Sunday, September 14, 2014

यूं टूट कर न चाह कि दिलवर नहीं हुं मै।


यूं टूट कर न चाह कि दिलवर नहीं हुं मै।
मिट्टी हुं तेरे ख्वाब का अम्बर नहीं हुं मै।

ऐसा भी नहीं हर दफा बस टूटना ही है।
शीशा नहीं हे दिल मेरा पत्थर नहीं हुं मैं ।

नाकामीयों ने मुझको गिराया बहुत मगर।
मायूसियों के आज भी अंदर नहीं हुं मैं।

है जिनको यकीं उनके साथ साथ है खुदा
सफर ए हयात में तेरा रहबर नहीं हुं मैं।

उल्फत भी शायरी भी वफा भी मै ही करुं।
किरदार तू समझ मेरा जोकर नहीं हुं मैं ।


कब तक नचायेगी मुझे डमरू की ताल पर।
ए जिन्दगी इन्सान हुं बंदर नहीं हुं मैं।

राजीव कुमार

एक।कता


एक।कता

कुछ भरोसा हमको भी जीने की खातिर दीजिये।
ऐसे ही जीना हे तो हमको भी खंजर दीजिये।

मांग कर खाने की तो फितरत हमारी थी मगर।
मार कर खाने की खातिर एक पत्थर दीजीये

राजीव कुमार

कीजिये इनपर भरोसा सिर्फ इज्जत के सिवा।

कीजिये इनपर भरोसा सिर्फ इज्जत के सिवा।
बेटीयां कुछ और भी है घर की जीनत के सिवा।

इन अंधेरों में शहर की असलीयत मै क्या कहूँ
जालसाजी लूट धोखा सब है मेहनत के सिवा।

अच्छे दिन ले आने वाले कैसे दिन ले आये है।
कत्ल साजिश खून दंगा क्याहै दहसत के सिवा।

भूख के लगने का रिस्ता जुर्म के होने से है।
जानते है सब यहां पर इक अदालत के सिवा।

कौन मुजरिम है किसे इन्साफ मिलना चाहिये।
फैसला कोई नहीं करता है दौलत के सिवा।

हर सितम सहने का अपना ही मजा है दोस्तों।
जिन्दगी कुछ भी नहीं है अपनी हिम्मत के सिवा।

राजीव कुमार

है मुझे तेरी जरूरत तेरी हसरत के सिवा।

है मुझे तेरी जरूरत तेरी हसरत के सिवा।
कुछ नहीं है मेरे अन्दर तेरी चाहत के सिवा।

मैं बदल भी जाउं तो ये दिल बदलता ही नहीं।
ये बेचारा कुछ नहीं है तेरी सूरत के सिवा।

तेरी नजरो का ये उठना उठ के गिर जाना यूंही।
कुछ नहीं ये और करते है सियासत के सिवा।

ये लबों रुखसार ये तेरी अदाये क्या कहूँ।
मै करुं तो क्या करुं इनसे मोहब्बत के सिवा।

है बङी दुश्वारीयां इस इश्क के अहसास में।
हर सुखन होता है इसमें एक फुर्सत के सिवा।

अब लतीफों की जुबां में आशिकी मजनू की है
सोचता हूँ ये मुहब्बत क्या है जिल्लत के सिवा।

मौत को आना है वो आये भला मै क्यूं डरुं।
यू जूदा होंगे नहीं हम भी कयामत के सिवा।

राजीव कुमार

होश रखना है तो,


नज्म

होश रखना है तो,
ए मेरे हमनशी,
बेखुदि अपने दिल में ही रक्खा करो।
थोङा बहके रहो,
थोङा सुलझे रहो,
मयकशी अपने दिल में ही रक्खा करो।

बज्म ए उल्फत
को रौशन बनाउंगा मै।
सोचता था कि दिल को जलाउंगा मै।
फिर चिरागों ने मुझसे ,
लिपट के कहा।
आशिकी अपने दिल में ही रक्खा करो।

ये वही मोङ है,
ये वही है डगर,
इस डगर से जरा तू सम्भल के गुजर।
इक मुसाफिर को
रस्ते बताते रहे।
रहबरी अपने दिल में ही रक्खा करो।

राजीव कुमार

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।

नयी गजल

मुसीबत गुर्बतों की, वो काली रात बदले।
फकत नारों की झूठी,सियासी बात बदले।

सिकायत इस व्यवस्था, से मेरी यूं नहीं है।
मै ऐसा सोचता हुं, कि ये हालात बदले ।

तरक्की चाहिये तो, तरक्की किजिये न।
गरीबी न भी बदले, तो इसकी जात बदले।

अगर ये हो सका तो, बदलना है इसे भी।
मै हिन्दू तू मुसलमां, ये ही जज्बात बदले।

मेरी जिन्दादिली ने, कहा इक दिन तङप के।
कयामत तू नहीं तो, तेरी औकात बदले।

मुझे मालूम है ये, तू सुनता है सभी की।
खुदाया और नहीं कुछ, तो ये हयात बदले।

राजीव कुमार

रोज हमें अखबार दिखाते खून सने किरदार नये।


रोज हमें अखबार दिखाते खून सने किरदार नये।
वही पुरानी तस्वीरों में दिखते अत्याचार नये।

