Friday, August 14, 2015

हमेशा मुश्किलों की शक्ल में है।

हमेशा मुश्किलों की शक्ल में है।
सुकूने दिल गमों की शक्ल में है।
पढे लिक्खों की दुनियां में रिफाकत।
किसी से रंजिशो की शक्ल में है।
मुहब्बत की कहानी हर किसी की
अधूरी ख्वाहिशों की शक्ल में है
जिसे अपना कहा था आज वो ही।
नुकीले खंजरों की शक्ल में है।
हिमायत गर करुं ईमान की तो ।
जमाना दुश्मनों की शक्ल में है।
खुदा भी छोङ कर दैरो हरम अब।
जहां में रोटियों की शक्ल में है।
मुकद्दर आईना है मुफलिसों का ।
हुकूमत पत्थरों की शक्ल में है।
हमारे मुल्क में महंगाई जैसे ।
भयानक डायनों की शक्ल में है।
सदाकत देखिये अच्छे दिनों की
सियासी साज़िशों की शक्ल में है
राजीव कुमार
दैरो हरम - मंदिर मस्जिद
सदाकत - सच्चाई
रिफाकत- दोस्ती

शत शत नमन भारत रत्न डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम साहब

शत शत नमन भारत रत्न डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम साहब
हम हार गए आज अपने जिस्मो जान से
कुछ कह भी न सकेंगे दिले बेज़बान से
जज्बा जूनून जोश रवानी ओ फुक्र भी।
सब देके वो चला गया हिन्दोस्तान से
बच्चो लो अब तुम्हारे हवाले हैं मेरे ख्वाब।
देखा करूंगा अब मैं तुम्हें आसमान से
जीना तो इस तरह कि सलामी दे जिन्दगी।
रुख्सत के वक्त देखना निकलोगे शान से।
मजहब बना के मुल्क को सीने से लगा लो।
दुनिया हिला न पायेगी तुमको ईमान से ।
मुझको न याद करना मगर ये न भूलना।
कुछ भी बङा नहीं मेरे भारत महान से।
राजीव कुमार
फुक्र - साधु सज्जनता

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।
कहीं अब मुल्क में क्युं अम्न के परचम नहीं मिलते
अभी इतना ही सोचा था कि इक किस्सा लगा कहने।
सुदामा कृष्ण के जैसे मुझे हमदम नहीं मिलते
सियासत की हवा जबसे फजाओं में घुली तब से
दिवाली ईद होली के हसीं मौसम नहीं मिलते
अना के साथ हैं जो छोङं कर ईमान और गैरत
वो हमसे मिलना चाहे तो भी उनसे हम नहीं मिलते।
राजीव कुमार

सबसे रिश्ता निभा के देख लिया

गजल
सबसे रिश्ता निभा के देख लिया
झूठ सच आजमा के देख लिया ।
दिल को पत्थर बना के देख लिया।
दर्द में मुस्कुरा के देख लिया ।
खुद से खुद को मिला के देख लिया
आज शीशा उठा के देख लिया
जख्म भरते नहीं नुमाईश से।
हमने सबको दिखा के देख लिया
इश्क में कुछ नहीं मिला लेकिन
आसमां सर उठा के देख लिया
शायरी छोङ कर करूंगा क्या ।
रात भर दिल जला के देख लिया
राजीव कुमार

सोचा है देख कर ये लोगों की बेरुखी को

गजल आप सभी की मोहब्बतों के हवाले
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सोचा है देख कर ये लोगों की बेरुखी को
ठुकरा न दूं किसी दिन दुनियां की हर खुशी को।
मजहब सिखा रहे हैं आपस में बैर रखना
इल्जाम दे रहे हो क्यूं सिर्फ आदमी को
हर शक्स ढो रहा है कंधे पे जिस्म अपना ।
रोटी कमा के जिन्दा रक्खा है जिन्दगी को।
मौला वो दिन भी आये इक रोज इस जहां में।
सागर से मीठा पानी बहने लगे नदी को।
नाकामियों का अपनी जब तब्सिरा करोगे।
तब देख पाओगे तुम भीतर छुपी कमी को।
बारिस हवायें मौसम यादें भी आपकी हैं।
सब कुछ तो मिल गया है अब मेरी शायरी को
राजीव कुमार
तब्सिरा -- समिक्षा

फकत दौलत से दुनियां में गुजारा हो नहीं सकता

महफिल के हवाले
फकत दौलत से दुनियां में गुजारा हो नहीं सकता
खुदा तेरे सिवा कोई सहारा हो नहीं सकता
यकीनन एक दिन मिट्टी में हम मिल जायेंगे लेकिन ।
हमारे बाद कोई भी तुम्हारा हो नहीं सकता
वफा ईमान गैरत दीन दुनियां और मेरा दिल ।
समंदर इनसे ज्यादा और खारा हो नहीं सकता ।
बुलंदी तुझको तकती है तू उसको तकता है लेकिन।
फकत तकते ही रहने से खसारा हो नहीं सकता
अरे क्यूं वक्त जाया कर रही है जिन्दगी मुझ पर।
कोई मर कर कभी जिन्दा दुबारा हो नहीं सकता
राजीव कुमार

कहां अब कोई रिश्ता रह गया है।

गजल (महफिल ए गजल)
कहां अब कोई रिश्ता रह गया है।
जहां में सिर्फ पैसा रह गया है।
मुहब्बत बांटता था वो जहां में ।
जो अब सूली पे लटका रह गया है।
चले आये हैं वापस घर नमाजी ।
खुदा मस्जिद में तन्हा रह गया है।
जनाजे उठ रहे हैं आरजू के।
मगर वो शक्स जिन्दा रह गया है।
वरक जो फट चुका है आशिकी का।
किताबों में वो किस्सा रह गया है।
बहार ओ गुल फजायें सब तुम्हारी।
मिरे हिस्से में सहरा रह गया है।
मुहब्बत करके भी ये दिल हमारा ।
अकेला था अकेला रह गया है।
गजल ये भी मुक्मल हो न पायी ।
अभी मक्ता हमारा रह गया है।
राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...