ग़ज़ल
मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना
उफनते दर्या को रुक जाओ पार मत करना।
हो जब तलक न मियां ख़ुद की हैसियत तब तक
किसी अमीर हसीना से प्यार मत करना
दवा तो क्या है दुवायें भी कुछ असर न करें
सवार सर पे तुम ऐसा बुखार मत करना
न पा सको जो किसी को तो इश्क़ मे ख़ुद को
कभी सुपुर्द ए रसन और दार मत करना
किसी से मिलना तो कुछ दिन उसे परखना भी।
किसी पे यूं ही कभी एतबार मत करना
जिसे निभाने की उम्मीद ही न हो कोई
किसी से कोई भी ऐसा करार मत करना
ये और बात है जख़्मी हैं पर ए अग्यारो
हमारी मौत का तुम इन्तज़ार मत करना
लङाये हिन्दु मुसलमान को जो पढ़ लिख कर
तुम अपने आप को ऐसा गंवार मत करना
है बेख़बर जो हमारी हर एक मुश्किल से
अब उस निज़ाम पे फिर एतबार मत करना
राजीव कुमार
मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना
उफनते दर्या को रुक जाओ पार मत करना।
हो जब तलक न मियां ख़ुद की हैसियत तब तक
किसी अमीर हसीना से प्यार मत करना
दवा तो क्या है दुवायें भी कुछ असर न करें
सवार सर पे तुम ऐसा बुखार मत करना
न पा सको जो किसी को तो इश्क़ मे ख़ुद को
कभी सुपुर्द ए रसन और दार मत करना
किसी से मिलना तो कुछ दिन उसे परखना भी।
किसी पे यूं ही कभी एतबार मत करना
जिसे निभाने की उम्मीद ही न हो कोई
किसी से कोई भी ऐसा करार मत करना
ये और बात है जख़्मी हैं पर ए अग्यारो
हमारी मौत का तुम इन्तज़ार मत करना
लङाये हिन्दु मुसलमान को जो पढ़ लिख कर
तुम अपने आप को ऐसा गंवार मत करना
है बेख़बर जो हमारी हर एक मुश्किल से
अब उस निज़ाम पे फिर एतबार मत करना
राजीव कुमार