हिस्से में मेरे गम की कटौती भी नहीं है
जीने की मगर मुझको चुनौती भी नहीं है
दिल को हमारे आप न किडनैप कीजीये
इतनी हमारे पास फिरौती भी नहीं है
इक तरफा महब्बत को निभा पायेंगे कैसे
गंगा के लिए दिल में कठौती भी नहीं है
उस शख़्स से उल्फत है उसे चाहते हैं पर
मिल जाय वो हमको ये मनौती भी नहीं है।
जब चाहे कोई खेले कोई तोड़ दे इसको
दिल हुस्न के मालिक की बपौती भी नहीं है
बदमाश है मगरूर है दुश्मन है सकूं का
वो शख्स मगर इतना पनौती भी नहीं है
राजीव कुमार
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