ग़ज़ल
जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें
नगर में गांव सा मंजर नहीं मिलेगा तुम्हें
तलाश खुद में तुम्हें करना पड़ेगा उसको
ख़ुदा वो शय है जो बाहर नहीं मिलेगा तुम्हें
तुम्हारी ज़िद है तो जाओ बस इतना कहना है
मेरे मिजाज का दिलबर नहीं मिलेगा तुम्हें
कभी मिलो तो बहाने से पूछना वर्ना
किसी हसीन का नम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें
ख़्याल दिल में तुम्हारा है ख्व़ाब आंखों में
तुम्हारा कोई भी बेघर नहीं मिलेगा तुम्हें
जो दिल के घाव सीये ग़म भी टांक दे सारे
हमारे जैसा रफूगर नहीं मिलेगा तुम्हें
सफ़र हयात का होता तो है हसीन मगर
सुकून इस पे घङी भर नहीं मिलेगा तुम्हें
चला गया तो मेरी जान मेरे आने का
हो जिसमें दिन वो कैलेंडर नहीं मिलेगा तुम्हें
राजीव कुमार
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