Monday, June 8, 2015

जाने ख़ुदा को लोग किधर ढूंढ रहे हैं।

, ताजा गजल
दिल में तो है सभी के मगर ढूंढ रहे हैं
जाने ख़ुदा को लोग किधर ढूंढ रहे हैं।
जंगल ये कंकरीट के जब से उगे यहां।
हम तब से परिदों के शजर ढूंढ रहे हैं।
हर रास्ता हो इश्क़ इबादत हो हर गली।
ख़्वाबों में हम भी ऐसा नगर ढूंढ रहे हैं ।
फ़ितरत है उसकी सबको मिटाता है इस लिये ।
हर ग़म को मिटा दे वो ज़हर ढूंढ रहे हैं।
क़िस्मत ख़राब है कि तबीयत में है कमी
हम कबसे दुवाओं मे असर ढूंढ रहे है
भेजा था जिनको मुल्क की सरहद पे उन्हीं के
मां बाप अपने लख़्ते जिगर ढूंढ रहे हैं
संसद में जाईये वहां सब साथ मिलेंगे।
मुजरिम हमारे घर में किधर ढूंढ रहे हैं।
राजीव कुमार
twitter- raj28094

इस शहरे तरक्की की सदाकत कहां गयी

इस शहरे तरक्की की सदाकत कहां गयी
बुनियाद तो वहीं है इमारत कहां गयी
इन सारे फसानों की हकीकत कहां गयी।
सूरत तो ठीक है मियां सीरत कहां गयी।
मौका मिला है आज शरीफो को देखिये ।
मत पूछियेगा इनसे सराफत कहां गयी ।
मुजरिम हुं मैं अगर तो सजा दे कोई मुझे
आखिर जमाने भर की अदालत कहां गयी
इक दौर कृष्ण और सुदामा का था मगर।
अब सोचता हुं ऐसी रिफाकत कहां गयी।
दुश्मन भी पूछने लगे क्या बात है राजीव।
मुझसे तेरी वो रंजो अदावत कहां गयी
राजीव कुमार
@raj28094

जोर जुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है


तू फरिश्ता है या खुदा, क्या है।

तू फरिश्ता है या खुदा, क्या है।
मेरे मालिक तू ही बता क्या है।
मुल्क तक्सीम हो गये लेकिन ।
ये जमीं किसकी है घटा क्या है।
ले के आयेंगा अच्छे दिन कोई।
झूठ इससे बङा बता क्या है ।
है जहर आज कल फिजाओं में।
आज मजहब की ये हवा क्या है।
शक्लो सूरत तेरी गजल वाली।
तेरे आगे ये आइना क्या है।
हर सहर शाम तेरी ही बातें ।
मेरा मुझमें तेरे सिवा क्या है।
इश्क मुझसा अगर करोगे तो।
ये समझ जाओगे सजा क्या है।
राजीव

इतनी दौलत किसान रखता है।

ग़ज़ल 
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
कुछ नहीं बस ईमान रखता है।
इतनी दौलत किसान रखता है।

देश की आन बान रखता है
साथ गीता कुरान रखता है

आग पानी हवा सियासत उफ्फ।
कितनी आफत में जान रखता है।

रूह घायल कहीं न दिख जाये।
सो बदन पर निशान रखता है।

छत नहीं है तो गम नहीं उसको।
सर पे वो आसमान रखता है।

हक की बातें करे तो कहते हो
कितनी लम्बी जबान रखता है।

वक्त से पहले हो गया बूङा।
और  बेटी जवान रखता है।

घर आयेंगी एक दिन ख़ुशियाँ
बस यही इत्मीनान रखता है।

जेब खाली तो है मगर राजीव
दिल में दोनो जहान रखता है।

राजीव कुमार

किसे यकीन है क्या क्या बदल रहा होगा


आईने के सामने जब आईना रक्खा गया ।

ग़ज़ल

आईने  के  सामने  जब  आईना  रक्खा  गया।
तब किसी का नाम शायद बेवफ़ा रक्खा गया।

इम्तिहां  हर  सिम्त  मेरा  हमनवा रक्खा गया।
और   मुझसे   दूर  मेरा   रहनुमा  रक्खा  गया।

जब  जरूरत  ज़िन्दगी  की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।

इक  परिंदा  पूछ  बैठा  क्या हुई  मुझसे खता।
क़ैद में  मुझको ख़ुदाया क्यूं  भला रक्खा गया।

क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के  लिये मैं गमज़दा  रक्खा गया।

इस  समंदर  की हकीकत  साहिलों से  पूछिये।
जिनके  हिस्से तिश्नगी  का फैसला  क्खा
गया।

रात   भर  तन्हाईयों में  मैं ग़ज़ल  कहने  लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।

राजीव कुमार

तेरी खातिर मैं अब तुझको सतना भूल जाता हूँ


मुझसे पहचान अपनी छुपाता गया।

ताजा गजल
मुझसे पहचान अपनी छुपाता गया।
और इल्जामे उल्फत लगाता गया ।
आशिकी को मेरी आजमाता गया ।
मुझको संगदिल जमाना सताता गया ।
खूबसूरत खता कर न दूं एक दिन।
गर वो ख्वाबों ऐसे ही आता गया।
शब में इक रोज मिलने गया यार से।
रास्ता मुझको जुगनू दिखाता गया ।
उस भरी बज्म में जिसमें रुस्वा हुआ।
हर कोई मुझको झूठा बताता गया ।
हर सितम सह के भी दिल मिरा दोस्तों।
मुस्कूराता रहा मुस्कुराता गया ।
राजीव कुमार

