ग़ज़ल
इक अरसे से मेरी खुद से जंग अभी तक जारी है।
एक तरफ है बेईमानी एक तरफ खुद्दारी है।
कपड़े फोटो नावेल तोहफे चिट्ठी फूल निशानी याद
जाने कितनी चीजों का घर कमरे की अल्मारी है
मिट्टी का मिट्टी में मिलना ही अंजाम नहीं होता।
सच पूछो तो नये सफर की ये तो बस तैय्यारी है।
वीरानों की भीङ में बैठा एक परींदा है जिसकी।
शोर में इक दुश्वारी है औ चुप्पी में लाचारी है।
जंगल आग तबाही सारे एक जगह ही रहते हैं।
यार महब्बत का किस्सा भी ऐसे ही दो धारी है।
चांद सितारे ख्वाब अंधेरा और ये घर की दीवारें।
इक मुद्दत से गोद में इनके हमने रात गुजारी है।
दोस्त किताबें गजलें दौलत तेरी खातिर हर इक से।
जाने कब-कब बैर हुआ है जाने कब से यारी है।
उसका ही आसान है जीना इस दुनिया में जिसके भी
दिल मे थोङी नादानी है थोङी सी मक्कारी है।
घर से दफ़्तर के रस्ते पर जाते जाते सोचता हूं।
पीछे दुनिया छूट गयी है आगे दुनियादारी है।
आती जाती सांसें मुझसे बोलती रहती हैं अक्सर।
जीवन है इक पेङ तो राजू सांस तुम्हारी आरी है।
राजीव कुमार
No comments:
Post a Comment