Saturday, November 30, 2019

मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना

ग़ज़ल

मैं कह रहा हूं मेरी मानो यार मत करना
उफनते दर्या को रुक जाओ पार मत करना।

हो जब तलक न मियां ख़ुद की हैसियत तब तक
किसी अमीर हसीना से प्यार मत करना

दवा तो क्या है दुवायें भी कुछ असर न करें
सवार सर पे तुम ऐसा बुखार मत करना

न पा सको जो किसी को तो इश्क़ मे ख़ुद को
कभी सुपुर्द ए रसन और दार मत करना

किसी से मिलना तो कुछ दिन उसे परखना भी।
किसी पे यूं ही कभी एतबार मत करना

जिसे निभाने की उम्मीद ही न हो कोई 
किसी से कोई भी ऐसा करार मत करना

ये और बात है जख़्मी हैं पर ए अग्यारो
हमारी मौत का तुम इन्तज़ार मत करना

लङाये हिन्दु मुसलमान को जो पढ़ लिख कर
तुम अपने आप को ऐसा गंवार मत करना

है बेख़बर जो हमारी हर एक मुश्किल से
अब उस निज़ाम पे फिर एतबार मत करना

राजीव कुमार

Thursday, November 28, 2019

नींद का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं

ग़ज़ल

नींद  का ख़्वाब से इस बार ये सौदा कर लूं
तुमको देखुंगा मगर पहले अंधेरा कर लूं

इस तरह तुझपे मेरी जान मैं कब्ज़ा कर लूं
चाहता हूं तेरे हर ग़म को मैं अपना कर लूं

एक मुद्दत से अधूरा हूं इसी ख़्वाहिश में
तुम जो मिल जाओ तो ख़ुद को भी मैं पूरा कर लूं

अब तेरे शह्र में कोई भी नहीं है तुझ सा।
जिसके ईमान पे मैं यूं ही भरोसा कर लूं।

तू हवाओं की तरफ है तो क्या इस इक डर से।
मैं अंधेरों में चरागों से किनारा कर लूं

उसको अब मेरी ज़रूरत ही नहीं तो मैं भी।
उससे अब ख़त्म महब्बत का ये क़िस्सा कर लूं

हद से गुजरा ये ग़मे हिज़्र तो दिल में आया
हिज्र का लुत्फ़ किसी बार में अब जाकर लूं

राजीव कुमार

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ग़ज़ल

इस तरह इश्क़ सर पे तारी है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी पे भारी है

ज़िन्दगी इक दरख्त है उस पर
वक़्त जैसे कि क़ोई  आरी है

ज़िस्म अपना तो है मगर जां पर
सारी दुनिया की दावेदारी है

झूठ हम बोलते नहीं लेकिन
सच बताने में रिस्क भारी है

हम समझते थे फूल है जिसको
उसकी कांटों से रिश्तेदारी है

हमसे वो ही सवाल करते हैं
जिनकी हम से जवाबदारी है

वो हमारी है जान और वो ही
दुश्मन ए जान भी हमारी है

राजीव कुमार

Monday, November 25, 2019

घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।

ग़ज़ल

घर-बार काम-धाम दोस्त-यार भी नहीं।
यानी कोई हमारा तरफदार भी नहीं।

जो तुम समझ रहे हो वो किरदार भी नहीं।
आसां नहीं हूं और मैं दुश्वार भी नहीं।

इक शख़्स ख़ुद से लड़ते हुए हो गया हलाक।
ये जीत गर नहीं तो कोई हार भी नहीं।

सरकार से सवाल करे ऐसा एक भी।
इस दौर में अब दोस्तों अख़बार भी नहीं।

क्या होगी इससे ज्यादा जहालत की और हद।
लोगों के हक में उनका ही सरदार भी नहीं।

हैरान हूँ मैं उनके इस अंदाज़ से कि वो
लड़ते हैं और हाथ में हथियार भी नहीं।

हर रोज़ मंज़िलें नई पाते हैं किस तरह
इस दर्ज़ा तेज आप की रफ़्तार भी नहीं।

सच बोल कर अकेले भला क्या करूंगा मैं।
सच जानने को अब कोई तैयार भी नहीं।

राजीव कुमार

झूठ या सच लिखे कलम पर है

ग़ज़ल

झूठ या सच लिखे कलम पर है
फिर भी दारोमदार हम पर है

मौत पर अपना बस नहीं है और
ज़िन्दगी जाने किसके दम पर है

बोलो इल्ज़ाम मौत का मेरे
दैर पर है या के हरम पर है

मुझको आज़ाद मुझसे कर देगा
कितनी उम्मीद बे रहम पर है

भूख वहशत लङाई बेकारी।
अब जहालत भी तो चरम पर है

मुल्क़ मज़हब ज़मीन का झगड़ा
सिर्फ़ और सिर्फ़ इक अहम पर है

आप जो चाहते हैं पा जायें
ये भी तो आप के करम पर है

सर्दी ए नैनीताल में यारों ।
इक भरोसा है वो भी रम पर है।

राजीव कुमार

दिल से निकले हुए लफ़्ज़ों को दुआ कहते हैं

*ग़ज़ल*

दिल  से निकले हुए लफ़्ज़ों को दुआ कहते हैं
लब पे आ जाये तो उस शय को सदा कहते हैं

इश्क़  वालों  का अलग  अपना ज़हां है इसमें।
दर्द   को   दर्द   नहीं   कहते   दवा   कहते  हैं।

