Thursday, April 1, 2021

निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या

 ग़ज़ल 

निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या 
टूटा है  ये  मकान   मगर   तुमको इससे क्या

आंखें  चुका  रहीं  हैं  गमे  हिज्र  का हिसाब 
हो  कर  लहू लुहान  मगर तुमको इससे क्या

मायूस  जब  हुआ तो कहा दिल से अक्ल ने
होता है मेरी  जान  मगर  तुमको इससे क्या 

आंखो में  कितने  डूब गये ख्वाब आज तक 
फिर भी हूं शादमान मगर तुमको इससे क्या

अपने  लिये  तो बोलते तो हो चीखते भी हो 
हम तो हैं बे-जबान मगर तुमको इससे क्या

दुनियां  की  दौलतें  हों   इकट्ठा  तुम्हारे  घर 
चाहे  लुटे  जहान  मगर  तुमको  इससे क्या

अपनी    अना    में   चूर  रहो  और  यू रहो  
गिर जाये आसमान मगर तुमको इससे क्या

हर  रोज  लड़  के  मर रहे  हैं  अपने देश में 
हिन्दू से मुसलमान मगर  तुमको  इससे क्या 

थाली   में   रोटी  दाल   हमारी  परोस  कर 
भूखा है वो किसान मगर तुमको इससे क्या

राजीव कुमार

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