यूं टूट कर न चाह कि दिलवर नहीं हुं मै।
मिट्टी हुं तेरे ख्वाब का अम्बर नहीं हुं मै।
ऐसा भी नहीं हर दफा बस टूटना ही है।
शीशा नहीं हे दिल मेरा पत्थर नहीं हुं मैं ।
नाकामीयों ने मुझको गिराया बहुत मगर।
मायूसियों के आज भी अंदर नहीं हुं मैं।
है जिनको यकीं उनके साथ साथ है खुदा
सफर ए हयात में तेरा रहबर नहीं हुं मैं।
उल्फत भी शायरी भी वफा भी मै ही करुं।
किरदार तू समझ मेरा जोकर नहीं हुं मैं ।
कब तक नचायेगी मुझे डमरू की ताल पर।
ए जिन्दगी इन्सान हुं बंदर नहीं हुं मैं।
राजीव कुमार