Friday, July 21, 2017

खुदा जानता है मैं क्या चाहता हूं

फिलबदीह ग़ज़ल

खुदा जानता है मैं क्या चाहता हूं
सभी के लिये मैं शिफा चाहता हूं

हर इक शक्स बीमार है इस जहां में
हर इक दर्द की अब दवा चाहता हूं

न हीरे न मोती न सोने न चांदी
मै बस आप सबकी दुआ चाहता हूं

 तुम्हारे लिये ही कमाई है दौलत
मै कब यार अपना भला चाहता हू

अरे वो कहां है जो सच बोलता था
उसे आज फिर देखना चाहता हूं

गुलों की हिफाजत तो कांटें करेंगे
फजाओं में ठंडी हवा चाहता हूं

ये दैरो-हरम आप ही के लिये हैं
मै खुद के लिये मयकदा चाहता हूं

मुझे मंजिलों की जरूरत नहीं है
मै हमराह बस आप सा चाहता हूं

राजीव कुमार
Rajeev Kumar

आप को हम जबान दे देकर

आप को हम जबान दे देकर
मर गये इम्तिहान दे देकर

बे तकल्लुफ रहा करो मुझ से
थक गया हूं मैं ध्यान दे देकर

जिन्दगी ये भी जिन्दगी है क्या
जी रहा हूं मैं जान दे दे कर

मन की बातें करा करो यारों
झूठे सच्चे  बयान दे देकर

दिल कहां अब किसी की सुनता है
दोस्त आजिज हैं ज्ञान दे देकर

पेट दुनियां का भर रहा है अब
जान अपनी किसान दे देकर

ऐसी माँयें हैं मुल्क में अपने
खुश हैं बेटे जवान दे देकर

राजीव कुमार
Rajeev Kumar

Thursday, July 13, 2017

रोये हालत पे अपने सूरत की

जब कभी आईने से कुर्बत की
रोये हालत पे अपने सूरत की

आज तालीम मुल्क की जैसे
पक्की बुनियाद है इमारत की

झूठ हर बार जीत जाता है
सच बताउं मैं क्या अदालत की

और भी लोग हैं बुरे फिर भी
आपने मुझसे क्युं बगावत की

मुश्किलातों ने उम्र भर हमसे
क्या कहूं कैसी कैसी हरकत की

वक्ते रुक्सत मुझे लगा मुझ पर
जिन्दगी ने बहुत अजीयत की

राजीव कुमार
शुभ रात्री

आओ चल कर देखें हम भी शहरों में

आओ चल कर देखें हम भी शहरों में
क्या रौनक है चलती फिरती लाशों में

कहने को तो बारिस की कुछ बूंदें थी।
लेकिन सब कुछ डूब गया है गावों में

देखा लोगों को आते आरी ले कर
मातम पसरा है तब से इन चिड़ीयों में

सच्चे लोगों में कड़वाहट मिलती है
मीठापन मिलता है अक्सर झूठों में ।

तेरी सूरत, वो लम्हे और कुछ यादें
बाक़ी है अब भी इस दिल के टुकड़ों में

राजीव कुमार

तेरी आंखों ने जब सियासत की

मतला

तेरी आंखों ने जब सियासत की
जान हमने भी तब हिमाकत की

आप से इक दफा मुहब्बत की
उम्र भर हमने फिर इबादत की

मैने ख्वाबों के इक तलातुम से
अपनी आंखों की भी हिफाजत की

दुश्मनी हो गयी जमाने से
हमने जो आप से मुहब्बत की

चांदनी आज फिर नहीं आई
किसने फिर आज भी शरारत की

राजीव कुमार
शुभ रात्री

Wednesday, July 12, 2017

फूल तितली बहार और चमन

दर्द को आपने जिया ही नहीं 
इश्क फिर आप को हुआ ही नहीं

फूल तितली बहार और चमन
तुझसे अच्छा कोई बना ही नहीं

बात करती हैं आप की आंखे।
आप ने ठीक से सुना ही नहीं

क्यु जमाने से लड़ रहा है तू
 खुद से लड़ के जीतता ही नही

रोज हस कर तो बात करता था
