साल की आखरी ग़ज़ल 🙂
जो अपने आप से हारे हमारे अपने हैं
फलक से टूटे सितारे हमारे अपने हैं
फरेब रंज ख़सारे हमारे अपने हैं
वफा के सारे इदारे हमारे अपने हैं
हम अपना दर्द किसी को नहीं बता सकते
हमारी आंख के धारे हमारे अपने हैं
जहांन आप का रखिये मगर जहां के सब
हैं जितने रिंद वो सारे हमारे अपने हैं
इसी ख्याल के चक्कर में दोनों डूब गये
के इस नदी के किनारे हमारे अपने हैं
हमें न आग का डर है न दिल के जलने का
हवा हमारी शरारे हमारे अपने हैं
जो खुश हैं उनमें कोई एक भी नहीं अपना
ये सारे इश्क के मारे हमारे अपने हैं
राजीव कुमार