Wednesday, April 17, 2019

हर कदम सिर्फ इम्तिहान है क्या

ग़ज़ल

हर कदम सिर्फ इम्तिहान है क्या
मौला तेरा ही ये ज़हान है क्या

यार मुश्किल में तेरी जान है क्या
दौरे हाज़िर का तू किसान है क्या

आप भी हक़ बयान करते हैं
आपके मुँह में भी ज़बान है क्या

वो जो खाते है भूख पानी से।
उनके जीवन में इत्मीनान है क्या।

जितना चाहो ज़हर उगल आओ।
ये इलेक्शन भी पीकदान है क्या।

तुमने पिछली दफ़ा किया था जो।
कोई वादा तुम्हे भी ध्यान है क्या।

तेरी तकरीर में कहीं पर भी।
रोजी रोटी है और मकान है क्या।

राजीव कुमार

हो कर के बे ख़्याल अभी सो रहे हैं सब।

ग़ज़ल

हो कर के बे ख़्याल अभी सो रहे हैं सब।
किससे करें सवाल अभी सो रहे हैं सब।

मुश्किल में अब न डाल अभी सो रहे हैं सब
मत बोलियो रफाल अभी सो रहे हैं सब

इस दौर में किसान की है ये ही मुसीबत।
किसको सुनाये हाल अभी सो रहे हैं सब

गल भी गयी अगर तो इसे कौन खायेगा
चूल्हे पे रख के दाल अभी सो रहे हैं सब

कोई नहीं है साथ तेरे इन्क़लाब के
मत कर कोई बबाल अभी सो रहें हैं सब

इस बार के चुनाव में हो काम की बातें।
कैसे हो ये कमाल अभी सो रहें हैं सब

बिजली सड़क मकान दवा और नौकरी ।
मौला तु ही सम्भाल अभी सो रहे हैं सब

राजीव कुमार

फेर लेते हैं जो मुँह आप ये बोसा लेकर ।

ग़ज़ल

फेर  लेते  हैं  जो  मुँह  आप  ये  बोसा  लेकर ।
चैन   आयेगा   मुझे   आपसे    बदला   लेकर।

कौन  कहता  है  यहाँ  अपना  अक़ीदा लेकर।
लोग  कहते  हैं ग़ज़ल  आप  से मिसरा लेकर।

चाँद   आया  है   इधर  आप  सा  चेहरा लेकर।
अब  इधर   रात   न   आयेगी  अंधेरा   लेकर।

तुमको  देखा  तो मेरी  जान  ये  मालूम  हुआ।
फूल खिलते हैं  सुब्ह  हुस्न ये किसका लेकर।

एक  ही दर्द  है  हर  एक का  इक है  क़िस्सा।
शह्र-ए-उल्फ़त से वो जो आया है धोखा लेकर।

लोग   ईमान    लिये   हाथ   में   बैठे    देखे ।
जब कभी  हम भी  गये जेब  में पैसा  लेकर।

राजीव कुमार

आईने के सामने जब आईना रक्खा गया।

ग़ज़ल

आईने  के  सामने  जब   आईना  रक्खा  गया।
तब किसी का नाम शायद  बेवफ़ा रक्खा गया।

इम्तिहां  हर  सिम्त  मेरा  हमनवा रक्खा गया।
और   मुझसे   दूर  मेरा   रहनुमा  रक्खा  गया।

जब  जरूरत  ज़िन्दगी  की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।

इक  परिंदा  पूछ  बैठा  क्या हुई  मुझसे खता।
क़ैद में  मुझको ख़ुदाया क्यूं  भला रक्खा गया।

क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के  लिये मैं गमज़दा  रक्खा गया।

इस  समंदर  की हकीकत  साहिलों से  पूछिये।
जिनके  हिस्से तिश्नगी  का फैसला  क्खा गया।

रात   भर  तन्हाईयों में  मैं ग़ज़ल  कहने  लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।

राजीव कुमार

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।

*ग़ज़ल*

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।
कहो किस डर से तुम भी हर घड़ी रंजूर रहते हो।

वो जो अख़बार में है  गर उसे तुम मानते हो सच।
तो अपने मुल्क के  सच से  बहुत ही दूर रहते हो।

तरक्की क्यूँ  नहीं चल कर  हमारे  पास आती है।
मुझे डर  है यही तुम  सोच कर  मजबूर रहते हो।

यहाँ पर  मजहबी  सैलाब  में जब  लोग  मरते हैं।
कभी  रोका  है जा कर  या वहाँ  से  दूर रहते हो?

बहुत अच्छा हुनर है झूठ को सच की तरह कहना।
मगर जब सच हो कहना तो कहाँ काफूर रहते हो।

गरीबी ज़ख्म है इस मुल्क़ के सीने पे तो क्या तुम।
कभी  बनते  हो  मरहम  या सदा नासूर  रहते हो?

