Wednesday, October 31, 2018

हसी लबों को निगाहों को आब दे जाओ

ग़ज़ल फिलबदीह

हंसी लबों पे निगाहों में ताब दे जाओ
हमारे चेहरे को अपना नक़ाब दे जाओ

हों जिसमें दर्ज ज़माने के रंजोग़म सारे
कोई मुझे भी इक ऐसी क़िताब दे जाओ

कहाँ  चले हो सवालों के साथ तुम अपने
मेरा सवाल का पहले जवाब दे जाओ

ख़ुशी मलाल मलामत घुटन परेशानी
जो आप चाहो वो हमको जनाब दे जाओ

तुम्हारे ख़्वाब ही माँगे थे अपनी आँखों में
ये कब कहा था कि झेलम चिनाब दे जाओ

अँधेरा दिल से मिटाने को ए मिरे मालिक।
हर एक दिल को  नया आफ़ताब दे जाओ

मैं चाहता हूं ख़्यालों में आज आ कर तुम।
गजल को अपने लबों का  गुलाब दे जाओ।

राजीव कुमार

Sunday, October 28, 2018

कुछ ऐसा उससे बंधन हो गया है

फिलबदीह ग़ज़ल

कुछ ऐसा उससे बंधन हो गया है
वो मेरे दिल की धड़कन हो गया है

तसव्वुर उसका इक मुस्कान बन के
 मेरे चेहरे का चंदन हो गया है

जो मेरी माँ की हाथों में कभी था
वही अब उसका कंगन हो गया है

बिछड़ के मुझसे अब मेरे लिये वो
मेरी आँखों का सावन हो गया है

चमन एहसास का बन कर के वो ही
मेरे ख़्वाहिश का उपवन हो गया है

नज़र जब से मिलीं हैं उससे तब से
मेरी ख़ातिर वो उलझन हो गया है

राजीव कुमार 😊😊😊

Tuesday, October 23, 2018

ये जो हर रोज़ पल पल देखते हो

हज़ल

ये जो हर रोज़ पल पल देखते हो
बताओ क्यूँ मुसलसल देखते हो।🤔

मैं हर दिन प्राईम टाईम देखता हूँ।
मगर तुम लोग दंगल देखते हो 🤔

फ़क़त हिन्दू मुसलमां ही करोगे।
अगर तुम न्यूज़ चैनल देखते हो 🤔

मियां जम्हूरियत के नाम पर तुम
अबे क्यूँ रोज दलदल देखते हो ।😂

तुम्हे चेहरे की रंगत चाहिये थी
सो तुम चेहरा ही केवल देखते हो।😐

वही क्या अब भी भाषण दे रहा है।
जिसे तुम होके पागल देखते हो।😎

राजीव कुमार

पुर कैफ़ दिल-फ़रोश सा मौसम जरूर है

ग़ज़ल

पुर कैफ़ दिल-फ़रोश सा मौसम जरूर है
ऐसे में तू नहीं है तेरा  ग़म ज़रूर है

महरूम दौलतों से भी हो कर है ये ख़ुशी
माँगा था जैसा वैसा ही हमदम ज़रूर है

शब और सहर जुदा तो हैं इक दूसरे से ,पर
दोनो के लब पे देखिये शबनम ज़रूर है

दामन पे जिनके दाग़ लहू के हैं उनके ही
हाथों में अम्नोचैन का परचम ज़रूर है।

भीतर भटक रही हैं जो वीरानियाँ मेरे।
शह्र ए ख़ुलूस में कहीं मातम ज़रूर है।

जिस तरह ज़िन्दगी के लिये मौत है इलाज
वैसे हर एक दर्द का मरहम ज़रूर है

कोई भी ख़ुश नहीं  है ज़माने में दोस्तों 
हर एक को कोई न कोई ग़म ज़रूर है

राजीव कुमार

Sunday, October 21, 2018

दिल की गहराइयों में जाना है।

फ़िलबदीह  ग़ज़ल

दिल की गहराइयों में जाना है।
फ़िक्र  का दायरा बड़ाना है।

धूप झुलसायेगी बदन लेकिन।
ओस को धूप में नहाना है

साँस दर साँस है कहानी जो।
मौत के बाद वो फ़साना है

दिल के दरिया के इक तलातुम में।
प्यार को डूब कर ही पाना है

आपको अक़्ल क्यूँ नहीं आती
आप से तंग ये ज़माना है।

जिनकी बीनाई छीन ली उनको
रोज इक ख़्वाब भी दिखाना है

एक ही शर्त है मुहब्बत की।
चोट खा कर भी मुस्कुराना है।

ज़िन्दगी क्या है कुछ नहीं भाई
जिस्म को आग में जलाना है

आप जैसा महल नहीं लेकिन
इक मेरा भी ग़रीबख़ाना है

बज़्म-ए-चाहत का आसमां देखो
चाँद-तारों का शामियाना है ।

चाँद को देख कर समझ आया
आसमां पर तेरा ठिकाना है

मेरे आँगन में पेड़ बरगद का
कितनी चिड़ियों का आशियाना है

मेरे क़िस्से में तेरे क़िस्से सा
इक दिवानी है इक दिवाना है

शाइरी और कुछ नहीं यारों
ये हकीकत है या फ़साना है

राजीव कुमार

Saturday, October 20, 2018

क्या बतायें कि क्या नहीं करते।

ग़ज़ल

क्या बतायें कि क्या नहीं करते।
आप से बस गिला नहीं करते।

रूठना मानना दगा करना
इश्क में लोग क्या नहीं करते ।

हां महब्बत के मसअले में तो।
हम किसी का कहा नहीं करते

वो भी हमसे वफा नहीं करती
हम भी उससे वफा नहीं करते

ऐसी दुनिया का क्या करूं जिसमें
लोग मर कर जिया नहीं करते

इश्क में सोचते नहीं 'राजू'
इश्क करते हैं या नहीं करते

Rajeev Kumar

दिल में जो है वो मिटेगा तो मिटेगा रावण।

ग़ज़ल
दिल में जो  है वो मिटेगा तो  मिटेगा रावण।
कब तलक सिर्फ यूं पुतलों में जलेगा रावण।

