Saturday, July 18, 2020

तन्हाई का बोझ उठा लूं ग़म को गले लगा लूं मैं।

ग़ज़ल

तन्हाई  का  बोझ  उठा  लूं  ग़म  को गले लगा लूं मैं।
सोच  रहा हूं  अपने  घर  में इक घर और बसा लूं मैं।

जंगल  काटे  शह्र  बसाये  शह्र बसा कर याद आया।
गमले में  इक पेड़ लगा कर छत पर उसे सजा लूं मैं।

कैसे  घर  का  खर्च  चलेगा  सोच  रहा  था  इतने में।
हुक़्म हुआ  कि  जैसे भी हो अपना काम चला लूं मैं।

इश्क़ उसी से दिल  में वो ही और इबादत उसकी ही।
जी  करता  है  मन-मंदिर में  उसका बुत बनवालूं मैं।

ग़म का मौसम ह़िज्र का आलम रंज ख़मोशी वीरानी।
इन  कांटों  को  फूल  बना  लूं  या ग़ज़लों में ढालूं मैं।

दोस्त  पड़ोसी दफ़्तर दुनिया अपनी हर आज़ादी पर।
अब  हाकिम  ये  बोल  रहा  है  इक पहरा बैठा लूं मैं।

शह्र  के  हर  कोने में उगती वहशत देख के लगता है।
इस  जंगल  में  इक  चिंगारी  अबकी  बार  उछालूं मैं।

राजीव कुमार

Wednesday, June 10, 2020

ग़ज़ल को नूर दिया काम शाइरों को दिया।

ग़ज़ल

ग़ज़ल को नूर  दिया   काम शाइरों को दिया।
उसे तलाश करो जिसने आँसुओं को दिया।

ये  घाव  दिल  पे मुहब्बत की नेमतें समझो।
दर अस्ल ज़ख़्म वही है जो दूसरों को दिया।

बहुत  हसीन   बहुत  लाजवाब   होगी   तुम।
उसे  पता था  तभी  उसने आईनों को दिया।

दरख़्त   फूल   परिंदे    फ़ज़ाओं  की रंगत।
मुसव्विरों    ने   यही रूप  पर्वतों को दिया।

क्यूँ उसको कोई नहीँ देख सुन समझ सकता।
वो जिसने सबके लिये अपनी रहमतों को दिया।

उसी    रक़ीब  से  उम्मीद  अब  सभी  को  है।
हर एक  ज़ख़्म  यहाँ जिसने  बेबसों को दिया।

तड़पते  भूख   से   बच्चों   का  पेट  भरती है।
ज़कात  वो  नहीं  जो हमने बुतक़दों को दिया।

इसी   ज़मीन  की  मिट्टी  में   दफ़्न  है  वो  भी।
ज़मीं को बाँट के जिस शह ने सरहदों को दिया।

राजीव कुमार

मुसव्विर- चित्रकार

Sunday, May 31, 2020

तन्हाई ने मेरे अन्दर इतनी जगह बना ली है।

ग़ज़ल 

तन्हाई  ने   मेरे   अन्दर   इतनी  जगह  बना  ली  है।
दिल  बैठा है  आंख  भरी है लेकिन कमरा खाली है।

बादल की काली  चादर को ओढ़ के सूरज बैठ गया।
इस  मंजर  को  गौर  से  देखो  बारिश  होने वाली है।

दौलत  शोहरत  इश्क  इबादत   बेतर्तीबी   खुदगर्जी।
एक बुरी  लत  की  दुनियां में  सबने आदत डाली है।

सोच  रहा हूं  बैठ के  अपने  कमरे  के  इक  कोने में।
सिगरेट के इस शौक में अपने घर में आग लगा ली है।

इक-इक मुजरिम कौन पकङता इस मुश्किल में हाकिम ने।
पूरे  शह्र  को  जेल  बनाने  की  तरकीब  निकाली  है।

होटल   कैफे   माल   सिनेमा   चौराहे   और   घंटाघर। 
वीरानो   ने   इनके   भीतर   बस्ती   एक  बसा  ली  है।

दोष  किसी  का  नहीं  है लेकिन सबकी लापरवाही से।
गांव  की  रौनक चली गयी है शह्र में सबकुछ खाली है।