अब मगर मुझसे बोलता ही नही

कितनी नदियों को पी गया लेकिन
कैसा सागर है जो भरा ही नही

फिक्र जिसकी हमारे जैसी हो
ऐसे दुनियां में शायरा ही नहीं

हमने देखा है यार उल्फत में
जिसको चाहा वही मिला ही नही

सारी दुनिया जो घूमता है वो
अपने भीतर कभी गया ही नही

किस तरह दिल तुम्हारा बहलेगा
ऐसा नुस्खा मुझे पता ही नही

राजीव

Tuesday, July 11, 2017

आग पानी जमीं और हवा कौन है

कुछ शेर

आग पानी जमीं और हवा कौन है
है कोई जो बता दे खुदा कौन है

नीली साड़ी समन्दर की पहने हुए।
सच बता खूबसूरत धरा कौन है

धरा -धरती

शक्ल सूरत तेरी है गजल की तरह
अब तिरे सामने आईना कौन है

एक दिन खुद ब खुद तू समझ जायेगा
क्या बताउं तुझे तू मिरा कौन है

देख कर मुझको पहली दफा आपने
सबसे बोला था ये सरफिरा कौन है

यूं तो रिस्वत जहां में बुरी बात है
पर मिले तो यहां छोड़ता कौन है

हादसे की तरह एक दम हू ब हू
ये मिरे पास आता हुआ कौन है

राजीव

Saturday, July 8, 2017

रूह को जिस्म के सांचे में बिठा रक्खा है
और इन्सान को मिट्टी का बना रक्खा है

अपनी आंखों में जिसे हमने छुपा रक्खा है
हाय उसने ही हमे खुद से जुदा रक्खा है

जेब खाली हैं मगर दोनो जहां है जिसमें
हमने सीने में उसी दिल को छुपा रक्खा है

आप इक बार तो मांगो न मेरी जां हस के
जान दे देगे कि इस जान में क्या रक्खा है

चाहने वाले बहुत लोग मिरे हैं लेकिन
खुद को तेरे लिये दुनियां से बचा रक्खा है।

राजीव कुमार

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है

ग़ज़ल

रोजगारी भी मियां अब दर्दे सर होने को है
मेरा मतलब जिस्त अपनी दर ब दर होने को है

अपनी मायूसी छुपाने अब कहां जायेगे हम
ये मकाने दिल तो अपना खण्डहर होने को है

बर्फ यादों की तेरी पिघला गयीं तन्हाईयां
अब शुरू आंखो से दरिया का सफर होने को है

आप ने हमको कहा हम भूल जायें आप को
ऐसा लगता है ये किस्सा मुक्तसर होने को है

रास्ते हैं ठोकरें है और हैं कुछ मंजिले
राम जाने कौन अपना हमसफर होने को है ।

कब तलक सोये रहोगे अब तो उठ जाओ मियां
देख लो अब तो सुबह भी दोपहर होने को है

राजीव कुमार

Wednesday, July 5, 2017

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था

पता चला ही नहीं कब जिगर से निकला था
मगर कोई तो मेरे चश्मे-तर से निकला था

हजूमे गम जो दिले बे असर से निकला था
न जाने कौन कहां कब किधर से निकला था

जिधर मेरी नजर नहीं थी हां उधर से ही।
वो साथ छोड़ के मेरा सफर से निकला था

अगर मै लौट के आया तो फिर बताउंगा
किसे तलाशने मैं भी सहर से निकला था

मिरे खिलाफ मेरा अक्स है खड़ा तब से
के जब से आईना मेरी नजर से निकला था

नहा के धूप में आई सूखाने बाल वो जब।
ख़बर उड़ी कि क़मर दोपहर से निकला था।

जला रही है मेरी आशिकी ग़ज़ल की लौ
या फिर ख़्याल ही मेरा श़रर से निकला था ।

उरूज ओ बह्र की नजरों से हो गया खारिज
