ग़ज़ल
दिल से निकले तो हर इक बात जबां तक पहुंचे
ये महब्बत की सदा कौन-ओ-मकां तक पहुंचे
कौन-ओ-मकां- संसार
इश्क़ मरता नहीं दुनिया में उन्ही लोगों का
छोङ के जिस्म जो महबूब की जां तक पहुंचे
तब समझ आया महब्बत के सफर का मतलब
जब बहारों के हसीं फूल खिजां तक पहुंचे
शह्र दर शह्र भटकते हुए वीरानों में
हमसे पूछो न कहां पर थे कहां तक पहुंचे
सिर्फ सीने में उतरना ही नहीं है काफी
तीर वो है जो निगाहों से दिलाँ तक पहुंचे
दिलाँ - hearts
मेरी ख्वाहिश है कि आंखों से जो तुम कहती हो
ये भी अंदाज कभी हर्फे बयां तक पहुंचे
मुझसे मिलने के लिये उसका पहुचना मुझ तक
जैसे मुमताज महल शाह-जहां तक पहुंचे
इक इसी आस में ये नज्म ग़ज़ल शेर कहे
कोई पैगाम तो उस दुश्मने जां तक पहुंचे
राजीव कुमार
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