ग़ज़ल
हमें पता है कि दूर हो तुम करीब आओ
हमारी वहसत का हल निकालो हमें बचाओ
हमें पता है कि दूर हो तुम करीब आओ
हमारी वहसत का हल निकालो हमें बचाओ
लिपट के पेङों से ये परिंदे भी कह रहे है।
हमारी दुनिया से हम परिंदों को मत मिटाओ
जमीं पे आकर अगर रहेंगी ये मछलियाँ तो
तुम ही कहोगे कि सागरों से जमीं बचाओ
मै हसते हसते जो रो रहा हूं तो ये भी तय है
मैं रोते रोते भी हस पङूंगा मुझे रुलाओ
वो एक लङकी जो अब नहीं है हमारे खातिर
हम अब भी उसके लिये बचे हैं उसे बताओ
जरूर धरती का आसमां पर है कर्ज कोई
मेरी सुनो तो इसे भी इक दिन जमीं पे लाओ
मै आंसुओं का हिसाब माँगूं तो किससे माँगू
मेरे गुनाहों की पहले कोई सजा सुनाओ
उसी ने मुझको भुला दिया है कि जिससे अक्सर
मैं बोलता था कि सारी दुनिया को भूल जाओ
राजीव कुमार
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