हर एक शेर जो मेरे जिगर से निकला था

राजीव कुमार

चश्मे-तर - नम आंखें
सहर -- सुबह
अक्स -- प्रतिबिम्ब
क़मर-- चांद
श़रर-- चिंगारी

Tuesday, July 4, 2017

फूल के ही साथ देखो खार है

फूल के ही साथ देखो खार है
गर समझिये तो यही संसार है

गर यही दौरे तरक्की है तो क्युं
हर किसी के हाथ में तलवार है

जिन्दगी भर क्या कमाया सोचिये
मौत के आगे तो सब बेकार है

नेक नीयत आदमीयत छोड़ कर
जहनियत से आदमी बीमार है

खुदकुशी का रोक दे जो सिलसिला
हां किसानो की वही सरकार है।

राजीव कुमार 

मुझको जो तेरी नजर ए इनायत नहीं मिलती

ग़ज़ल

हर इक को इस जहां में महब्बत नहीं मिलती।
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।

अपने लिये हर शख़्स परेशान है मगर।
औरों से कभी इसकी तबीयत नहीं मिलती।

तस्वीरे मुल्क तुम जो अभी देख रहे हो
अच्छे दिनों से इसकी भी सूरत नहीं मिलती

मेरे अजीज दोस्त मिरे हाल पर न जा।
गुर्बत में किसी शख़्स से किस्मत नहीं मिलती

अच्छा हूं बुरा हूं ये मेरी जाती बात है।
रहने दे तुझसे मेरी तबीयत नहीं मिलती

यूं तो जनाब आप की भी उम्र हो गयी ।
इस उम्र में अब हुस्न की दौलत नहीं मिलती

कितना अजीब शह्र है कि दिन में भी यहां।
हमको शरीफ शख़्स की रगबत नहीं मिलती।

राजीव कुमार

Sunday, July 2, 2017

जात मजहब की खातिर न तूफान कर।

जात  मजहब  की  खातिर न तूफान कर।
खुद भी  इन्सान बन  मुझको इन्सान कर।

जिस  जमीं  पर   बसा  है  ये सारा  जहां।
उसकी  मिट्टी  का  थोड़ा तो सम्मान कर।

मयकदे  में  अगर   तुझको   आना है  तो
दफ्न  मिट्टी  में  तू  दीन  ओ  ईमान  कर

गर  मेरी  बेखुदी  से   सिकायत   है  तो।
मुझको काफिर बता मुझ पे अहसान कर।

उम्र   भर   बैठ    कर    तन्हा   रोयेगा  तू।
दिल  की  दुनिया  को  ऐसे न  वीरान कर।

बेदिली     बुजदिली      बेहयाई      जफा।
अपने   भीतर   से   बाहर  ये  सामान कर।

कौन  दिल से  जुड़ा  कौन  मतलब  से  है।
दोस्त  बनने  से  पहले  ये   पहचान    कर।

आज   बाजार   में   दिल   लिये   हूं  खड़ा।
यार   बोली    लगा   मत    परेशान    कर।

इश्क  और  जंग  मे  सब  है  जायज  यहां।
दिल  के  मैदान  पर कुछ  तो  ऐलान  कर।

बंदगी   शायरी    आशिकी     क्या     करूं।
ए  खुदा  जिस्त   थोड़ी   तो   आसान   कर।

राजीव कुमार

आईने के लिये इक आईना जरूरी है

आईने के लिये इक आईना जरूरी है
यार ऐसा है जहां में खुदा जरूरी है

आसमां सर पे उठाने से कुछ नहीं होगा।
बात करने के लिये कायदा जरूरी है

सारे अरमान सभी ख़वाब लग गये बोलो
घर बनाने के लिये और क्या जरूरी है

उम्र भर गम है उठाना इसी लिये शायद
गम भुलाने के लिये मयकदा जरूरी है

दर्द के बाद सफर का मजा भी आयेगा
चलते कदमों के लिये आबला जरूरी है

अबके बारिस में ये महसूस हो रहा है के।
सर्द मौसम में कोई हमनवा जरूरी है

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...