तुम्हारी  देशभक्ति  पर  भरोसा  कौन   कर  लेगा!!
नसल  के नाम  पर  तुम भी  नशे में  चूर  रहते  हो।

राजीव कुमार

रंजूर - दुखी
क़ाफूर- गायब

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।

ग़ज़ल

मुहब्बत ख़ुद नहीं मरती तिज़ारत मार जाती है।
तुम्हारे  शह्र में हमको  शराफत मार जाती है ।

मसाइल में घिरी रहती है सबकी ज़िंदगी लेकिन ।
हुनर, औकात से ज्यादा की चाहत मार जाती है।

गले मिलते हैं होली पर ज़हन में ईद को रख कर।
ये रिश्ते यूँ नहीं मरते सियासत मार जाती है।

किसी भी मुल्क़ की ताकत वहाँ तालीम है यारों।
हो गर बुनियाद कच्ची तो ईमारत मार जाती है ।

हम अपने दुश्मनों के हाथ से मरते नहीं लेकिन ।
हमे फिरका परस्ती की विरासत मार जाती है।

राजीव कुमार

खुशामद कर रहे हैं खा रहे हैं

ग़ज़ल

खुशामद  कर  रहे  हैं  खा रहे हैं
ये  चैनल  बस हमें भरमा रहे हैं

हमारे दम से तो चलते हैं लेकिन
हमीं  पर  रोज  ये  गुर्रा  रहे  हैं।

कभी चूहा नहीं जो मार पाये
वो एंकर वर्दियों में आ रहे हैं

अजी हिन्दू मुसलमां को लड़ा कर
ये ससूरे  देश हित समझा रहे हैं ।

शहादत से नहीं मतलब है इनको।
ये बस टी आर पी चमका रहे हैं

अभी सरकार लाशें गिन रही है।
मगर  ये तीन  सौ  बतला रहे हैं

ये दंगल और हल्ला बोल करके
अजी बस शोर ही बरपा रहे हैं

किसी के झूठ को इक सच बता कर।
हमारे सच को बस झुठला रहे हैं।

जवाबों से हमें महरूम कर के।
सवालों में फक़त  उलझा रहे हैं।

ये जनता अपना रोना रो रही है।
ये चैनल अपना गाना गा रहे हैं।

बहस के नाम पर हर रोज देखो
गधे टीवी पे  रेंकें जा रहे हैं।

राजीव कुमार

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Thursday, April 11, 2019

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो। हिन्दू मुस्लिम के मुद्दों की हार बनो।

ग़ज़ल

हक़ की बात करो तुम भी हक़दार बनो।
हिन्दू  मुस्लिम  के  मुद्दों  की  हार  बनो।

थोङा  नरम  बनो  थोङा   खुद्दार   बनो।
सोच  समझ  कर  यारों दुनियादार बनो।

नफ़रत  खून  ख़राबा  दंगा  आग  जनी।
आप  सियासत का  मत कारोबार बनो।

सहज सहल बनकर तो जीवन है मुश्किल।
जीने  की  ख़ातिर  कुछ तो  दुश्वार  बनो।

झूठ  ही लिखना  पढ़ना है  गर रोज तुम्हें।
क्युं  बनते हो  शायर  तुम  अख़बार बनो।

बन   जाते  हो  ढाल  अमीरों  के  अक्सर।
आप  गरीबों  का भी  तो  हथियार  बनो।

ख़्वाब  देखते  हो  क्युं  अफ़सर  बनने का।
जाओ   जा   के  पहले  चौकीदार  बनो।

राजीव कुमार

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।

*ग़ज़ल*

वो जिसके होने से निस्बत ख़राब होती है।
मेरी  नज़र  में   वो  गैरत  ख़राब  होती है।

ये  मर्ज़े  इश्क  है इसके  मरीज़  की यारों।
दवा  के  नाम  से  हालत  ख़राब  होती है।

हमारी  छोड़िये  हम  तो अवाम हैं साहब।
हमारे  जैसों  की  क़िस्मत ख़राब होती है।

शहर  का  हाल  बदलते हैं नाम से पहले।
नहीं तो  नाम की अज़्मत ख़राब होती है।

कोई बताये जो रहबर है मुल्क़ का उसको।
किसी भी मुल्क़ में नफ़रत ख़राब होती है।।

राजीव कुमार

निस्बत- सम्बंध

दुनिया में दर्द है तो दवा भी है कोई चीज़।

ग़ज़ल

दुनिया  में दर्द  है तो दवा भी है कोई चीज़।
यानी की ज़िन्दगी में नशा भी है कोई चीज़।

क्युं दिल जला रहे हो किसी शख़्स के लिये।
क्या तुम भी सोचते हो वफ़ा भी है कोई चीज़

हम भी किसी के इश्क़ में तबतक रहे तबाह।
जबतक पता नहीं था जफ़ा भी है कोई चीज़

बस्ती की आग शहर तक आ जायेगी ज़रूर
क्युं भूलते हो आप  हवा भी है कोई चीज़।

मिल कर किसी से आज ये महसूस हुआ है
इक हुस्न ही नहीं है अदा भी है कोई चीज़ ।

दौलत की आग में ये बदन हो रहा है ख़ाक।
क्यो भूलते हो तुम की शिफ़ा भी है कोई चीज़।

आंखों से आज तक नहीं देखा गया मगर।
कहते हैं  इस जहां में खुदा भी है कोई चीज़।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...