ग़ज़ल
ठोकर न काम आयी तो कांटे बिछा गये।
उनको लगा कि रेस से हमको हटा गये।
रुकने लगे कदम तो उठी दिल से ये सदा
कुछ दूर की ही बात है मंजिल पे आ गये
कुछ भी न अपने पास था इक जान छोड़कर
फिर भी हमारे दोस्त हमें आजमा गये
जिनको न थी उम्मीद वो भी जायेंगे कभी
धरती से ऐसे-ऐसे बहुत देवता गये
इस दौर को जब लोग लिखेंगे तो लिखेंगे
इस दौर में भी लोग थे जो सर कटा गये
जब तक बुलंद हौसला अपना है तब तलक
क्या लेना क्या कमाया और क्या लुटा गये
अब पूछना ही होगा हमें ख़ुद से ये सवाल
इस अहद में हम लाए गए हैं कि आ गये
इक हम हैं जिसे चाहा उसे पा नहीं सके
इक वो हैं हमें छोड़ के हर चीज़ पा गये
राजीव कुमार
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