Wednesday, May 31, 2017

कभी चाहा नहीं हमने कि हेमा मिल गयी होती ।

पेशे खिद़मत है कुछ नये अंदाज में ।
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कभी चाहा नहीं हमने कि हेमा मिल गयी होती ।
बस इतना चाहते थे हम कि विद्या मिल गयी होती।
(हेमा-पृथ्वी   विद्या- शिक्षा)

कई सागर इन आंखों में लिये फिरते तो हैं लेकिन ।
हमारी प्यास मिट जाती जो सरिता मिल गयी होती ।

अंधेरा सारी दुनियां से मिटा देता मैं इक पल में ।
अगर मुझको मेरे भीतर की दीपा मिल गयी होती।

मेरा घर भी किसी मंदिर के मानिंद हो गया होता।
अनुष्का बन के गर मुझको तनूजा मिल गयी होती ।
(मानिंद - की तरह , अनुष्का - दुर्गा स्वरूप , तनूजा - बेटी )

बहुत से लोग धरती पर कभी भूखे नहीं रहते।
जो खेतों और खलिहानों को बरखा मिल गयी होती।
(बरखा - बारिश)

हर इक इन्सान अपनी जात से बाहर निकल जाता ।
अगर दुनिया को खुशियों की मनीषा मिल गयी होती।
(मनीषा - इच्छा )

जगाने हर सुब्ह मुझको चली आती जो बागो में ।
मुझे गर सारिका बन कर प्रियंका मिल गयी होती।
(सारिका -कोयल, प्रियंका - सून्दर स्त्री )

राजीव कुमार

Sunday, May 28, 2017

खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।

ग़ज़ल

खानाबदोश दिल का ठिकाना इधर उधर।
अच्छा है यार दिल का लगाना इधर उधर

तुम झूठ बोलने का मजा उनसे पूछना
आता है जिनको बात घुमाना इधर  उधर ।

पहले ही जल रहे हैं शह़र के शह़र यहां ।
अब छोड़िये भी आग लगाना इधर उधर

ए जान आप अपनी नजर पर नजर रखो
अच्छा नहीं नजर का मिलाना इधर उधर

अपने ख़याल अपनी ज़बां अपनी फ़िक्र का
मैं भी लुटा रहा हूँ ख़ज़ाना इधर उधर

महफिल है शायरों की जरा दिल से बैठना।
आ कर नहीं है आपको जाना इधर उधर

ये चार दिन की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या ।
देखो भटक रहा है जमाना इधर उधर

