Tuesday, April 6, 2021

जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें

ग़ज़ल 

जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें 
नगर में गांव सा मंजर नहीं मिलेगा तुम्हें

तलाश खुद में तुम्हें करना पड़ेगा उसको 
ख़ुदा वो शय है जो बाहर नहीं मिलेगा तुम्हें

तुम्हारी ज़िद है तो जाओ बस इतना कहना है 
मेरे मिजाज का दिलबर नहीं मिलेगा तुम्हें

कभी मिलो तो बहाने से पूछना वर्ना
किसी हसीन का नम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें

ख़्याल दिल में तुम्हारा है ख्व़ाब आंखों  में 
तुम्हारा कोई भी  बेघर नहीं मिलेगा तुम्हें

जो दिल के घाव सीये ग़म भी टांक दे सारे
हमारे जैसा रफूगर नहीं मिलेगा तुम्हें

सफ़र हयात का होता तो है हसीन मगर 
सुकून इस पे घङी भर नहीं मिलेगा तुम्हें

चला गया तो मेरी  जान मेरे आने का 
हो जिसमें दिन वो कैलेंडर नहीं मिलेगा तुम्हें

राजीव कुमार

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