ग़ज़ल फिलबदीह
हंसी लबों पे निगाहों में ताब दे जाओ
हमारे चेहरे को अपना नक़ाब दे जाओ
हों जिसमें दर्ज ज़माने के रंजोग़म सारे
कोई मुझे भी इक ऐसी क़िताब दे जाओ
कहाँ चले हो सवालों के साथ तुम अपने
मेरा सवाल का पहले जवाब दे जाओ
ख़ुशी मलाल मलामत घुटन परेशानी
जो आप चाहो वो हमको जनाब दे जाओ
तुम्हारे ख़्वाब ही माँगे थे अपनी आँखों में
ये कब कहा था कि झेलम चिनाब दे जाओ
अँधेरा दिल से मिटाने को ए मिरे मालिक।
हर एक दिल को नया आफ़ताब दे जाओ
मैं चाहता हूं ख़्यालों में आज आ कर तुम।
गजल को अपने लबों का गुलाब दे जाओ।
राजीव कुमार
हंसी लबों पे निगाहों में ताब दे जाओ
हमारे चेहरे को अपना नक़ाब दे जाओ
हों जिसमें दर्ज ज़माने के रंजोग़म सारे
कोई मुझे भी इक ऐसी क़िताब दे जाओ
कहाँ चले हो सवालों के साथ तुम अपने
मेरा सवाल का पहले जवाब दे जाओ
ख़ुशी मलाल मलामत घुटन परेशानी
जो आप चाहो वो हमको जनाब दे जाओ
तुम्हारे ख़्वाब ही माँगे थे अपनी आँखों में
ये कब कहा था कि झेलम चिनाब दे जाओ
अँधेरा दिल से मिटाने को ए मिरे मालिक।
हर एक दिल को नया आफ़ताब दे जाओ
मैं चाहता हूं ख़्यालों में आज आ कर तुम।
गजल को अपने लबों का गुलाब दे जाओ।
राजीव कुमार
