Tuesday, March 24, 2020

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया

ग़ज़ल

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया
बदन तो याद रहा और जान भूल गया

हमारी दुश्मनी बढ़ती गयी मगर इक दिन
वो अपना तीर मै अपना कमान भूल गया

यही निजाम यही तख़्त का सलीका है
लगान याद रहा पर किसान भूल गया।

अगर पता है किसी को तो मुझको बतलाये।
मैं अपने शह्र में अपना मकान भूल गया

गणित भुगोल कला और सारा लिटरेचर
तुम्हारे क्लास का हर नौजवान भूल गया

मुझे बचाओ कोई तो उसे भी समझाओ।
वो अपनी जान को ही सख्त जान भूल गया।

ये देख कर कि सभी क़ैद में हैं ख़ुश भी हैं।
उकाब ख़ौफ के मारे उड़ान भूल गया।

उसी को लोग बनाते हैं साहिबे मसनद
हमेशा दे के जो अपना बयान भूल गया।

राजीव कुमार

Saturday, March 21, 2020

नाराज़ है हलचल से ठहरा हुआ सन्नाटा

ग़ज़ल

नाराज़ है हलचल से ठहरा हुआ सन्नाटा 
हर सम्त यहां है जो फैला  हुआ सन्नाटा।

इक जंग सा ख़ुद से ही लड़ता हुआ सन्नाटा।
देखा है किसी ने क्या मरता हुआ सन्नाटा 

सच बोलने वालों के अन्ज़ाम पे हँसता  है
बस्ती में हर इक लब पे रक्खा हुआ सन्नाटा

तुम होते नहीं तब भी बस बात तुम्हारी ही
करता है मेरे घर में पसरा हुआ सन्नाटा

गम हो या ख़ुशी जो है आखों से टपक जाये 
यूं अच्छा नहीं होता ठहरा हुआ सन्नाटा।

बेचैन सा करता है हरबार  मुझे उसके 
होठों पे अचानक से बढ़ता हुआ सन्नाटा

खण्डर में इमारत की आहट पे अचानक से
दिखता है परिंदे सा उड़ता हुआ सन्नाटा

हर राज पता है पर *ख़ामोश* ही रहता है
ऐसे ही बुरा हो के अच्छा हुआ सन्नाटा

दहशत जो श़हर तक थी अब मुल्क़ में छाई है
कतरे से यूं ही देखो दरिया हुआ सन्नाटा

राजीव कुमार

Friday, March 20, 2020

वीरान दरख़्तों को यूं शाद करेंगे हम।

ग़ज़ल

वीरान   दरख़्तों  को  यूं  शाद करेंगे  हम।
पिंजरे  से  परिन्दों  को आज़ाद करेंगे हम।

इस  तरह  महब्बत  अब हम भी निभायेंगे।
जब याद  करोगी तुम तब याद करेंगे हम।

जब होगे नहीं तुम तो हर रोज ग़ज़ल लिख कर।
इस  हिज्र के मौसम को आबाद करेंगे हम।

मरना तो ग़लत होगा इक शख़्स को खोने पर।
जीने  का  नया  मक्सद  ईज़ाद  करेंगे हम।

हर रोज नया दुश्मन मुश्किल  है बना पाना।
सो  अपने लिए  ख़ुद  ही  बेदाद  करेंगे हम।
बेदाद - अत्याचार

ईमान  वफ़ा  चाहत  दुनिया  के सभी  रिश्ते।
किस-किस को तेरी ख़ातिर बर्बाद करेंगे हम।

किरदार  कहानी  का  कुछ  ऐसे  पलट  देंगे।
ओहदे   में  परिंदे   को   सय्याद  करेंगे  हम।

हर फ़ैसला जालिम के हक़ मे ही अगर होगा।
फिर किसकी अदालत में फरियाद करेंगे हम।

कहते हैं सभी मुन्सिफ़ साहब की अदालत में।
जो   आप   कहोगे  वो   उस्ताद   करेंगे  हम।

