Monday, August 14, 2017

मुहब्बत को मिटाना चाहता है

मुहब्बत को मिटाना चाहता है
जमाना तो बहाना चाहता है।

खुदाया इस जहां में हर कोई क्यु।
किसी का दिल दुखाना चाहता है

नयी दुनिया पूराने लोग और हम
तू किसके साथ जाना चाहता है।

राजीव कुमार

पहले खुद पर तो एतबार करो

गजल

पहले खुद पर तो एतबार करो
फिर जमाने से रश्क यार करो

ये बूलंदी भी यूं नहीं मिलती।
कोशिशें दिल से बार बार करो।

जो न सोने दे चैन से तुमको।
ऐसी दौलत को दर किनार करो

अब तो फौलाद बन गया हूं मैं।
वार कोई तो जोरदार करो

छिन कर ये जमीं किसानों की
इनकी खुशियां न तार तार करो।

सुट महंगा तो था मगर यारों।
इतना महंगा न कारोबार करो ।

राजीव कुमार

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया

गजल

इश्क इबादत और अकीदत थाम लिया 
दुनिया भर का अपने सर इल्जाम लिया ।

ऐश परस्ती गुल्ली  डंडा लूका छिपी 
बचपन में यारों से कितना काम लिया।

नादां जिसको सदियां बर्षों कहते हैं
उन सदियों ने हमसे सुब्हो शाम लिया ।

बांट के उपर वाले को इन लोगों ने 
सिक्ख ईसाई हिन्दू और इस्लाम लिया।

जन्नत रहमत और जियारत भूल गया ।
बिटिया ने जब पापा कह के नाम लिया।

राजीव कुमार

हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे

गजल

हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे
समंदर कल भी प्यासा था समंदर अब भी प्यासा हे।

कई अहसास लेकर साथ जीना पङ रहा हे अब
न जाने कौन सा अच्छा बुरा बेहतर है उम्दा हे

मेरी हस्ती मेरी दुनिया मेरा लहजा मेरी खुशियां।
यही अब देखना है साथ मेरे कौन चलता है।

सहर से शाम तक की उम्र जी कर ये समझ आया
ये जीना भी है क्या जीना कि जब हर रोज मरना है।

जमाने की अदावत से बहुत उकता गया हुं मैं ।
किया है फैसला अब तो मुझे खुद से ही लङना है।

राजीव कुमार

दिल में नफरत के हर शै अंगारे हैं ।

आज की कोशिस

दिल में नफरत के हर शै अंगारे हैं ।
देखो  ऐसे  अच्छे  दिन  हमारे  हैं ।

मंदिर मस्जिद गिरजा हैं गुरुद्वारे हैं।
क्या जाने हम किस किस के सहारे हैं ।

हाथ में परचम आज अमन का है जिनके।
उनके ही हाथों हम सबकुछ हारे हैं।

भूख गरीबी महंगाई और काळा धन।
क्या अब भी ये सब मुद्दे हमारे है।

आन अना ईमान अकीदत और वफा।
मुश्किल में अब तो सारे के सारे है।

राजीव कुमार

Saturday, August 12, 2017

अरे राजीव क्युं पछता रहा है।

बस युं ही

अरे राजीव क्युं पछता रहा है।
यहां हर शक्स धोखा खा रहा है।

मुहब्बत काम है जब पागलों का
तू इसमें खुद को क्यु उलझा रहा है

जुदा होकर भी तुझसे जी रहा हूं
यही गम मुझको खाये जा रहा है

जिसे मैं पा ही जाना चाहता हूं
उसे ही मुझसे छीना जा रहा है

हिमायत कर रहा है रौशनी की
जो खुद भीतर से अंधेरा रहा है

वो निकला है अभी जो मयकदे से
वही गम ख्वार हसता जा रहा है

Rajeev kumar

Tuesday, August 1, 2017

इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे

फिलबदीह गजल

रोयेंगे कब तलक कि गर्दिश में हैं सितारे
इक हम ही तो नहीं है लाखों है बे सहारे

जिन्दा रहेंगे तब तक जिन्दादिली रहेगी
गर मर गये तो इक दिन बन जायेगे सितारे

दुनिया से दुश्मनी कुछ इस तरह निभाई
हम दिल तो खूब हारे दिल से मगर न हारे।

रस्मो रवायतों की जब बेड़ीयों को तोड़ा
तब जान पाये दुश्मन अपने ही हैं हमारे

कश्मीरीयत को गोली जम्हूरियत ने मारी
इन्सानियत की बातें करते है झूठे सारे

मिल बैठ कर करेंगे गर बात मसअले पर
झगड़े फसाद सारे हो जायेंगे किनारे।

अच्छा चलो चलें अब ख्वाबों की सैर करने
चांद आ गया हैं छत पर संग लेके अपने तारे

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...