Sunday, December 31, 2023

जो अपने आप से हारे हमारे अपने हैं

साल की आखरी ग़ज़ल 🙂

जो अपने आप से हारे हमारे अपने हैं 
फलक  से टूटे सितारे  हमारे अपने हैं

फरेब  रंज   ख़सारे  हमारे   अपने  हैं
वफा   के  सारे  इदारे  हमारे अपने हैं

हम अपना दर्द किसी को नहीं बता सकते
हमारी  आंख  के  धारे हमारे अपने हैं

जहांन आप का रखिये मगर जहां के सब
हैं  जितने रिंद वो सारे हमारे अपने हैं

इसी ख्याल के चक्कर में दोनों डूब गये
के इस नदी के किनारे हमारे अपने हैं

हमें न आग का डर है न दिल के जलने का
हवा   हमारी   शरारे   हमारे   अपने हैं

जो खुश हैं उनमें कोई एक भी नहीं अपना
ये  सारे  इश्क  के  मारे  हमारे अपने हैं

राजीव कुमार

Sunday, December 24, 2023

त का भइल कि जेब से हमन के थोड़ी धन गइल

भोजपुरी ग़ज़ल 

त का भइल कि जेब से हमन के थोड़ी धन गइल
इ कम बा का कि सांझ के हमन के प्लान बन गइल

हमन के भाग खेल में ए प्रेम के बा ए तरे 
कि जइसे कैच छोड़ला के बाद एगो रन गइल

ए साकी तोहरे हाथ से शराब जब पियेनी हम
बुझाला जइसे रुह ए बदन से ओ बदन गइल

खुशी हमन के देख के दुखी बस ऊहे लोग बा
कि जेकरे गिलास में न दूगो पैग तक निमन गइल

तहार दर्द दर्द ह हमार दर्द शायरी 
कईगो शायरन में काल्ह एतने प ठन गइल

ह आज ड्राई डे इबात जइसही पता चलल
जमीन पांव से गइल आ माथ से गगन गइल

राजीव कुमार

Tuesday, December 19, 2023

हमारी दुनिया के मालिकों ने हमारी दुनिया बिगाड़ दी है

ग़ज़ल 

हमारी दुनिया के मालिकों ने हमारी दुनिया बिगाड़ दी है
कहीं पे जंगल जला रहे हैं कहीं की बस्ती उजाड़ दी है

हर एक अपने सफर में है पर हरइक सफर की नहीं है मंजिल
किसी का सहरे का रास्ता है किसी को राहे पहाड़ दी है

खुदा से मिल कर जरूर इक दिन ये पूछना है हमें ही क्युंकर
हमारी किस्मत के सारे कमरों की बंद हमको किवाड़ दी है

कोई बताये कि इस तरक्की ने हमको आखिर दिया ही क्या है
हमारे सपनों के हर शह्र ने हमारी सांसें उखाड़ दी है

गमों से लड़ना पड़ेगा तुमको हंसो कि हंसना पड़ेगा तुमको
वगरना अश्कों ने देखो कैसे तुम्हारी सूरत बिगाड़ दी है

राजीव कुमार

जे दिल से निकले ला दिल ले जाला उ मन के भाषा ह भोजपूरी

गीत ग़ज़ल -भोजपुरिया

जे दिल से निकले ला दिल ले जाला उ मन के भाषा ह भोजपूरी
सभे के नियरे   लियाए वाला  मिलन के भाषा  ह भोजपूरी 

इ शब्द नाहीं  सरूर हउवे  इ दिल के दुनिया के नूर हउवे
जे प्रेम में बा  ओ प्रेमियन के  नयन के भाषा ह भोजपूरी

सुनीं जी माई त ठीक बाड़ी मगर बबुनिया बोलाव तीया
विरह सनेशा  लिखे के इहे  सजन के भाषा ह भोजपूरी

जे प्रेम खातिर अकेले वन में धनुष उठा के भटक गइल बा
ओ राम जी के बोलाये वाला हिरन के भाषा ह भोजपूरी

इहे भिखारी   के तान हउवे    इहे हमन   के परान हउवे
इहे ह मीरा   के दर्द ई हे  किसन के भाषा   ह भोजपूरी

कबो ह फगुवा कबो ह चइता कबो ई बिरहा के धुन नियर बा
बदन के भाषा चलन के भाषा भजन के भाषा ह भोजपूरी

जुलम के आगे सवाल बन के लड़ाई ल ड़े के हौसला ह
अजाद होखला के आस के हर किरन के भाषा ह भोजपूरी

