Sunday, August 25, 2013

मेरी भी इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.

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मेरी भी  इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.
तेरे कदमो में दिन हो जुल्फ में ये रात रहे,

उम्र भर हो तेरी शिकायते मुझसे ए "सनम "
हो तल्ख़ बात भले मुझसे तेरी शाम ओ शहर/

कभी तेरे तो कभी मेरे दिल की बातों में,
हम रहे न रहे जिन्दा रहे जज्बातों में /

दिल अगर टूटता है तो ये टूट जाया करे ,
पर ये खावाहिस न कभी दूर हमसे जाया करे/

वक़्त हो आखिरी और मौत हो सर पर मेरे,
है गुजारिश तेरे हाथों में मेरा हाथ रहे /

मेरी भी  इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.
तेरे कदमो में दिन हो जुल्फ में ये रात रहे,

Saturday, August 24, 2013

मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो



ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो/

सितारे गर्दिशो में हो, मुकद्दर हाशिये पर हो ,
रहे इम़ा तेरा सच्चा, की जब जब सर उठाई हो /

हो जब ये हौसला तेरा, मुसलसल कारवां तेरा,
हो शोले आंख में तेरे, मशालें जब जलाई हो /

क़यामत से तू ले लोहा, खुदा भी देखता होगा,
अजानो में मगर तेरे उसी की ही खुदाई हो/ 

नहीं मुमकिन तेरा दिलवर  हमेशा साथ हो तेरे ,
असल जज्बा मुहब्बत का मुहब्बत में जुदाई हो/

ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो/
  

Monday, August 19, 2013

आओ देखे जिंदगी शहरों में तकितनी तल्ख़ है/ (राजधानी दिल्ली में रेलवे स्टेशन की घटना)


जुल्म की हद तक पहुंचती ये कहानी, देखिये 
 शहर के रस्तों पे बिखरी जिन्दगानी देखिये /

एक  बुढा था वहां सोये हुए फुटपाथ पर,
दे रहे थे लोग सिक्के चन्द उसके हाथ पर/ 

वस्त्र जिसके थे फटे चोटें लगी थी पाव में,
बेशहारा सा पड़ा था पुल के नीचे छाव में/

था गला सुखा हुआ होठों पे जिसके प्यास थी।
उस अभागे दीन की बेबस बहुत आवाज थी।

फिर वहीं कुछ दूरी पर झोला संभाले साथ में,
आ रही थी पानी ले कर एक लड़की हाथ में/

बैठ कर जैसे ही वो पानी पिलाने लग गयी,
देख कर ये दृश्य आँखें डब-डबाने लग गयी/

पैर पर छाले, जली चमड़ी थी जिसकी धुप में,
आ गयी शायद गरीबी अपने असली रूप में /

कुछ फटे और कुछ अधूरे वस्त्र में थी वो खड़ी ,
लगा रहा था जैसे बच्ची हो गयी है अब बड़ी  /  

अब तलक सब बेखबर जाने लगे उस ओर से,
भीख भीखू को दिया बेटी को देखे गौर से/

इस हवस के धुप में रूहे थी सबकी जल गयी,
देखते ही देखते ये शाम भी अब ढल गयी /

शाम को सब लोग घर को थे लगे अब लौटने ,
उनका तो फुटपाथ है घर वे लगे अब लेटने /

देके सिक्कों को कहा बेटी तू जा बाज़ार को ,
रोक लेंगे आज हम इस  भूख अत्याचार को /

बच गए सिक्के तो मरहम भी तू लाना घाव के,
लोग अब बचने लगें है गंध से इस पांव के /

ऐसा ही चलता रहा तो भीख कैसे पाएँगे ,
इतने महंगे वक़्त में हम कैसे दोनों खायेंगे /

बस करो मुझको बताना अब न मैं सुन पाऊँगी,
जो मिलेगा इतने में ले कर मैं वापस आउंगी /

ऐसा वादा करके वो बाज़ार में थी आ गयी,   
सभ्यता के भीड़ में बच्ची वो अब घबरा गयी /

हर तरफ इस भीड़ का फैला  हुए सैलाब था ,
हर कोई आगे निकलने के लिए बेताब था /

जैसे ही  उसकी नजर इक ओर ढाबे पर गयी,
बेखबर सी होके उसकी ओर जाने  लग  गयी/

दो कदम  आगे  गयी तो  कार  से टकरा गयी,   
हाथ से सिक्के गए ओर चॊट भी वो खा गयी/

बेतहाशा हो के वो सिक्के लगी थी खोजने ,
कार से साहब निकल क़र लग गए थे कोसने/
                
गन्दगी नाली के हो, कीड़ो के जैसे रेंगते!
जी में आता है  तुम्हे कूड़े में जा के फेंक दे!!