राम आयेगे   न   आयेगी   हकूमत  उनकी।
कौन  कहता  है कि इक  रोज मरेगा रावण।

आग  दुनिया को  लगाते हैं  वही आज होंगे।
उनके   हाथों  से  जलेगा तो  हसेगा  रावण।

रंज है जुल्म है लालच है दिलों  में जब तक
किसको लगता है कि लंका में रहेगा रावण।

जिसको  मरना  ही  नहीं है  वो  मरेगा कैसे।
आज इस बात को हम सबसे कहेगा रावण।
                              राजीव कुमार

Saturday, October 13, 2018

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था

ग़ज़ल

लगता था अज़नबी सा मगर अज़नबी न था
दुनिया मिरे लिये थी मगर इक वही न था।

हैरत मुझे भी आज कल इस बात का है की
दिल उससे ही लगाया जो दिल से सही न था

मुश्किल भरे सफर में हमेशा हमारे साथ
देखा जो मुड़ के दोस्तों पीछे कोई न था

उसकी हर एक दीद से होता था ख़ुश मगर।
वो एक शक्स ही मेरी ख़ातिर ख़ुशी न था

ठुकरा रहा हूं देखिये हर इक सवाल को
इतना ज़हीन आज से पहले कभी न था

पीने लगा है आदमी का आदमी लहू
ऐसा तो यार आदमी पहले कभी न था

राजीव कुमार

Friday, October 12, 2018

गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा

 ग़ज़ल

गांव से आकर शहर में ये मुझे अक्सर लगा
सच कहूं तो बोलती लाशों से मुझको डर लगा ।

हो कोई ऐसा भी पहलू जिन्दगी का इस तरह ।
हम जिसे जी कर कहें कि आज कुछ बेहतर लगा

हू ब हू मुझसा था लेकिन था जरा मुझसे अलग।
आईने में अक्स मेरा ही मुझे पत्थर लगा

हो मुखालिफ आजकल क्युं दोस्ती के दोस्तों।
पीठ पर क्या आप के भी है कोई खंजर लगा ।

ये हुआ हासिल वफा की राह पर चल कर हमें ।
हर किसी के हाथ का पत्थर हमारे सर लगा ।

लूट लेता है वही इस मुल्क को बतलाओ क्युं।
जो हमे और आप को इस मुल्क का रहबर लगा।

राजीव कुमार

Tuesday, October 9, 2018

जबसे दिल में उतर गयी गंगा

ग़ज़ल

जबसे दिल में उतर गयी गंगा
मैल सब मन के हर गयी गंगा

घर से निकला तो मां की आंखों में
मैने देखा बिखर गयी गंगा।

सिर्फ पानी नहीं ये बोतल में।
बनके तहजीब घर गयी गंगा ।

उसकी दुनिया बदल गयी देखो
जिस जमीं जिस नगर गयी गंगा

अपने बेटों के खेत में जा कर
 पेट दुनिया का भर गयी गंगा

कूङे कचरे से और सीवर से
ऐसा लगता है मर गयी गंगा

हम न संम्भले तो अपनी नस्लों से
क्या कहेंगे किधर गयी गंगा।

राजीव कुमार

ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है

ग़ज़ल

ये उसका फन है कि सच्चाई छीन लेता है
वो ख़्वाब देता है बीनाई छीन लेता है

ये सोच कर ही उसे याद मैं नहीं करता।
वो याद आते ही तन्हाई छीन लेता है

न बद गुमान हो सूरज की दोस्ती पर तू।
ये शाम होते ही परछाई छीन लेता है

जो अपनी जात से बाहर निकल नहीं पाता
वो अपने आप की ऊँचाई छीन लेता है

हमेशा देखा है हद से जियाद: पैसा भी।
कमाने वाले की दानाई छीन लेता है।

इसी लिये तो किनारा किया ज़माने से ।
बुराई दे के ये अच्छाई छीन लेता है।

राजीव कुमार

बीनाई - आंख की रौशनी
दानाई - बुद्धीमानी

Tuesday, October 2, 2018

सबकी हंसी ख़ुशी की दुवा करते रहेंगे।

ग़ज़ल

सबकी हंसी ख़ुशी की दुवा करते रहेंगे।
हम फ़र्ज दोस्ती का अदा करते रहेंगे।

जिस तरह वफ़ा तुमने निभाई है जाने जा
थोङा बहुत तो हम भी दगा करते रहेंगे।

मरने के बाद कौन सुनेगा मलामतें।
हम भी कोई न कोई खता करते रहेंगे।

चाहत वफायें दीन धरम और आशिकी।
हर इक ज़ह्र का हम भी नशा करते रहेंगे।

जिद्दी था बहुत मानता नहीं था मर गया।
कहता था महब्बत तो चचा करते रहेंगे।

घर बार काम धाम दोस्त और शाइरी
सब रोल ज़िन्दगी में अदा करते रहेंगे।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...