ग़ज़ल
कोई रदीफ नहीं है न काफिया है भला
हमारी डायरी मे कुछ नहीं लिखा है भला
न तो हवा ही सही है न फेफड़ा है भला
हमारे वास्ते कुछ भी नहीं बचा है भला
बहुत जियादा नहीं यार सोचना है भला
बुरे तो हम हैं हमारा तो रहनुमा है भला
हम ऐसे लोग जिये या मरें हमारा क्या
हमारी छोड़ो हमें कौन पूछता है भला
गुरूर आप का टूटे न इस लिये साहब
हमारी सांस का इसबार टूटना है भला
हर एक बात पे आँसू बहाना ठीक नही
हर एक सानिहा अब कौन झेलता है भला
बचेंगे लोग तो हर रोज सर उठायेंगे
मेरे हिसाब से इन सब को रौदना है भला
हकीम ए शहर तो बीमार है मगर हाकिम?
अब और कुछ नहीं हमारा बोलना है भला
अमीरे शह्र के बारे में क्या बतायें यहां
न तो निजाम कोई है न औलिया है भला
राजीव कुमार
सानिहा - दुर्घटना
औलिया - संत
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