ग़ज़ल (मैं और मेरी टीशर्ट)
मफलर सफारी सूट पे भारी टीशर्ट है
शर्दी के हर दरख्त पे आरी टीशर्ट है
कांटों से भर गयें हैं जो रस्ते उन्हीं में अब
फूलों की इक हसीन कियारी टीशर्ट है
सय्याद के आगे खड़े हैं अम्न के पंछी
इस बार पंछियों की सवारी टीशर्ट है
जो ढा रहे हैं बेबसों पे जुल्म बारहा
उन ज़ालिमों का अबके शिकारी टीशर्ट है
बैठे हैं जो बिझाये हुए जाल झूठ के
उनके लिये तो जैसे कटारी टीशर्ट है
कहता नहीं है खुद से मगर जान लिजिए
इस बार शर्दियों की सुपारी टीशर्ट है
हर शख्स को गले से लगाते हुए लगे
चाहत की जैसे एक पिटारी टिशर्ट है
बेटी बहन बुजुर्ग मां सबकी निगाह में
कितनी हसीन कितनी पियारी टिशर्ट है
नफरत की मंडियों में महब्बत की इक दुकान
यारों हमारी और तुम्हारी टीशर्ट है
राजीव कुमार
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