अपने बदन का बोझ उठाना है इस लिये ।
हमको भी पड़ रहा है कमाना इधर उधर

राजीव कुमार

दिल की दुनियां में हर पल खुशी के लिये

दिल की दुनियां में हर पल खुशी के लिये
शायरी कीजिये जिन्दगी के लिये

हद से ज्यादा सराफत भी अच्छी नहीं
आज के दौर में आदमी के लिये।

सोने चांदी नहीं हीरे मोती नहीं ।
हम तो आये हैं तेरी खुशी के लिये ।

दिल तड़पता रहे आंख बहती रहे।
ये भी अच्छा नहीं आशिकी के लिये

फूल खिलने लगे और महकने लगे
गा रही है फजा आप ही के लिये

चांद भी सोचता रह गया रात भर
आपका है या है चांदनी के लिये

पीठ पर हम भी खंजर संम्भाले हुए
मर गये दोस्तो दोस्ती के लिये

हम फकीरों का दौलत से क्या वास्ता
हम तो जीते ही हैं मुफलिसी के लिये

आईये हमसे सिकवे गिले कीजिये
हम तो काबिल नहीं दुश्मनी के लिये

रौशनी की हिमायत में मत भूलिये
रौशनी भी तो है तीरगी के लिये

शाम के सात अब बज गये देखिये
आईये अब चले मय कसी के लिये

राजीव कुमार
🙏🏻

Friday, May 26, 2017

आप की दी हुई सजाओं से

ग़ज़ल

आप की दी हुई सजाओं से
कौन डरता है अब गुनाहों से।

टूट जाना ही आशिकी है तो
हमको लेना है क्या वफाओं से

मंजिलें उनको ही हुई हासिल
रुक न पाये जो आबलाओं से।

दर्दे उल्फत भी दर्द ऐसा है
खत्म होता नहीं दवाओं से।

ये दिया दिल का बुझ न पायेगा
सहमी सहमी हुई हवाओं से।

ऐ खुदा तू ही अब बचायेगा
हमको इस दौर के खुदाओं से।

राजीव

Thursday, May 25, 2017

तू जो साकी मेरा नहीं होता

तू जो साकी मेरा नहीं होता
मैं भी मयकस बना नहीं होता

दिल के अरमान जल रहे होते
सच कहुं गर दिया नहीं होता ।

ये गमे दिल ये शब ये तन्हाई।
आज कल कुछ नया नहीं होता

जंग में फिर भी कुछ तो शर्ते हैं
इश्क में देख क्या नहीं होता ।

ये लो अखबार तो पढ़ो राजीव
झूठ से सच बड़ा नहीं होता ।

राजीव कुमार

🙏🏻🙏🏻

यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।

ग़ज़ल

यहाँ तुम और हम उलझे हुए हैं।
कि जैसे दो क़दम उलझे हुए हैं।

मेरे दिल की हज़ारों धड़कनों में।
ज़माने भर के ग़म उलझे हुए हैं।

निकलना चाहते हैं खुद से बाहर ।
मगर हम दम ब दम उलझे हुए हैं।

तरक़्क़ी की नुमाइश हो रही है।
मगर दैरो-हरम उलझे हुए हैं।

ये जज़्बा ए मुहब्बत है कि हमसे।
सितमगर और सितम उलझे हुए हैं।

हयातो हश्र की दुनिया में यारों।
बहुत से पेंचो खम उलझे हुए हैं।

उधर एहसास घुटकर चीखते हैं।
इधर लफ़्ज़ों में हम उलझे हुए हैं।

राजीव कुमार

Wednesday, May 17, 2017

कैसा गुजरा ये साल मत पूछो

कैसा गुजरा ये साल मत पूछो
हम फकीरों का हाल मत पूछो

आप जो बोल दो वही सच है।
आप हमसे सवाल मत पूछो।

यार जन्नत से आ रहा हूं मैं
कैसे था नैनीताल मत पूछो

राजीव कुमार

दर्द जाये न शायरी जाये

बस यूं ही

दर्द जाये न शायरी जाये
जान जाती है तो चली जाये

दर्द को देख कर हसी आये
जिन्दगी इस तरह भी जी जाये

अब दिये इल्म के भी हों रौशन
अब दिलों से भी तीरगी जाये

सबके दिल को जबान दे मौला
ताकी दिल की भी अब कही जाये

अपने बेटे के फिक्र में अम्मी
देखो सरहद पे न चली जाये

आप ने एक न सुनी मेरी
क्यु भला आप की सुनी जाये

राजीव कुमार

दरिया सागर सहरा अम्बर क्या क्या है।

ताजा गज़ल

दरिया सागर सहरा अम्बर क्या क्या है।

क्या बोलूं इस दिल के अन्दर क्या क्या है।

जब तक दुनियां है और दुनियादारी है।

मत पूछो दुनियां में बेहतर क्या क्या है।

कत्लो गारत झूठ ओ नफरत मक्कारी ।

अखबारों को देखो पढ कर क्या क्या है।

इक दो दिन ईमान रखो फिर समझोगे।

रोटी चावल दाल मयस्सर क्या क्या है।

इश्क की बातें हम से पूछ रहें हैं क्युं।

आखिर आपके दिल के भीतर क्या क्या है ।

उनका चेहरा उनकी आंखें और दो लब।

चाकू छूरी नश्तर खंजर क्या क्या है ।

आप की खातिर आप का राजीव देखो तो ।

आशिक पागल प्रेमी शायर क्या क्या है।

राजीव कुमार

इश्क अकीदत दाम दिरम यारी का किस्सा

इश्क अकीदत दाम दिरम यारी का किस्सा।
यही है दुनियाभर की बीमारी का किस्सा ।

आग का मौसम आग की बारिस और मिरा घर।
किसे सुनाउं अपनी दुश्वारी  का किस्सा।

कहीं था रस्ता कहीं थी मंजिल और कहीं मैं
छोड़ो भी अब ऐसी लाचारी का किस्सा

मौत मुकर्रर जिस्त मुसीबत क्या अच्छा है।
मुझे पता है इस दुनियादारी का किस्सा।

मुल्क तरक्की के रस्ते है और नौजवां ।
बता रहा है अपनी बेकारी का किस्सा ।

गहरा सागर टूटी किश्ती दूर है साहिल ।
कौन सुनेगा  जंग की तैयारी का किस्सा।

खुद से जीतूं खुद को हारूं सोच रहा हूं ।
यही है मेरी मुझसे गद्दारी का किस्सा ।

राजीव कुमार

दाम दिरम -रुपया पैसा

जम्हूरीयत के नाम पे कुछ ऐसा हुआ है ।

जम्हूरीयत के नाम पे कुछ ऐसा हुआ है ।
बच्चा बड़ा बूड़ा हर एक सहमा हुआ है।

बन्दूक की गोली तो आ पहुंची है घर तलक।
सरहद की सियासत में मुल्क उलझा हुआ है।

पत्थर लिये सड़क पे आ गयी है अब अवाम।
अपना निजाम अब भी मगर सोया हुआ है।

अपने ही लोग अपनो की कब्रें रहे हैं खोद।
दुश्मन जो था वो चैन से अब बैठा हुआ है।

हर रोज अम्न के जहां उठते हैं जनाजे ।
उस सर जमीं पे किसका अलम फहरा हुआ है।

घर लौट के आते हैं तो मां पूछती है अब
बेटा तू तिरंगे से ही क्युं लिपटा हुआ है।

कश्मीर का जन्नत से जहन्नुम के सफर पर ।
क्या और कहुं पहले ही सब लिक्खा हुआ है।

राजीव कुमार

अलम -- झंण्डा

बुरी आदत से मुक्ती मिल गयी तो !

गजल 😂😂😂😂

बुरी आदत से मुक्ती मिल गयी तो !
तेरी यादों से छुट्टी मिल गयी तो !

बहुत चाहा कि तुझको खत लिखूं पर
तेरे बापू को चिट्ठी मिल गयी तो !

मुझे तड़पाने वाली क्या करेगी !
मुझे तुझसे भी अच्छी मिल गयी तो !

मियां बच्चो की फिर किसको जरूरत
अगर बीवी ही छोटी मिल गयी तो !

नहीं देती है अब ससूराल जाने
उसे डर है कि साली मिल गयी तो!

मेरा ईमान तो पक्का है लेकिन
कहीं नोटो की गड्डी मिल गयी तो !

मिलेगी हर किसी को मुफ्त बोतल
अगर इस बार कुर्सी मिल गयी तो !

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...