Monday, April 11, 2022

महब्बत क्रीमनलाईज कर रहे हैं

 हज़ल हास्य रस 😊😊🙏🙏


महब्बत क्रीमनलाईज कर रहे हैं

डकैती  मोर्डनाईज   कर  रहे  हैं  


था कल तक जुर्म लेकिन आज से हम

कीमशन लीगलाईज  कर  रहे हैं 


बचाने  वाले ही  अब  रेप करना  

मुसलसल नोर्मलाईज कर रहे हैं


खबर के  नाम पर ये न्युज चैनल 

किसी की  एडवटाईज कर रहे हैं


सफाई हाथ की जो कर चुके वो

सभी को  सेनीटाईज  कर रहे हैं।


ये  चंदा    मांगने  वाले अभी भी

हमें  डीमोनीटाईज   कर  रहे  है 


हमारी  ग्रोथ  है  गढ्ढे  में  लेकिन 

हमारे   सेठ  राईज  कर  रहे  हैं 


बस इक खेती किसानी थी हमारी 

उसे भी  प्राइवेटाईज  कर रहे हैं 


मुतास्सिर होके उससे हम भी अपना 

एडेण्डा  फाईनलाईज कर रहे हैं


बदन तो ठीक है पर अक्ल का हम

दिनों दिन हाफ साईज कर रहे है


राजीव कुमार

हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त

 हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त  

अब कहाँ इश्क़ ज़माने में बचा ही है दोस्त।


तेरे बारे में नहीं बोल रहा हूँ फिर भी 

मेरी हालत तेरे ज़ुल्मों की गवाही है दोस्त


कौन से सच की तरफ भाग रहा हूँ मैं भी

मेरे पीछे भी मेरा झूठ पङा ही है दोस्त


बात अच्छी है बुरी है नहीं मालूम मगर 

इश्क़ हर शख़्स को इक बार हुआ ही है दोस्त


इन महब्बत के सताये हुए लोगों के लिये 

दर्द  ये दर्द  नहीं है ये दवा ही है दोस्त


कैसे पायेंगे तरक़्क़ी का वो अमृत हम लोग

दिल में जब जह्र अदावत का भरा ही है दोस्त


बात इतनी है कि ईमान परस्तों के लिये।

आज का दौर भी इक सख़्त सजा ही है दोस्त


जिन्दगी एक सफर है तो मुझे लगता है 

मौत मंजिल नहीं दर अस्ल ये राही है दोस्त


जिसमें मजलूम की आवाज नहीं है शामिल

शेर वो शेर नहीं सिर्फ सियाही  है दोस्त 


राजीव कुमार



हसरत जब रुख्सार से बातें करती है

 ग़ज़ल


हसरत जब रुख्सार से बातें करती है 

बीनाई   दीदार   से   बातें  करती  है


एक यही अंदाज जुदा है बस उसका

रूठ के भी वो प्यार से बातें करती है


दो दिन घर में तन्हा रह कर जान गया

खिङकी  भी  दीवार से बातें करती है 


इश्क़ कहां होता है सच्चा जानते हो?

