशिस समिक्षार्थ 🙏

इक झूठ को सच बतलाता है ये देख के शक गहराता है।
जब अम्नों सूकूं का इक परचम वो शक्स कहीं लहराता है।

हर बार तेरी मन की बातें बस तू ही करता जाता है।
सच पूछने वालों की आखिर किस बात से तू घबराता है।

शोहरत के दिनों में आते ही गर्दिश के दिनों को भूल गया
ये दिन भी गुजरने वाले हैं किस चीज पे तू इतराता है।

हर शक्स परेशां दिखता है हर ओर है वहशत का आलम
ऐसे में तेरी तकरीरों पर क्या तू भी कभी शर्माता है।

ये गलिंयां सड़कें चौराहे सब हाल बताने लगते हैं ।
मालूम नहीं जाने कैसा तेरा शह्र से रिस्ता-नाता है ।

ये रश्मे सियासत है तो फिर हमें सिकवा किसी से कोई नहीं।
हम जानते हैं इस पेशे में हर कोई धोखा खाता है।

राजीव कुमार

🙏🙏🙏

पग- पग में ठोकरों की डगर है कि नहीं है

ग़ज़ल
कुछ सुधार के साथ

पग- पग में  ठोकरों  की  डगर  है कि नहीं है
दुश्वार  जिन्दगी  का  सफर  है  कि  नहीं है

बस्ती को एक दिन न बियाबान बना दे
शाहों के फ़ैसले पे नज़र है कि नहीं है

हर बार रैलियों में सड़क पर हो तुमी क्यो
दावों की असलियत पे नजर है कि नहीं है।

कल शाम रोशनी को निगल बैठा अँधेरा
सूरज तुझे ज़रा भी ख़बर है कि नहीं है
 
तामीर ज़ेहन में जो कोई शह्र किये था
उस शख़्स का भी शह्र में घर है कि नहीं है

सदियों सी लम्बी रक्खी है जो एक कहानी
बतलाओ मुख़्तसर सा सफ़र है कि नहीं है

सूरज की आग अपने बदन पर लपेट कर
इंसां के हक़ में देख शजर है कि नहीं है

अपने ही दिल में ख़वाब किसी और का है क्युं
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

उल्फत  में  रोजगार में रिश्तों में उलझ कर।
हर   वक्त   बेकरार  बशर है कि  नहीं  है।

राजीव कुमार

Thursday, April 19, 2018

आप कहते हैं लोग सुनते हैं।

_ग़ज़ल

आप  कहते  हैं   लोग   सुनते हैं।
हम  तो   गूंगे  है  और   बहरे  हैं।

कत्लो  गारत  फरेब  धोखे  को।
कैसे   देखेंगे   वो   जो   अंधे  हैं।

हुकमरानी  में  आप  की  साहब।
शाह  खुश  हैं  किसान  रोते  हैं ।

बेच  कर खुश  हैं लोग गैरत को।
आप  अब  तक  संम्भाले बैठे हैं।

दिल की बातें नहीं मियां हम तो।
देखिये  दिल  जबां  पे  रखते हैं।

फूल को  प्यार  तितलियों  से है।
और  पागल   यहां  के  भौरे  हैं ।

छोड़िये  क्या मिलेगा नफरत से।
शह्र ए उल्फत में आज चलते हैं।

राजीव कुमार

दौर ए गर्दिश से अब निकलना हैl

तरही ग़ज़ल 🙂

दौर ए गर्दिश से अब निकलना  हैl
अपने   हालात   को   बदलना  हैl

खुद से मिलना है इस लिये हमको
अपने  भीतर से अब निकलना हैl

इस  जमाने   में इश्क  करना  तो।
धूप   का  बर्फ   पे   टहलना   है l

आप  को  हमको  उम्र  भर देखोl
गिर के  उठना  है और  चलना हैl

अपने  हक  के  लिये  हूकूमत केl
अब   नहीं   टालने   से  टलना है।

जो   रीयाया   को   दर्द   देती   होl
ऐसी   सरकार   को   बदलना   हैl

इक   जवानी   में  ही   नहीं  यारोंl
हमको   हर  उम्र  में   संभलना है।

ये जो  ग़ज़लें  हैं इस  लिये  हैं  केl
दिल  हमारा  भी   तो  बहलना  है।

राजीव कुमार

Friday, March 9, 2018

किसी को जख्म दिखाने का दिल नहीं करता।

ग़ज़ल

किसी को जख्म दिखाने का दिल नहीं करता।
अब और अश्क बहाने का दिल नहीं करता।

वो मुझसे दूर बहुत दूर हो गया है अब ।
ये बात दिल को बताने का दिल नहीं करता।

सदाये अब भी दे रहा है घर तिरा लेकिन।
तिरा ही लौट के आने का दिल नहीं करता

इसी लिये तो भुला दी है दुश्मनी  सबसे।
किसी से कुछ भी निभाने का दिल नहीं करता

सुना के अपने गमों की ग़ज़ल किसी को भी
अब और रोने रुलाने के दिल नहीं करता।

चलो मैं कहता हूं तुम भी कहो कि तुमको भी
है इश्क और छुपाने का दिल नहीं करता।

राजीव कुमार

अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

ग़ज़ल

मयकश तमाम मय से अन्जान हों न जाएं।
अल्लाह इस तरह के इमकान हों न जाएं।

साकी शराब सागर शायर औ महफिले गम
बस नाम के ही ये सब सामान हों न जाएं ।

दैरो हरम ये मजहब इस दौर की सियासत।
सब चाहते हैं हम सब इन्सान हों न जाएं।

यूं ही किसान खुद का कातिल बना रहा तो।
इक दिन ये खेत सारे शम्शान हों न जाएं।

मिट्टी में न मिला दें मिट्टी की आबरू को ।
इस मुल्क के मुसाहिब हैवान हों न जाएं।

राजीव कुमार

इमकान- आसार, सम्भावनायें
मुसाहिब- राजा का परामर्शदाता

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...