राजीव कुमार

हर एक सांस में मौक़ा दिया हंसो-खेलो।

ग़ज़ल
हर  एक  सांस  में  मौक़ा  दिया  हंसो-खेलो।
ख़ुदा ने सबको ये  तोहफा दिया हंसो-खेलो।

मैं बात कर ही रहा था कि यक-ब-यक माँ ने।
पकड़  के   हाथ  भरोसा  दिया  हंसो-खेलो।

गिला किसी  से नहीं सबसे प्यार करना तुम।
हम ही ने सबको ये नुस्ख़ा दिया हंसो-खेलो।

किसी की डोली के उठते ही लब से आई सदा।
हर  एक  बात  को  दफ़्ना  दिया हंसो-खेलो।

हमेशा  जिसने   सताया  दग़ा   किया  हमसे।
उसी  ने   ये  भी  दिलासा  दिया  हंसो-खेलो।

वफ़ा, सुलूक,  हया,  इश्क़,  शर्म  ने अब तक।
किसे  बतायें   हमें   क्या   दिया   हंसो-खेलो।

मुझे   उम्मीद   थी  बांटेगा   ग़म  मिरे  लेकिन।
ये  कह  के  उसने भी धोखा दिया हंसो-खेलो।

वो  मेरी  लाश  पे  रोया  लिपट  के और बोला।
लो  प्यार  आपको  अपना  दिया  हंसो-खेलो।