आपको   देखना   फिर   देखते   रहना  यूं ही।
हम  इसे  इश्क  मगर   लोग  नशा  कहते  हैं।

फूल कहते  हैं  कभी  ख्वाब कभी अपनी जां।
आप  मत पूछिये  हम आप को क्या कहते हैं।

क्या  पता  आपने   कैसा  किया जादू की हम 
आप  को  देख   के  हर   शेर  नया  कहते हैं।

उम्र भर चाहना  उसको जो नहीं मिल सकता।
इस रवायत  को ही  उल्फ़त में सज़ा कहते हैं।

आप  का  हुस्न  है या वादिये कश्मीर की अब।
आप  को  लोग  भी  जन्नत  का ख़ुदा कहते है।

वो जो दुनिया के लिये कुछ भी नहीं कर पाये।
वो  ही हर  बात पे  दुनिया  को बुरा  कहते हैं।

हम  भी हैरान  हैं इस  बात  से हम  जाने  क्युं।
जिसको  देखा  ही  नहीं  उसको ख़ुदा कहते हैं।

राजीव कुमार

प्यार का परचम जबसे हमने थाम लिया

ग़ज़ल-

प्यार का परचम जबसे हमने थाम लिया
दुनिया भर का अपने सर इल्ज़ाम लिया

चोर-सिपाही,   गिल्ली-डण्डा,   पोशम्पा
बचपन में   यारों  से  कितना काम लिया

काटने  आया  था  जो  पेड़ों  को  उसने
छाँव में पहले बैठ के कुछ आराम लिया

बाँट के ऊपर   वाले  को इस  दुनिया ने
सिक्ख, ईसाई, हिन्दू और इस्लाम लिया

त्याग, तपस्या, प्यार, वफा, किरदार नहीं
राम से  हमने केवल  जय श्रीराम  लिया

दर्द,  मुसीबत,  दुश्वारी  सब  भूल  गये
बिटिया ने जब पापा कह के नाम लिया

- राजीव कुमार

आप जैसे ज़हीन से पहले

ग़ज़ल

आप   जैसे  ज़हीन  से  पहले
आदमी  था  मशीन   से पहले

हमको लङना है तीन से पहले
ज़ात मज़हब से दीन से पहले

आप  के  फ़ैसलों   ने  तोङे  है
दिल  हमारे  यक़ीन  से  पहले

सब क़बीले ख़ुशी से रहते थे
आपसे हमसे  दीन  से  पहले

हमको  दो  गज  ज़मीन देनी थी
पांच  एकड़  ज़मीन  से  पहले

कितना वीरान था हमारा दिल
आप जैसे   मकीन   से  पहले

कितने आये चले गये कितने
तेरे जैसे हसीन से पहले

राजीव कुमार

फोटो - भवाली में बाब नीम करौरी
का कैची धाम जिनके भक्त एप्पल कम्पनी
के स्टीव जोबस थे और फेसबुक के
मार्कजुकरबर्ग भी हैं।

ग़ज़ल प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की

ग़ज़ल

प्यार में जिससे धोखा खाया उससे ही फिर यारी की
तब जा कर ही समझ में आयीं बातें दुनियादारी की

दफ़्तर ओहदा फ़ाईल पब्लिक दोस्त पङोसी अपना घर
क्या बतलाऊं इस जीवन से कितनी मारा मारी की

उसे भूलाने की कोशिश में ख़ुद को ऐसे भूले हम
शब में दिन का बोझ उठाया दिन में शब-बेदारी की

जंगल फूल परिंदे पर्वत झील नदि आकाश हवा।
हमको ज़िन्दा रखने वालों से हमने गद्दारी की

शाम को तन्हा सिग्रेट पीते देख के मुझको कमरे में
खिड़की बिस्तर दरवाजों ने मुझसे बात तुम्हारी की।

बाबू सोना बेबी कह कर दिन भर पीछे घूमते हो
प्यार महब्बत ठीक है लेकिन लाज रखो खुद्दारी की

फोन उठाऊँ काल लगाऊं फिर सोचा कल देखेंगे।
बिछङ के उसकी याद आई तब हमने ये हुश्यारी की

सीख बुजुर्गों की ये अक़्सर काम हमारे आयी है
पहले अपना होश संभाला जंग की फिर तैय्यारी की

सच बोलो ये दौर तरक्की का है तो फिर इसमें क्युं
चीख रहे हैं पेड़ बेचारे सुनवाई है आरी की।

मंदिर मस्जिद के ये झगड़े खत्म नहीं होंगे तब तक
जब तक बस्ती वालों में है दहशत इक चिंगारी की।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...