ग़ज़ल
जाने किस शय को पाने के इम्कान में।
हम चले आये हैं शह्र ए वीरान में
वक्त ऐसा भी आयेगा सोचा न था
लोग खुद रहना चाहेंगे जिंदान में
रोज आंखे दिखाता था सागर सो हम
लौट आये हैं साहिल से तूफान में
जब से देखा है तुमको तुम्हे क्या पता
सारे गुल हैं परेशां गुलिस्तान में
उसका जाते हुए चूम लेना मुझे
फायदा में हूं या के हूं नुकसान में
जिन्दगी की अजीयत से इक पल सूकूं
कैसे पायेंगे हम दौर ए हिज्रान में
हिज्रान- जुदाई
अच्छे अच्छे बिखर जाते हैं टूट कर
हमने देखा है उल्फ़त के दौरान में
प्रेम क्या है समझना है तो देखिये
या तो मीरा के दिल में या रसखान में
राजीव कुमार
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