Sunday, April 18, 2021

कोई रदीफ नहीं है न काफिया है भला

ग़ज़ल 

कोई रदीफ नहीं  है न काफिया है भला 
हमारी डायरी मे कुछ नहीं  लिखा है भला 

न तो हवा ही सही है न फेफड़ा है भला 
हमारे  वास्ते कुछ भी नहीं बचा है भला

बहुत जियादा नहीं यार सोचना है भला
बुरे तो हम हैं हमारा तो रहनुमा है भला

हम ऐसे  लोग जिये या मरें हमारा क्या 
हमारी  छोड़ो  हमें कौन पूछता है भला

गुरूर आप  का  टूटे न  इस लिये साहब 
हमारी सांस  का  इसबार  टूटना है भला

हर  एक  बात  पे आँसू बहाना ठीक नही
हर एक सानिहा अब कौन झेलता है भला

बचेंगे  लोग  तो  हर  रोज   सर  उठायेंगे 
मेरे हिसाब से इन सब को रौदना है भला

हकीम ए शहर  तो  बीमार है मगर हाकिम?
अब और कुछ नहीं हमारा बोलना है भला

अमीरे शह्र  के  बारे  में  क्या बतायें यहां
न तो निजाम कोई है न औलिया है भला

राजीव कुमार
सानिहा - दुर्घटना 
औलिया - संत

Friday, April 16, 2021

हवा की उंगली पकड़ के चलना

गीत

हवा की उंगली पकड़ के चलना 
तू आसमानो पे जब टहलना 
रे मन के पंछी 
ओ रे परिंदे

धीमे धीमे लहरों सी मन में उठे ख्याल 
सोधो सोधी खुश्बू सी दिल मे उठे उबाल 
जा के मैं चांद सितारों के घर को
तेरी खुश्बू से महका दूं 
रे मन के पंछी 
ओ रे परिंदे

याद वो आये तो ख्वाब सजाऊ 
पास जो आये उसे गलेसे लगाऊ 
साथ चले तो सारी दुनिया में उसको 
हाथ पकङ के घुमाऊं 
रे मन के पंछी 
ओ रे परिंदे

सूबह की सबनम बुलाये आ जा 
गुलों की रंगत बढाने आ जा 
 तू  एक मीठी नदी के जैसे
आ इश्क मुझको पिला जा 
रे मन के पंछी 
ओ रे परिंदे

हवा की उंगली पकड़ के चलना 
तू आसमानो पे जब टहलना 
रे मन के पंछी 
ओ रे परिंदे

राजीव कुमार

Thursday, April 15, 2021

इक नई आस दे इक नई दे सहर


गीत

इक नई आस दे इक नई दे सहर
तू अगर है तो नजरे इनायत तो कर

जिन्दगी दर ब दर देख ले हो गयी
हर खुशी बे असर देख ले हो गयी 
सारे मंजर पे मातम है पसरा हुआ 
दिल की दुनिया मे हर एक रोता हुआ

अब परिन्दों के हक में रहें किस तरह
अब दरख्तों के हक में रहें किस तरह 
चांद तारों की बाते करे किस तरह 
हम नजारों की बाते करे किस तरह

गीली आंखों मे फिर से चमक चाहिये 
अब नही और इनमें नमक चाहिये 
स्याह रातों की वीरानिया खत्म हो
सांस लेने की दुश्वारियां खत्म हो

सबको होठों पे अब कहकसां टांग दे 
सबके चेहरों पे वो वाकया टांग दे 
सुब्ह सबनम की हल्की नमी से सजे
शाम अपनी हर इक रौशनी से सजे

Rajeev kumar 

जाने किस शय को पाने के इम्कान में।

ग़ज़ल

जाने किस शय को पाने के इम्कान में।
हम चले आये हैं शह्र ए वीरान में

वक्त ऐसा भी आयेगा सोचा न था 
लोग खुद रहना चाहेंगे जिंदान में

रोज आंखे दिखाता था सागर सो हम
लौट आये हैं साहिल से तूफान में

जब से देखा है तुमको तुम्हे क्या पता 
सारे गुल हैं परेशां गुलिस्तान में 

उसका जाते हुए चूम लेना मुझे 
फायदा में हूं या के हूं नुकसान में

जिन्दगी की अजीयत से इक पल सूकूं
कैसे पायेंगे हम दौर ए हिज्रान में 
हिज्रान- जुदाई 

अच्छे अच्छे बिखर जाते हैं टूट कर 
हमने देखा है उल्फ़त के दौरान में

प्रेम क्या है समझना है तो देखिये 
या तो मीरा के दिल में या रसखान में

राजीव कुमार

Wednesday, April 14, 2021

सता रही है जिन्दगी

गीत


 सता रही है जिन्दगी

रूला रही है आशिकी

मेरे लिये जमीन पर 

कदम कदम है तिश्नगी


जला रही है धूप भी बदन हमारे ख्वाब का 

मिटा के रख न दे कही चमन हमारे ख्वाब का 

बहार फूल तितलिया हवा नदि घटा पहाङ 

सदाये दे रहा है अब वतन हमारे ख्वाब का


सता रही है जिन्दगी

रूला रही है आशिकी

मेरे लिये जमीन पर 

कदम कदम है तिश्नगी


न चैन ना करार है मगर ये प्यार प्यार है 

कभी जो खत्म हो ही ना वो दिल मे इन्तजार है

मगर वो दूर हो के भी लगे की आस पास है। 

ये मेरे जिद की जीत है या उसके जिद की हार है


सता रही है जिन्दगी

रूला रही है आशिकी

मेरे लिये जमीन पर 

कदम कदम है तिश्नगी


बस एक बार देख ले बुला या नाम ले मेरा 

कोई तो मेरा साथ दे कोई तो हो मेरा खुदा 

बदन की हद को छोङ के हर एक रस्म तोङ के।

कोई तो इस हिसाब से मेरे लिये भी हो बना


सता रही है जिन्दगी

रूला रही है आशिकी

मेरे लिये जमीन पर 

कदम कदम है तिश्नगी


राजीव कुमार

Wednesday, April 7, 2021

दिल से निकले तो हर इक बात जबां तक पहुंचे

ग़ज़ल 

दिल से निकले तो हर इक बात जबां तक पहुंचे
ये महब्बत की सदा कौन-ओ-मकां तक पहुंचे
कौन-ओ-मकां- संसार 