राजीव कुमार



Sunday, March 15, 2020

ग़ज़ल

हर शख़्स आज ख़ुद से ज़ुदा है कि नहीं है
आख़िर किसी को इसका पता है कि नहीं है

थोड़ा बहुत भी प्यार बचा है कि नहीं है
क्या सोचता है यार बता है कि नही है

ऐ ऊंच-नीच ज़ात-पात मानने वालों
सांसों में सबके एक हवा है कि नहीं है

दुनिया का एक ही है ख़ुदा मान लें कैसे
पैसा भी इस जहां का ख़ुदा है की नहीं है

ये जान कर भी ला-दवा हैं इश्क़ के मारे
क्यों पूछते हो इश्क़ बला है कि नहीं है

ख़ुद को तबाह जिसके लिये कर रहे हो तुम
उस शख़्स के भी दिल में वफ़ा है कि नहीं है

ये मौत रिहाई है मगर जीस्त हमारी
इक उम्र क़ैद जैसी सजा है कि नहीं है

राजीव कुमार



Wednesday, March 11, 2020

जब उसकी बात भी बेहद हुई है बातों में

ग़ज़ल

जब उसकी बात भी बेहद हुई है बातों में 
ग़ज़ल सी ख़ुश्बू बरामद हुई है बातों में

नयी रदीफ नये काफिये लिखे हमने
कि जब से आप की आमद हुई है बातों में

वो जिसके काम का कोई भी एतबार नहीं
उसी की ख़ूब ख़ुशामद हुई है बातो में

अदब ने रोक लिया इस लिये रुके वरना
हमारी आप की कब हद हुई है बातों में

बगैर उसके मुकम्मल कोई भी बात कहां
वो जब से साहिबे मसनद हुई है बातों में

तेरी खुशी से पता चल रहा है कि उससे
वो एक बात भी शायद हुई है बातों में

राजीव कुमार

वो अलग बात है हम सबकी हिफाज़त न करो

ग़ज़ल

वो अलग बात है हम सबकी हिफाज़त न करो
पर गुज़ारिश है कि हर बात पे धत-धत न करो

धर्म और ज़ात की बुनियाद पे निस्बत न करो
ऐसा करना है तो फिर हम पे हकूमत न करो

कुछ गलत है तो उठो और उठा लो परचम
बैठ कर मुल्क़ की हर रोज शिक़ायत न करो

जह्र नफ़रत का कहीं भर के मिटा दे न हमें
ऐसे कानून की अब कोई हिमायत न करो

मिल के लोगों से ज़रा बात करो परखो भी
देख के शक़्ल किसी से भी रिफाक़त न करो

ये सियासत है सियासत में सगा कोई नहीं
आप बे वजह किसी शाह की बैअत न करो

अपनी मिट्टी से ज़ुदा हो ही नहीं सकते हम
ऐसा करने की सुनो आप भी हिम्मत न करो

राजीव कुमार

रिफाक़त- दोस्ती
बैअत - स्वामिभक्ति

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ

ग़ज़ल

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ
मै अपने आप को चट्टान करने वाला हूँ।

हर एक ख़्वाब हकीकत में ढाल के इक दिन
हर एक शख़्स को हैरान करने वाला हूँ

फक़त बदन ही नहीं इक दफा तू कह दे तो
मैं अपनी जान तुझे दान करने वाला हूं।

मेरे खिलाफ़ मेरी ही अना है सो खुद से।
अब एक जंग का ऐलान करने वाला हूँ।

है वक्त अब भी अगर चाहो तो निकल जाओ।
मैं दिल को आज से जिन्दान करने वाला हूँ।

वफ़ा खूलूश दगा दर्द दीन और ईमाँ
तमाम मुश्किलें आसान करने वाला हूँ।

ख़ुशी है शह्र बसाने की पर ये गम़ भी है।
मैं अपने गांव को वीरान करने वाला हूँ।

राजीव कुमार

जिन्दान- क़ैद

मुझसे हर रोज गिला करती है

ग़ज़ल

मुझसे हर रोज गिला करती है
पर मेरे हक़ में दुआ करती है

इक अजीयत सी हवा करती है
जब चरागों से मिला करती है

मेरे ख़्वाबों के हसीं गार्डन में।
हर सुबह वाक किया करती है।

उसकी तस्वीर मेरे कमरे को।
उसकी ख़ुश्बू से भरा करती है

दोस्त कलतक थी मगर कल से ही
वो मेरी जान हुआ करती है

हुस्न जो काम नहीं कर पाती।
हां वही काम अदा करती है

भर चुके हैं जो उन्हीं जख्मों को
शाइरी रोज हरा  करती है

राजीव कुमार

उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर



उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर
रहना है अब शराब से दो चार कदम दूर

उसकी गली में आके हमे लग रहा है की
हम भी है माहताब से दो चार कदम दूर

कटते रहे शज़र तो इन्हीं गर्मीयों में दोस्त
हम होंगे आफताब से दो चार कदम दूर

सहरा ए इज्तिराब के हम आ गये हैं पास
जब भी हुए खिताब से दो चार कदम दूर

हमने बनाया जिसको हमारा जवाबदेह
वो ही है हर जवाब से दो चार कदम दूर

हमको दिखा के फूल जो बोते रहे हैं खार
रहिये उन्ही जनाब से दो चार कदम दूर।

राजीव कुमार
गुराब- अहम

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है

ग़ज़ल

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है
स्थिती शह्र की  गम्भीर  नज़र आती है।

Har taraf jahar si tashir nazar aati hai
Isthiti sahar ki gammbhir nazar aati hai

आलम ए रंज ये वहशत ये सभी जलते घर
खून सी ख़ल्क़ की तस्वीर नज़र आती  है

Alam e ranj ye vahashat ye sabhi jalte ghar
Khoon si khalk ki tashvir nazar aati hai

ये तरक्की या तबाही है? हमें बतलाओ
क्युं हर इक हाथ में शमशीर नज़र आती  है

Ye tarakki ya tabahi hai hume batlao
Kyun har ik hath main shamshir nazar aati hai

