Sunday, April 18, 2021
कोई रदीफ नहीं है न काफिया है भला
Friday, April 16, 2021
हवा की उंगली पकड़ के चलना
Thursday, April 15, 2021
इक नई आस दे इक नई दे सहर
जाने किस शय को पाने के इम्कान में।
Wednesday, April 14, 2021
सता रही है जिन्दगी
गीत
सता रही है जिन्दगी
रूला रही है आशिकी
मेरे लिये जमीन पर
कदम कदम है तिश्नगी
जला रही है धूप भी बदन हमारे ख्वाब का
मिटा के रख न दे कही चमन हमारे ख्वाब का
बहार फूल तितलिया हवा नदि घटा पहाङ
सदाये दे रहा है अब वतन हमारे ख्वाब का
सता रही है जिन्दगी
रूला रही है आशिकी
मेरे लिये जमीन पर
कदम कदम है तिश्नगी
न चैन ना करार है मगर ये प्यार प्यार है
कभी जो खत्म हो ही ना वो दिल मे इन्तजार है
मगर वो दूर हो के भी लगे की आस पास है।
ये मेरे जिद की जीत है या उसके जिद की हार है
सता रही है जिन्दगी
रूला रही है आशिकी
मेरे लिये जमीन पर
कदम कदम है तिश्नगी
बस एक बार देख ले बुला या नाम ले मेरा
कोई तो मेरा साथ दे कोई तो हो मेरा खुदा
बदन की हद को छोङ के हर एक रस्म तोङ के।
कोई तो इस हिसाब से मेरे लिये भी हो बना
सता रही है जिन्दगी
रूला रही है आशिकी
मेरे लिये जमीन पर
कदम कदम है तिश्नगी
राजीव कुमार
Wednesday, April 7, 2021
दिल से निकले तो हर इक बात जबां तक पहुंचे
Tuesday, April 6, 2021
जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें
Sunday, April 4, 2021
माना की गुज़री बात का चर्चा खराब है।
Thursday, April 1, 2021
निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या
निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या
टूटा है ये मकान मगर तुमको इससे क्या
आंखें चुका रहीं हैं गमे हिज्र का हिसाब
हो कर लहू लुहान मगर तुमको इससे क्या
मायूस जब हुआ तो कहा दिल से अक्ल ने
होता है मेरी जान मगर तुमको इससे क्या
आंखो में कितने डूब गये ख्वाब आज तक
फिर भी हूं शादमान मगर तुमको इससे क्या
अपने लिये तो बोलते तो हो चीखते भी हो
हम तो हैं बे-जबान मगर तुमको इससे क्या
दुनियां की दौलतें हों इकट्ठा तुम्हारे घर
चाहे लुटे जहान मगर तुमको इससे क्या
अपनी अना में चूर रहो और यू रहो
गिर जाये आसमान मगर तुमको इससे क्या
हर रोज लड़ के मर रहे हैं अपने देश में
हिन्दू से मुसलमान मगर तुमको इससे क्या
थाली में रोटी दाल हमारी परोस कर
भूखा है वो किसान मगर तुमको इससे क्या
राजीव कुमार
सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।
ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...
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जो है हमारा लेंगे हम, दमन नहीं सहेंगे हम मुकद्दरोँ से रहमतों को,अब नहीं है मांगना, असल हुकूक क्या है अब,वही है हमको जानना/ हमे हुकूक ...
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ग़ज़ल जो भी कमा रहे हो वो ज़र किसके लिये है। जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिये है। ऐसा न हो कि आईने में देख के खुद को हम सोचने लगे ...