राजीव कुमार

Thursday, May 28, 2020

होली दिवाली ईद की नूरी तेरे बगैर

ग़ज़ल

होली  दिवाली ईद  की नूरी तेरे बगैर
हर इक ख़ुशी है आधी अधूरी तेरे बगैर

गुलशन नदी पहाङ ये फूलों पे तितलियाँ
कुछ भी नहीं है इतना  जरूरी तेरे बगैर

तेरे बगैर कैसे मुकम्मल हो जिन्दगी
जब इक गजल न हो सकी पूरी तेरे बगैर

बस दो कदम की दूरी है कालिज से घर मगर।
लगती है साठ मील की दूरी तेरे बगैर

है खुदकुशी गुनाह तो जिन्दा हूं मैं मगर
है जिन्दगी भी गैर जरूरी तेरे बगैर

बे रंग हो गया है तेरे बाद भीमताल
बेनूर  हो गयी है मसूरी तेरे बगैर

राजीव कुमार

किस मोड़ पर है जिस्त हमारी तेरे बगैर

ग़ज़ल

किस  मोड़  पर  है जिस्त हमारी तेरे बग़ैर।
लगती  है  एक  सांस  भी  भारी तेरे बग़ैर।

तुझसे मिले तो इश्क़ का पौधा पनप गया।
बिछड़े  तो वक़्त बन गया आरी तेरे बग़ैर ।

तू साथ  है  तो  जीने  में है अस्ल जायका।
वर्ना  तो  हर  मिठास  है  खारी  तेरे बग़ैर।

चाँद आज फिर उदास है ये सोच सोच कर।
कैसे    करेगा   रौशनी    जारी   तेरे   बग़ैर।

तेरी महक से रोज महकते थे जिसके फूल।
सूनी  पड़ी  है दिल की वो क्यारी तेरे बग़ैर।

आंसू   बहाये   शेर  कहे  सिगरिटें  भी  पी।
मत  पूछ   कैसे   रात   गुजारी   तेरे   बग़ैर।

तू  है  जो  मेरे  साथ  तो  है  लग्जरी हयात।
वरना   है   बोलेरो   भी  खटारी   तेरे  बग़ैर।

राजीव कुमार

भटकी हुई उदास कभी ज़िन्दगी न थी।

ग़ज़ल

भटकी   हुई   उदास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।
इतनी  भी  बदहवास कभी  ज़िन्दगी  न थी।

पहले  भी  पुर सकून नहीं  थी ये सच है पर।
इस  दर्ज़ा  ग़म शनास  कभी ज़िन्दगी न थी।

रस्ते  पता  नहीं   है  मगर  हम  सफर  में हैं।
इस  तौर  बे   कयास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

आईन,   इंन्तज़ाम,  शह्र,  मुल्क़ का निज़ाम।
हर  शय  से  यूं  निरास कभी ज़िन्दगी न थी।

तकलीफ़,  भूख,  प्यास, थकन मौत ले गयी।
यानी  हमारे  पास   कभी   ज़िन्दगी   न  थी।

पटरी   पे  थक  के सो गये मजदूर तब लगा।
सचमुच किसी की दास कभी ज़िन्दगी न थी।

कुछ ग़म तो कुछ खुशी से ये आधी तो थी भरी
खाली  पड़ी  गिलास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

ये जान कर भी चलते रहे घर की ओर हम।
क़दमों  के  आस-पास कभी ज़िन्दगी न थी।

दुनिया  को  आज  देख कर ये सोचता हूं मैं।
इतनी  भी  बेलिबास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।

राजीव कुमार

Thursday, May 21, 2020

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

ग़ज़ल غزل

मंज़िल के लिये कोई डगर है कि नहीं है
दुश्वार ये सांसों का सफ़र है कि नहीं है

मज़दूर पे क्युं गिरती है हर दर्द की बिजली   l
दावों की हकीक़त पे नज़र है कि नहीं है।

जिस शख़्स ने इस शह्र को तामीर किया था
उस शख़्स का इस शह्र में घर है कि नहीं है l

भर पेट मयस्सर नहीं दो वक़्त की रोटी
इसकी मेरे हाकिम को ख़बर है कि नहीं है

मै धूप में बैठा हुआ ये सोच रहा हूं
कुछ मेरी दुवाओं में असर है कि नहीं है

बस्ती को बयाबान बना दे न किसी दिन l
इक़दाम ए हकूमत पे नज़र है कि नहीं  है

कल शाम उजालों को निगल बैठा अँधेराl
सूरज तुझे कुछ इसकी ख़बर है कि नहीं हैl

क्युं दिल मे सजाये हैं किसी ग़ैर के सपने
दिल टूटने  का आप  को डर है कि नहीं है।

सूरज की तपिश ओढ़ के देता है तुझे छांव ।
इंसान तेरे हक़ में शज़र है कि नहीं है l      (शजर- पेड़)

रिश्तों में महब्बत में ज़रूरत में उलझ कर
बेचैन हर इक वक़्त बशर है कि  नहीं  है।  ( बशर- इन्सान)

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...