मांग रहे हैं चाय बेचते भीख मांगते ये बच्चे।
हमें चाहिये हमें दिजीये, शिक्षा के औजार नये।

लाल बत्तियों की ललकारें लोकतंत्र की हाहाकारें।
संविधान कुछ इसी तरह से करता है चित्कार नये।

पेङो पर लटकी, कुछ मानवता की लाशे कहती है।
व्यर्थ ढूंढना है ऐसे में जीवन के आधार नये।

नहीं सुरक्षित सङक, बच्चियां कोख में सहमी सहमी हैं
आने वाली नयी त्रासदी के हैं ये आसार नये।

इस समाज को जात पात की टुटी किश्ती ढोती है।
और गरीबी को वादों के मिलते है बस यार नये।

सत्य अहिंसा के रखवालों की रखवाली ऐसी है।
सिर्फ सिंहांसन के खातिर ही जलते हैं घरबार नये।

गूंगी जनता बहरा राजा और चुनाव का बाजा है।
भ्रष्ट व्यवस्था को ऐसे ही मिलते है सरदार नये।

राजीव कुमार

इश्क बेचैन ख्यालों के सिवा कुछ भी नहीं


पूरी गजल

इश्क बेचैन ख्यालों के सिवा कुछ भी नहीं
ये खुशी उलझे सवालों के सिवा कुछ भी नहीं।

जिसको नादान मोहब्बत का सफर कहते हैं।
वो सफर पांव के छालों के सिवा कुछ भी नहीं।

मयकशी में तो पल दो पल खुशी है लेकिन।
जिस्त सूखे हुए प्यालों के सिवा कुछ भी नहीं।

जिस लिये जिस्म भी बिकता है जुर्म होता है।
वो महज चंद निवालों के सिवा कुछ भी नहीं ।

कैसे जाउं मैं बुङापे में मिलने बच्चों से।
घर में लटके हुए तालों के सिवा कुछ भी नहीं।

तुझमें गम के हैं अंधेरे तो आ रौशन मैं करूं।
मेरे दिल में तो उजालों के सिवा कुछ भी नहीं।

राजीव कुमार

कौन दुनिया में भला किसका खुदा हो जायेगा।


गजल --- 1

कौन दुनिया में भला किसका खुदा हो जायेगा।
सच कहुं तो एक दिन ये फैसला हो जायेगा।

जानिबे मंजिल अकेले भी अगर चलता रहा।
देखना तू ही किसी दिन काफिला हो जायेगा।

गम है क्या जो पुरखतर है जिन्दगी का रास्ता।
है जवां गर हौसला तो रास्ता हो जायेगा।

गर सियासत मुफलिसों की रोटीयों पर युं हुई।
जुर्म करने का यहां पर कायदा हो जायेगा ।

जिस तरह से मजहबी ये आधियां है चल रही।
दोस्तों इक दिन भयानक जलजला हो जायेगा।

राजीव कुमार

दर्द सीने का तेरा खुद ही दवा हो जायेगा।

गजल -2

दर्द सीने का तेरा खुद ही दवा हो जायेगा।
तू भी इक दिन चाहतों का देवता हो जायेगा।

यूं नकाब उल्टे किये न शहर में निकला करो।
फिर शरीफों के शहर में हादसा हों जायेगा।

बस मुहब्बत की नजर से इक नजर तो देख लो।
मेरी उल्फत का मुक्कमल फैसला हो जायेगा।

इक सदा हर रोज सोने ही नहीं देती मुझे।
दर्मयां दोनो के सुबहा फांसला हो जायेगा ।

गर ख्यालों में ख्याल ए यार युं आता रहा ।
आशिकी का भी गजल में सिलसिला हो जायेगा ।

हद से ज्यादा इश्क भी अच्छा नहीं है दोस्तों।
ये किसी की खुदखुशी का फलसफा हो जायेगा।

राजीव कुमार

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।

मंजर-ए-आम के हल्के कलाम कहता हुं।
मैं इन अश्कों को निगाहों के जाम कहता हुं।

ये महज लफ्जों में उलझे हुए अशआर नहीं।
मैं फसानों की हकीकत तमाम कहता हुं।

कुछ ख्यालों से तो जज्बात छलकते हैं मगर
कुछ ख्यालों को मैं तेरा ईनाम कहता हुं।

ये अकीदत है इबादत है या कुछ और बता
मैं हुं नादान, तू ही है ईमाम कहता हुं।

कल तलक आफताब तुझसे रश्क करता था।
आज महताब है तेरा गुलाम कहता हुं।

मुझको मजबूर न कर सच बयान करने को।
तू ही खुद सोच मै क्या क्या हराम कहता हुं।

सब सुखनवर हैं यहां मेरे मै सभी का हुं ।
महफिले शायरी तुझको सलाम कहता हुं।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...