ए बाबू कौने  जिला से हउ व  विदेश में जब  इ केहू पूछे
तबे अचानक  से याद आला  वतन के भाषा ह भोजपूरी

जहां नदी के  हर एगो तट पर  निवास करेली छठी माई 
परम्परा के  ओ देश में ही   हमन के भाषा   ह भोजपूरी

राजीव कुमार

नफरत के ए दौर में जे भी गीत प्रेम के गाये ला

भोजपुरी ग़ज़ल 

नफरत  के ए  दौर में जे भी गीत प्रेम के गाये ला
घुप्प अन्हरिया रात में उहे दियरी कहीं जरावे ला

दू प्रेमी के बीच जमाना आग के दरिया हs तs का 
ये दरिया पर लोहा के पुल दिल के प्रेम बनाये ला

खूब जमाना बदलल इहंवा खूब तरक्की भइल पर
जात धरम पर हमन के केहू अभियो खूब लड़ायेला

जेतना बड़का लोग बा ऊ सब गाल बजावे ला खाली
अपने हाथ से आपन रस्ता बस मजदूर बनाये ला

जेकरे बात में दम ना होला बेमतलब के ऊहे लोग 
मंच प चढ़ के इयां उहां के नारा खूब लगाये ला

झूठ में पइसा पावर बा अब हम काहे के बोलीं सांच
अपने हाथ से आपन नटई कहांवा केहू दबाये ला

डिम्पल उनके गाल के ह ऊ भंवर नदी के जे में सब
कवि कागज के नाव में चढ़ के आपन जान बचाये ला

राजीव कुमार

Sunday, December 3, 2023

दिल में जेतना प्रेम रहे अब ओतने बड़ बिमारी बा

भोजपुरी ग़ज़ल 

दिल में जेतना प्रेम रहे अब ओतने बड़ बिमारी बा
जे  के  जान  बनवनी   ऊहे  जान  प  हमरे भारी  बा

उनसे   धोखा  खा  के बुझनी  जे  से  सच्चा प्यार रहे 
जान  बचावे   वाला   मुजरिम,  खूनी   वर्दी  धारी बा

ए दुनिया  में  आज जे  बा सब बनरे से इन्सान बनल
यानी  सबके  नाच-नचावत अभियो  एगो  मदारी  बा

एक  बगइचा  के  ई  दूगो  फूल  ह  हिन्दू मुस्लिम पर 
फूल के  जे  मसलेला   ओकरे  हाथ  में ई फुल्वारी बा

प्रेम  के जड़  जे  काटत बा तू उनके दोस्त बतावे लS
आखिर कब ई बात तू बुझ ब पेड़ के दुश्मन आरी बा

अनपढ़ हो आ पढ़ल-लिखल सब मूरख एक नियर होला
ऊहो  गदहा  गदहे  होला  जेकरा  पीठ   प   धारी बा

शहर  में  तहरे  रुपया  पइसा से धनवान कहाला लोग
लेकिन   हमरे   गांव   में  धन  के  पैमाना  खुद्दारी  बा

नाच  सिनेमा  सांझ  के  देखे  जाईं  त  बाबू  जी  पूछें 
का रे   का ह   अइसे कइसे   कहंवा के   तइयारी  बा

कविता समझ में आये न आये ई सब दिक्कत राउर ह
हमन के सर्विस चौबीस घंटा जनहित में अब जारी बा

राजीव कुमार

आप अपनी खुशी के मारे हैं

ग़ज़ल 

आप अपनी खुशी के मारे हैं
और हम बे खुदी के मारे हैं

ये जो बुझते दिये हैं महफ़िल के
ये सभी  रौशनी के मारे हैं

उनकी आंखों में कुछ तो है जिसकी
हम भी  जादूगरी के मारे हैं

हम हैं दुनिया है और हम जैसे
लोग  यायावरी के मारे हैं

शह्र ए उल्फत में जाने वाले सुन
सब वहां जिंदगी के मारे हैं 

इश्क़ की प्यास मर गयी है या
आप सब तिश्नगी के मारे हैं

दिल की बातों की किसको फुर्सत है
सब के सब नौकरी के मारे हैं 

हमको मरने का डर नहीं हम तो
यार जिन्दादिली के मारे हैं

पहले उल्फत में जीते मरते थे
आज हम शायरी के मारे हैं

राजीव कुमार

मेरी बेटी को अदविका कहना

शब्द श्रद्धांजलि 🙏 इन्दिरा प्रियदर्शिनी गांधी जी 

मेरी बेटी को अदविका कहना 
मुझको लगता है इन्दिरा कहना 

ये मोहब्बत के हक में बोलेगी
ये अजीयत की जड़ को काटेगी
ये तो बेटी किसान की है सो
ये किसानों के हक में लिक्खेगी
अपनी मिट्टी को हौसला कहना 
मुझको लगता है इन्दिरा कहना