रूह जहां  किरदार  से बातें करती है


दरिया के तूफान से  वो  क्युं डर  जाये 

जो  कश्ती  मंझधार  से  बातें करती है


जीवन  के  इस  रेस  में हमने देखा है

मौत  सदा  रफ्तार  से  बातें  करती है


राजीव कुमार

खुश्बू का लुत्फ लीजीये मौसम के साथ साथ

खुश्बू का लुत्फ लीजीये मौसम के साथ साथ

गांधी को बात  कीजीये  गौतम के साथ साथ


अपने   हको   हकूक  को  पाना  है तो हूजूर 

आवाज  भी  उठाईये  परचम  के साथ साथ


सारे  गुलाम   बन  गये   इक्का  तो   देखना 

रोयेगा  बादशाह  भी  बेगम  के  साथ साथ


दिलवर की याद आये तो गजलो को गाईये 

जख्मों के नाम लीजीये मरहम के साथ साथ


अब तक की जिन्दगी का यही फलस्फा है के

लूडो का खेल खेलिये कैरम के साथ साथ


असलम के साथ दोस्ती राजीव की ए दोस्त

दिखती है जैसे रौशनी शबनम के साथ साथ


राजीव कुमार

ख्वाबों की डगर गम की दुकां ठीक नहीं है

 ख्वाबों की डगर गम की दुकां ठीक नहीं है 

सब कुछ है बुरा कुछ भी यहां ठीक नहीं है


उल्फत का सफर खत्म हुआ जब से हमारा

तब से ही बदन ठीक है जां ठीक नहीं है


हम ऐसों की खातिर तो जमाने में कहीं  पर

इक दिल ही ठिकाना है मकां ठीक नहीं है


उस शह्र से इस शह्र में हम आ तो गये पर 

वो सब है यहां भी जो वहां ठीक नहीं है


देखो ना उसी शख्स पे दिल अपना फिदा है।

जिस शख़्स की आंखों की जबां ठीक नहीं है


हर दिल में महब्बत की शमा ठीक है लेकिन

सीने में ये नफरत का धुआं ठीक नहीं है


राजीव जी सच बोल रहे हो तो समझ लो 

इस वक्त ये अन्दाज ए बयां ठीक नहीं है


राजीव कुमार

मून के जैसा अपना मन है

 आज विज्ञान दिवस पर बाल कविता 


मून के जैसा अपना मन है

सोर्स मगर लाईट का सन है

सन से आखिर तक है प्लूटो 

अर्थ पे ही लेकिन जीवन है


जीवन का आधार है ओ टू 

सांसों का संसार है ओ टू 

पेङ कटे तो सी ओ टू से 

हो जाता बेकार है ओ टू


बादल जब घनघोर बनेगा 

एच टू ओ हर ओर बनेगा

लेकिन परदूषण बङने से 

एच टू एस ओ फोर बनेगा


धूप सी ओ टू क्लोरोफिल से 

पेङ बनाते खाना दिल से 

फूड चेन में शेर और बकरी 

जुङे हुए  हैं इस साइकिल से


त्रीभुज आयत गोल स्कवायर

ए प्लस बी का होल स्कवायर

इस पृथ्वी की एरीया कितना 

टू पाई आर का बोल स्क्वायर


एक ही फोर्स अटल होता है 

गुरुत्वाकर्षण बल होता है।

पेङ से एप्पल गिरने वाला।

ग्रेवीटी का फल होता है


ज्ञान से ही विज्ञान बना है 

हम सबका सम्मान बना है

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई 

सबसे हिन्दुस्तान बना है


राजीव कुमार

इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

 इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

तुमको बुला रहे हैं ये खिलते हुए बुरांश


इस तौर सुर्ख रू हैं ये जंगल की वादियां ।

जैसे हों इनके बीच में जलते हुए बुरांश।


देना है क्या मिसाल लबो रुख को आपके

बतला रहे हैं आज ये हँसते हुए बुरांश


कंकङ चुभे न आपके पांवों में इस लिये  

शाखों से गिर गये हैं ये बिखरे हुए बुरांश


वादी ए नैनीताल की दिलकश जमीन पर

रक्खे हैं आप के लिये महके हुए बुरांश 


राजीव कुमार

दिल से लिब्रल हैं सख्त हो जायें?

 ग़ज़ल 


दिल से लिब्रल हैं सख्त हो जायें?

क्या करें हम भी भक्त हो जायें?


दिल की दुनिया उजाड़ कर हम भी

बोलो वहसत परस्त हो जायें ?


जैसे   मेरे   हुए   हैं   वैसे  ही 

सबके अरमान ध्वस्त हो जायें।


काम  कोई  नहीं  मगर हमसे 

लोग कहते है व्यस्त हो जायें 


ये जो दुनिया है छोङिये इसकी

आईये खुद में  मस्त हो जायें


इश्क़ वो इश्क़ ही नहीं जब तक 

बहते   आंसू  न   रक्त  हो जायें


जिसने ठुकरा दिया उसी की हम

उम्र  भर  क्युं गिरफ्त हो जायें


जितने आशिक हैं सब बने शाइर 

सारे  पौधे  दरख्त  हो  जायें


राजीव कुमार

उनको भी इस जहान की परवाह नहीं है

 ग़ज़ल 
उनको  भी  इस जहान की परवाह नहीं है 
हमको भी अपनी जान की परवाह नहीं है

नोवेल की हर हसीन कहानी में लिखा था 
आशिक  को  इम्तिहान  की परवाह नहीं है 

वो  भी  मेरे  बगैर   नहीं  जी   सकेगा  पर 
धरती  को  आसमान  की  परवाह  नहीं है

इस  तौर  मुझ को देख के मुह फेरते हैं वो 
जैसे  किसी  की  जान  की परवाह नहीं है

दिल है हसीन शाम है और मयकदा भी है 
शाइर  को  अब मकान की परवाह नहीं है

उनकी नजर को देख के लगता है हमें अब  
तीरों  को  भी  कमान  की परवाह नहीं है

जिनको लहू  से सींचा वही हमसे खफा हैं 
फूलों   को  बागबान  की   परवाह  नही है

जिन  की  जबान  बंद है क्यूँ आप उन्हीं से
कहते   हो   बेजुबान  की  परवाह  नहीं  है

दिल की करे तो आज भी कहता है जमाना
लङकी  को  खानदान  की  परवाह  नहीं है

राजीव कुमार

उनका  सलूक   ऐसा  है  जैसे  कि घरों में 
पैरों   को   पायदान   की  परवाह  नहीं  है

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...