सवालों का जो खुद उत्तर बना है

सवालों का जो खुद उत्तर बना है
वही शायर सही शायर बना है।
फकत दो चार चमचों के सहारे
गजल का आज वो हैदर बना है।
अना की कैद को जो तोङ आया
वही इन्सान पैगम्बर बना है।
जला है इम्तिहां की आग में जो।
बलंदी का वही अख्तर बना है
कहां तक आईना सच बोल पाता
किसी का अक्स ही पत्थर बना है
जहां हैं दफ्न आशिक आगरा में ।
मुहब्बत का वहीं मंदिर बना है
राजीव कुमार
अख्तर- सितारा
हैदर -शेर

झूठ नफरत बेईमानी सोलह आने हो गये।

झूठ नफरत बेईमानी सोलह आने हो गये।
और ये ईमान के सिक्के पुराने हो गये।
खुद के हिस्से की खुशी को छोङ कर पाला जिन्हें।
आज वो बच्चे ही अपनो से बेगाने हो गये।
हादशों का सिलसिला भी खत्म कर दे ए खुदा
अब मकां मजहब के सारे कत्ल खाने हो गये।
बस जरा सी देर वो आये चमन में घूमने ।
क्या कली क्या फूल तितली सब दिवाने हो गये
मुफलिसी का दौर जारी था, रहेगा, देखिये।
हुक्मरां इस मुल्क के फिर कुछ घराने हो गये।
है हकीकत क्या तरक्की की यकीं किस पर करें।
मण्डीयों से मीडीया के दोस्ताने हो गये ।
राजिव कुमार

शीसा दिल मेरा पत्थर है ।

---------- गजल पेश है
शीसा दिल मेरा पत्थर है ।
पहले से ज्यादा बेहतर है।
जीवन के रस्तों में शायद
अपनी किस्मत में ठोकर है
इश्क वफा ईमान जहां में
तेरे बिन सब कुछ बद्तर है
गुलसन तो महका है लेकिन
फूलों को कांटों का डर है
मस्त हवाओं में जाने जां
तेरी खुश्बू का नस्तर है
धरती पर रहने वालों की।
आंखों में रहता अम्बर है।
दूनियां के हर विष को पी लूं।
मेरे भीतर भी शंकर है।
राजीव कुमार

जिन्दजी ऐसी नहीं है कि जैसे पिक्चर में

अपने पसंदीदा शायर समीर परीमल साहब के साथ मिल कर कही गजल

जिन्दजी ऐसी नहीं है कि जैसे पिक्चर में
आधी जूते में गुजरती हे आधी बिस्तर में
राजीव
कितने गफलत में गुम है आज का इन्सां यारों।
पहले खोया था सवालों में अब है उत्तर में
राजीव
शेर कहते रहे यूँ ही तो है यकीं मुझको
आपके लफ्ज़ जान फूंक देंगे पत्थर में
समीर
जेब खाली हे मगर इतनी हे सोहरत हासिल।
सारी दुनियां की मुहब्बत हे मेरे छप्पर में
राजीव
उम्र गुज़री तमाम ढूँढने में 'परिमल' को
ख्वाब में रात इक काटी थी जो तेरे घर में
समीर
समीर परीमल और राजीव कुमार

मुश्किल के वक्त जब मैं तेरे काम न आया।

गजल
मुश्किल के वक्त जब मैं तेरे काम न आया।
मुझको भी यार उन दिनों आराम न आया।
तुने वफा की परवरिश की थी कुछ इस तरह
मुझ पर जफा का एक भी इल्जाम न आया।
सरहद के आर पार जो उङते हैं परिंदे।
उनको कभी भी खौफ ए तह ए दाम न आया।
इक सुब्ह आफताब उम्मीदों का उगा था।
ता उम्र चला साथ लब ए बाम न आया
दिल से ख्याले यार का मिट जाये हर खयाल।
ऐसा भी कोई गर्दिश ए अय्याम न आया।
न अश्क न वफा न दुआ दर्द आशिकी
अपना जिसे माना था वही काम न आया।
मेरा यकीन था कि तू आयेगा एक दिन।
मौत आ गयी मगर तेरा पैगाम न आया।
यूं तो हर इक सितम का तआल्लुक तुझी से था।
लेकिन मेरे लबों पे तेरा नाम न आया।
राजीव कुमार
खौफे तहे दाम - जाल में पकङे जाने का डर
लब ए बाम-- सूरज का ढलते समय एक किनारे आ जाना
गर्दिशे अय्याम - बुरा दौर

परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।

पूरी गजल आप की मोहब्बतों के हवाले
परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।
न आया लौट कर वो आसमां से।
जगह खंजर की बंदूखों ने ले ली।
कहां तक आ गया इन्सां कहां से।
हसीं मौसम गम ए तन्हाईयों को।
बयां करने लगा है अब जुबां से।
किसी भी हादसे का डर नहीं है।
दुवायें ले के मैं आया हुं मां से।
यकीं तुम पे तो है पर दिल तुम्हारा।
पलट जाता है आपने हर बयां से।
मुहब्बत करने वाला जानता है
मिला क्या है उसे इस रायगां से।
वफा ईमान गैरत क्या संभालुं।
बहुत कांटे मिले हैं इस जहां से।
राजीव कुमार
(रायगां --- तबाही)

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...