मेरे साये की तरह साथ हर इक रस्ते पर
मौत जैसे कोई रहगीर नज़र आती है

Mere saaye ki tarah sath har ik rashtey per
Mout jaise koi rahgir nazar aati hai

गांव से शह्र में जाता हूं तो मां की सूरत
हर दफा पांव की जंजीर नज़र आती  है

Gaon se sahar main jata hun to maa ki surat
Har dafa paon ki janzeer nazar aati hai

दिल मेरा था भी नहीं थी तो बस इक जां अपनी
वो भी इक शख़्स की जागीर नज़र आती है

Dil mera tha bhi nahi thi to bas ik jan apni
Wo bhi ik shakhs ki jagir nazar aati hai

उसका लहजा है तरन्नुम में ग़ज़ल कहने सा
वो किसी नज़्म की ताबीर नज़र आती है

Uska lahza hai tarannum main ghazal kahne sa
Wo kisi nazm ki tabir nazar aati hai

राजीव कुमार

ख़ल्क़- मानवता

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।

ग़ज़ल

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।
मैं दुश्मन पर भरोसा कर रहा हूँ।

न पूछो आज कल क्या कर रहा हूँ।
मज़ा उल्फ़त का दूना कर रहा हूँ।

मैं हर इक सांस में जीने की ख़ातिर
हवा से अपना सौदा कर रहा हूँ।

तेरी तस्वीर सीने से लगा कर
मैं धड़कन दिल में पैदा कर रहा हूँ।

महब्बत बे असर होती है जिस पर
हर उस शय से किनारा कर रहा हूँ।

कोई सुनता नहीं है प्यार से अब
सो मैं भी तल्ख लहजा कर रहा हूँ।

मैं ख़ुद से लड़ नहीं पाता हूँ लेकिन
ज़माने भर से झगड़ा कर रहा हूँ।

जो दिल में था अधूरापन अभी तक
उसे ग़ज़लों से पूरा कर रहा हूँ।

राजीव कुमार

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम
यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

उसकी अलग है बात अलग उसका रंग है
वो जिसके लिये छोड़ के घर जा रहे हैं हम

राजीव

इक बात कहूं ये जो ईमान सरीखा था। दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

ग़ज़ल

इक  बात   कहूं  ये  जो  ईमान सरीखा था।
दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

आजाद समझते थे जिस शह्र में अपने को।
वो शह्र  की  सूरत  में  जिन्दान सरीखा था।

उस शख़्स की मिट्टी भी मिट्टी में मिली आख़िर।
खुद अपनी नज़र में जो भगवान सरीखा था।

इस भागती दुनिया में देखा जो ठहर कर तो।
अपने सा  लगा  वो जो अन्जान सरीखा था।

नादान  है  ये  दुनिया  कहती है उसे अच्छा।
जो  शख़्स  हकीक़त  में  शैतान सरीखा था।

नफ़रत ने बिगाड़ी है इस मुल्क़ की सूरत को।
वरना तो  वतन अपना  गुलदान सरीखा था।

हर  बार  के  जैसे   ही  वो  मेरी  तबाही पर।
हैरां   तो   नहीं   था  पर  हैरान  सरीखा था।

हिन्दु  था  मुसलमां  था  मालूम  नहीं  लेकिन।
जो  ख़त्म  हुआ  था  वो  इन्सान सरीखा था।

राजीव कुमार

जिन्दान - जेल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।
आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे

जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी
मोहन के साथ ख़्वाब में राधा दिखाई दे

शाइर की आह ठीक है पर शेर है वही
कागज पे हर्फ-हर्फ तङपता दिखाई दे

बीनाई को मेरी ये असर दे मेरे खुदा
जब भी खुले ये आंख सवेरा दिखाई दे

दावा हर एक आप का मानेंगे हम मगर
पूरा कोई तो आप का वादा दिखाई दे

मजबूर कर रहा है ज़माना हमें की हम
सच्चा कहें उसी को जो झूठा दिखाई दे

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...