ग़ज़ल
आप अपनी खुशी के मारे हैं
और हम बे खुदी के मारे हैं
ये जो बुझते दिये हैं महफ़िल के
ये सभी रौशनी के मारे हैं
उनकी आंखों में कुछ तो है जिसकी
हम भी जादूगरी के मारे हैं
हम हैं दुनिया है और हम जैसे
लोग यायावरी के मारे हैं
शह्र ए उल्फत में जाने वाले सुन
सब वहां जिंदगी के मारे हैं
इश्क़ की प्यास मर गयी है या
आप सब तिश्नगी के मारे हैं
दिल की बातों की किसको फुर्सत है
सब के सब नौकरी के मारे हैं
हमको मरने का डर नहीं हम तो
यार जिन्दादिली के मारे हैं
पहले उल्फत में जीते मरते थे
आज हम शायरी के मारे हैं
राजीव कुमार
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