ग़ज़ल
हमारी दुनिया के मालिकों ने हमारी दुनिया बिगाड़ दी है
कहीं पे जंगल जला रहे हैं कहीं की बस्ती उजाड़ दी है
हर एक अपने सफर में है पर हरइक सफर की नहीं है मंजिल
किसी का सहरे का रास्ता है किसी को राहे पहाड़ दी है
खुदा से मिल कर जरूर इक दिन ये पूछना है हमें ही क्युंकर
हमारी किस्मत के सारे कमरों की बंद हमको किवाड़ दी है
कोई बताये कि इस तरक्की ने हमको आखिर दिया ही क्या है
हमारे सपनों के हर शह्र ने हमारी सांसें उखाड़ दी है
गमों से लड़ना पड़ेगा तुमको हंसो कि हंसना पड़ेगा तुमको
वगरना अश्कों ने देखो कैसे तुम्हारी सूरत बिगाड़ दी है
राजीव कुमार
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