Wednesday, March 11, 2020

उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर



उल्फ़त के पेच ओ ताब से दो चार कदम दूर
रहना है अब शराब से दो चार कदम दूर

उसकी गली में आके हमे लग रहा है की
हम भी है माहताब से दो चार कदम दूर

कटते रहे शज़र तो इन्हीं गर्मीयों में दोस्त
हम होंगे आफताब से दो चार कदम दूर

सहरा ए इज्तिराब के हम आ गये हैं पास
जब भी हुए खिताब से दो चार कदम दूर

हमने बनाया जिसको हमारा जवाबदेह
वो ही है हर जवाब से दो चार कदम दूर

हमको दिखा के फूल जो बोते रहे हैं खार
रहिये उन्ही जनाब से दो चार कदम दूर।

राजीव कुमार
गुराब- अहम

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है

ग़ज़ल

हर तरफ जह्र सी तासीर नज़र आती है
स्थिती शह्र की  गम्भीर  नज़र आती है।

Har taraf jahar si tashir nazar aati hai
Isthiti sahar ki gammbhir nazar aati hai

आलम ए रंज ये वहशत ये सभी जलते घर
खून सी ख़ल्क़ की तस्वीर नज़र आती  है

Alam e ranj ye vahashat ye sabhi jalte ghar
Khoon si khalk ki tashvir nazar aati hai

ये तरक्की या तबाही है? हमें बतलाओ
क्युं हर इक हाथ में शमशीर नज़र आती  है

Ye tarakki ya tabahi hai hume batlao
Kyun har ik hath main shamshir nazar aati hai

मेरे साये की तरह साथ हर इक रस्ते पर
मौत जैसे कोई रहगीर नज़र आती है

Mere saaye ki tarah sath har ik rashtey per
Mout jaise koi rahgir nazar aati hai

गांव से शह्र में जाता हूं तो मां की सूरत
हर दफा पांव की जंजीर नज़र आती  है

Gaon se sahar main jata hun to maa ki surat
Har dafa paon ki janzeer nazar aati hai

दिल मेरा था भी नहीं थी तो बस इक जां अपनी
वो भी इक शख़्स की जागीर नज़र आती है

Dil mera tha bhi nahi thi to bas ik jan apni
Wo bhi ik shakhs ki jagir nazar aati hai

उसका लहजा है तरन्नुम में ग़ज़ल कहने सा
वो किसी नज़्म की ताबीर नज़र आती है

Uska lahza hai tarannum main ghazal kahne sa
Wo kisi nazm ki tabir nazar aati hai

राजीव कुमार

ख़ल्क़- मानवता

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।

ग़ज़ल

जरूरत से ज़ियादा कर रहा हूँ।
मैं दुश्मन पर भरोसा कर रहा हूँ।

न पूछो आज कल क्या कर रहा हूँ।
मज़ा उल्फ़त का दूना कर रहा हूँ।

मैं हर इक सांस में जीने की ख़ातिर
हवा से अपना सौदा कर रहा हूँ।

तेरी तस्वीर सीने से लगा कर
मैं धड़कन दिल में पैदा कर रहा हूँ।

महब्बत बे असर होती है जिस पर
हर उस शय से किनारा कर रहा हूँ।

कोई सुनता नहीं है प्यार से अब
सो मैं भी तल्ख लहजा कर रहा हूँ।

मैं ख़ुद से लड़ नहीं पाता हूँ लेकिन
ज़माने भर से झगड़ा कर रहा हूँ।

जो दिल में था अधूरापन अभी तक
उसे ग़ज़लों से पूरा कर रहा हूँ।

राजीव कुमार

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

अपनी गली से उसकी डगर जा रहे हैं हम
यानी कि आज पंत नगर जा रहे हें हम

उसकी अलग है बात अलग उसका रंग है
वो जिसके लिये छोड़ के घर जा रहे हैं हम

राजीव

इक बात कहूं ये जो ईमान सरीखा था। दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

ग़ज़ल

इक  बात   कहूं  ये  जो  ईमान सरीखा था।
दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

आजाद समझते थे जिस शह्र में अपने को।
वो शह्र  की  सूरत  में  जिन्दान सरीखा था।

उस शख़्स की मिट्टी भी मिट्टी में मिली आख़िर।
खुद अपनी नज़र में जो भगवान सरीखा था।

इस भागती दुनिया में देखा जो ठहर कर तो।
अपने सा  लगा  वो जो अन्जान सरीखा था।

नादान  है  ये  दुनिया  कहती है उसे अच्छा।
जो  शख़्स  हकीक़त  में  शैतान सरीखा था।

नफ़रत ने बिगाड़ी है इस मुल्क़ की सूरत को।
वरना तो  वतन अपना  गुलदान सरीखा था।

हर  बार  के  जैसे   ही  वो  मेरी  तबाही पर।
हैरां   तो   नहीं   था  पर  हैरान  सरीखा था।

हिन्दु  था  मुसलमां  था  मालूम  नहीं  लेकिन।
जो  ख़त्म  हुआ  था  वो  इन्सान सरीखा था।

राजीव कुमार

जिन्दान - जेल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।
आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे

जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी
मोहन के साथ ख़्वाब में राधा दिखाई दे

शाइर की आह ठीक है पर शेर है वही
कागज पे हर्फ-हर्फ तङपता दिखाई दे

बीनाई को मेरी ये असर दे मेरे खुदा
जब भी खुले ये आंख सवेरा दिखाई दे

दावा हर एक आप का मानेंगे हम मगर
पूरा कोई तो आप का वादा दिखाई दे

मजबूर कर रहा है ज़माना हमें की हम
सच्चा कहें उसी को जो झूठा दिखाई दे

राजीव कुमार

Tuesday, December 31, 2019

जिसको जाना था जा चुका है अभी

ग़ज़ल

जिसको जाना था जा चुका है अभी
दर खुला किस लिये रखा है अभी

क्या हुआ ये भी सोचना है अभी
वो ही क्यु हमसे मुब्तिला है अभी

आग दिल मे लगा के अपने ही
दिल को जलता भी देखना है अभी

शह्र जाना है तो चले जाओ
पर वहां धुंध की हवा है अभी

कितने लोगों ने खुदकशी की है
और कितनों को ढूबना है अभी

किस तरह पैरहन से पहचानें 
मुल्क़ में कौन मर रहा है अभी

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...