Thursday, March 25, 2021

हमें पता है कि दूर हो तुम करीब आओ

 ग़ज़ल 
हमें पता है कि दूर हो तुम करीब आओ 
हमारी वहसत का हल निकालो हमें बचाओ

लिपट के पेङों से ये परिंदे भी कह रहे है।
हमारी दुनिया से हम परिंदों को मत मिटाओ 

जमीं पे आकर अगर रहेंगी ये मछलियाँ तो 
तुम ही कहोगे कि सागरों से जमीं बचाओ

मै हसते हसते जो रो रहा हूं तो ये भी तय है 
मैं रोते रोते भी हस पङूंगा मुझे रुलाओ

वो एक लङकी जो अब नहीं है हमारे खातिर 
हम अब भी उसके लिये बचे हैं उसे बताओ

जरूर धरती का आसमां पर है कर्ज कोई 
मेरी सुनो तो इसे भी इक दिन जमीं पे लाओ

मै आंसुओं का हिसाब माँगूं तो किससे माँगू 
मेरे गुनाहों की पहले कोई सजा सुनाओ

उसी ने मुझको भुला दिया है कि जिससे अक्सर 
मैं बोलता था कि सारी दुनिया को भूल जाओ
राजीव कुमार

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