गीत
इक नई आस दे इक नई दे सहर
तू अगर है तो नजरे इनायत तो कर
जिन्दगी दर ब दर देख ले हो गयी
हर खुशी बे असर देख ले हो गयी
सारे मंजर पे मातम है पसरा हुआ
दिल की दुनिया मे हर एक रोता हुआ
अब परिन्दों के हक में रहें किस तरह
अब दरख्तों के हक में रहें किस तरह
चांद तारों की बाते करे किस तरह
हम नजारों की बाते करे किस तरह
गीली आंखों मे फिर से चमक चाहिये
अब नही और इनमें नमक चाहिये
स्याह रातों की वीरानिया खत्म हो
सांस लेने की दुश्वारियां खत्म हो
सबको होठों पे अब कहकसां टांग दे
सबके चेहरों पे वो वाकया टांग दे
सुब्ह सबनम की हल्की नमी से सजे
शाम अपनी हर इक रौशनी से सजे
Rajeev kumar
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