हर मसाइल का हल बनेगी ये 
मेरे बाजू का बल बनेगी ये
अपनी मेहनत से अपनी हिम्मत से
अपने भारत का कल बनेगी ये
ऐसी चाहत को इक दुआ कहना 
मुझको लगता है इन्दिरा कहना 

अपने सर को ये जब उठायेगी 
हर मुसीबत पे मुस्कुरायेगी 
मेरा नेहरू सा कद नहीं लेकिन 
मुझको नेहरू यही बनायेगी 
इससे ज्यादा अब और क्या कहना
मुझको लगता है इन्दिरा कहना 

राजीव कुमार

छठ पर्व गीत-भोजपुरी केहू रsहे न अबके दुखी छठी माई सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई

छठ पर्व गीत-भोजपुरी 

केहू रsहे न  अबके दुखी छठी माई 
सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई 

बेटा माई से मीले पहुंच जाये घर
बेटियन के न लागे कहीं कौनो डर
प्रेम सबके हिया में पले रात दिन 
सsभे आगे से आगे बढ़े रात दिन 
प्रेम के दे द अइसन जड़ी छठी माई 
सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई 

कौनो दुलहिन उदासी न पावे कबो 
माई के आंख ना डबबाये कबो 
माथे सेनुर रहे हाथे कंगन सजे 
सबके अरघा में चूड़ी के खनखन रहे
सब सुहागिन के कर द धनी छठी माई 
सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई

गांव महके त चमकत बजरिया मिले
सबके बहंगी में फल मूल ठेकुआ मिले
खेत खलिहान अन धन से भरल रहे
भूखे केहू  ना दुनिया में परल रहे
 पूरा कर द हर एगो कमी छठी माई 
सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई

डूबे सूरज त रंगीन हो इ गगन
साफ धरती रहे साफ रहे पवन 
इहे बा कामना की निरोगी हो तन
अब उम्मीदन से भरल रहे सबके मन
सूर्य डूबी तबे त उगी छठी माई 
सबके दउरा में भर द खुशी छठी माई

राजीव कुमार

हिस्से में मेरे गम की कटौती भी नहीं है

ग़ज़ल

हिस्से में मेरे गम की कटौती भी नहीं है
जीने की मगर मुझको चुनौती भी नहीं है

दिल को हमारे आप न किडनैप कीजीये
इतनी हमारे पास फिरौती भी नहीं है 

इक तरफा महब्बत को निभा पायेंगे कैसे 
गंगा के लिए दिल में कठौती भी नहीं है

उस शख़्स से उल्फत है उसे चाहते हैं पर 
मिल जाय वो हमको ये मनौती भी नहीं है।

जब चाहे कोई खेले कोई तोड़ दे इसको
दिल हुस्न के मालिक की बपौती भी नहीं है

बदमाश है मगरूर है दुश्मन है सकूं का
वो शख्स मगर इतना पनौती भी नहीं है

राजीव कुमार

ठोकर न काम आयी तो कांटे बिछा गये।

ग़ज़ल 

ठोकर न काम आयी तो कांटे बिछा गये।
उनको लगा कि रेस से हमको हटा गये।

रुकने लगे कदम तो उठी दिल से ये सदा 
कुछ दूर की ही बात है मंजिल पे आ गये

कुछ भी न अपने पास था इक जान छोड़कर 
फिर भी हमारे दोस्त हमें आजमा गये

जिनको न थी उम्मीद वो भी जायेंगे कभी
धरती से ऐसे-ऐसे बहुत देवता गये

इस दौर को जब लोग लिखेंगे तो लिखेंगे 
इस दौर में भी लोग थे जो सर कटा गये

जब तक बुलंद हौसला अपना है तब तलक 
क्या लेना क्या कमाया और क्या लुटा गये

अब पूछना ही होगा हमें ख़ुद से ये सवाल
इस अहद में हम लाए गए हैं कि आ गये

इक हम हैं जिसे चाहा उसे पा नहीं सके
इक वो हैं हमें छोड़ के हर चीज़ पा गये

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...