इश्क़ मरता नहीं दुनिया में उन्ही लोगों का 
छोङ के जिस्म जो महबूब की जां तक पहुंचे

तब समझ आया महब्बत के सफर का मतलब 
जब बहारों के हसीं फूल खिजां तक पहुंचे

शह्र दर शह्र भटकते हुए वीरानों में 
हमसे पूछो न कहां पर थे कहां तक पहुंचे

सिर्फ सीने में उतरना ही नहीं है  काफी
तीर वो है जो निगाहों से दिलाँ तक पहुंचे  
दिलाँ - hearts 

मेरी ख्वाहिश है कि आंखों से जो तुम कहती हो
ये भी अंदाज कभी हर्फे बयां तक पहुंचे

मुझसे मिलने के लिये उसका पहुचना मुझ तक
जैसे मुमताज महल शाह-जहां तक पहुंचे

इक इसी आस में ये नज्म ग़ज़ल शेर कहे 
कोई पैगाम तो उस दुश्मने जां तक पहुंचे

राजीव कुमार

Tuesday, April 6, 2021

जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें

ग़ज़ल 

जमीं को चूमता अम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें 
नगर में गांव सा मंजर नहीं मिलेगा तुम्हें

तलाश खुद में तुम्हें करना पड़ेगा उसको 
ख़ुदा वो शय है जो बाहर नहीं मिलेगा तुम्हें

तुम्हारी ज़िद है तो जाओ बस इतना कहना है 
मेरे मिजाज का दिलबर नहीं मिलेगा तुम्हें

कभी मिलो तो बहाने से पूछना वर्ना
किसी हसीन का नम्बर नहीं मिलेगा तुम्हें

ख़्याल दिल में तुम्हारा है ख्व़ाब आंखों  में 
तुम्हारा कोई भी  बेघर नहीं मिलेगा तुम्हें

जो दिल के घाव सीये ग़म भी टांक दे सारे
हमारे जैसा रफूगर नहीं मिलेगा तुम्हें

सफ़र हयात का होता तो है हसीन मगर 
सुकून इस पे घङी भर नहीं मिलेगा तुम्हें

चला गया तो मेरी  जान मेरे आने का 
हो जिसमें दिन वो कैलेंडर नहीं मिलेगा तुम्हें

राजीव कुमार

Sunday, April 4, 2021

माना की गुज़री बात का चर्चा खराब है।

ग़ज़ल 

माना   की  गुज़री  बात का  चर्चा खराब है।
लेकिन अजाब   ज़हन में   रखना खराब है।

गेंहूं   बहुत   बुरा   है     न   गन्ना  खराब है।
फिर  भी   अजीब   है कि ये पेशा खराब है।

दौलत  अना    ईमान  वफा  इश्क़ का नशा।
मत  पूछ इस  जहान में  क्या क्या खराब है।

आखिर मे इश्क़ जीते जी दोनों को खा गया।
क़िस्सा  तो  ये हसीन था  लिक्खा खराब है।

शाइर  फकीर  औलिया  सारे  जहीन  लोग 
उल्फत में हर किसी  का तज्रिबा  खराब है।

आंखों में कुछ नमी भी हो ख्वाबों के साथ साथ
दरया ए चश्म   ठीक    है   सहरा   खराब है

चैनल   हमारे   देश   के   बतला  रहे  हैं कि।
देखो   गधा   तो   ठीक   है  घोड़ा  खराब है।

पैगाम   दे   रहा   है   महब्बत   का अब वही।
सचमुच में जिसका आज-कल माथा खराब है

Rajeev kumar

Thursday, April 1, 2021

निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या

 ग़ज़ल 

निकली है दिल से जान मगर तुमको इससे क्या 
टूटा है  ये  मकान   मगर   तुमको इससे क्या

आंखें  चुका  रहीं  हैं  गमे  हिज्र  का हिसाब 
हो  कर  लहू लुहान  मगर तुमको इससे क्या

मायूस  जब  हुआ तो कहा दिल से अक्ल ने
होता है मेरी  जान  मगर  तुमको इससे क्या 

आंखो में  कितने  डूब गये ख्वाब आज तक 
फिर भी हूं शादमान मगर तुमको इससे क्या

अपने  लिये  तो बोलते तो हो चीखते भी हो 
हम तो हैं बे-जबान मगर तुमको इससे क्या

दुनियां  की  दौलतें  हों   इकट्ठा  तुम्हारे  घर 
चाहे  लुटे  जहान  मगर  तुमको  इससे क्या

अपनी    अना    में   चूर  रहो  और  यू रहो  
गिर जाये आसमान मगर तुमको इससे क्या

हर  रोज  लड़  के  मर रहे  हैं  अपने देश में 
हिन्दू से मुसलमान मगर  तुमको  इससे क्या 

थाली   में   रोटी  दाल   हमारी  परोस  कर 
भूखा है वो किसान मगर तुमको इससे क्या

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...