चॊट के अवसाद से पीड़ा से पीड़ित हो गयी,
गालियाँ सुनकर के ऐसी, जोर से वो रो गयी/

ख़त्म कर ये माज़रा साहब भी थे जाने लगे,
बेसहरा  देख  लड़की  भेड़िये  आने  लगे/

तब समझ आया की ये बाज़ार भी अब खुल गया,
अब तो हर नैतिक अनैतिक एक ही में घुल गया/

उसकी मजबूरी पे जैसे बोलियाँ लगने लगी,
आंख से घडियालों की फिर नालियां बहने लगी/

एक सज्जन ने कहा तू काम न ले क्रोध से,
हल नहीं होगी तेरी दिक्कत तेरे प्रतिरोध से/

ले पकड पैसे तू चल मुश्किल तेरी हम बाँट लें,
करना है इतना तुझे बस बात मेरी मान ले/

तब समझ आया मुझे कितना दरिंदा दौर है,
रोटी की कीमत यहाँ सिक्का नहीं कुछ और है/ 

क्या हुआ बूढ़े का जो लेटा है अब तक आस में,
लौट कर आई  नहीं बेटी क्या उसके पास मे

अब भी कितने लोग मुझसे पूछते हैं ये सवाल।
क्या रहा बुड़े का राजीव कैसा है लड़की का हाल

में तो तब भी मौन था और आज भी में मौन हूँ ,
पूछता हूँ देश से कह दो न की मैं कौन हूँ/

सैकड़ों भीखू  को  कैसे ये शहर है खा रहा
है ये मुर्दों का शहर महलों पे  क्यूँ इतरा रहा/

क्या गुलामी के लिए बच्चे नहीं अब बाध्य है,
क्या गरीबी के ये सारे रोग अब तक साध्य  हैं/

क्या ये ही जनतंत्र है या हमारी चेतना,
क्यूँ नहीं महसूस करते हम किसी की वेदना/ 

कौन सा जन गन का मन है ये किस तरह का राष्ट्र है,
शहरों की सडको पे नंगे धर्म हैं या शास्त्र हैं/ 

भूख से लड़ते हुए लोगो का जीवन गर्त है ,
रोटी के बदले बदन जीने की पहली शर्त है/ 

Rajeev Kumar

ये गाँधी वाद ऐसा है , ये गाँधी वाद वैसा है /

जिनका नहीं अपना वाद कोई ,
जो नाही हैं अपवाद कोई ,

ये हमको बताते रहते हैं ,
हस हस कर हम से कहते हैं/

ये गाँधी वाद ऐसा है ,
ये गाँधी वाद वैसा है /

विधुत विश्लेषण करते हैं,
मुद्रा संसलेषण करते हैं /

मेरे देश के बाबा ऐसे हैं,
नित्य नए अन्वेशण करते हैं,


सिक्षा का उनके क्या कहना,
अनपढ़ तुम मेरे चेले रहना/


पथ परदर्शक हैं ये अगुआ हैं
बस ट्रेड मार्क ये भगवा है


भक्ति का भाव निराला है
इस दाल में कुछ तो कला है,


चलो इनका भी कुछ करते हैं
छाती पर उनके चड़ते हैं/


जो हमको बताते रहते हैं,
खुद भ्रष्ट हैं जो ये कहते है/


ये गाँधी वाद ऐसा है ,
ये गाँधी वाद वैसा है/

Sunday, August 4, 2013

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है ,

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है ,


किसी के तंज को दिल से यूँ लगाता क्यूँ है /

 है कोई शिकवा कोई रंज तो ये रश्म न कर,

किसी भी हाल में देने का साथ, कश्म न कर /

 डर है इतना ही तो इश्क में आता क्यूँ है ,

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है /

दूर हो जाओ हम से जब तो, ऐसा तुम करना,


दूर हो जाओ हम से जब तो, ऐसा तुम करना,
श्मृतियों के आंगन में, भावों से क्रीडा करना / 

 नहीं सरल तो, नहीं विरल भी जीवन के सतरंगी पथ, 
यही सत्य है यही गत्य है जीवन का बजरंगी तथ्य/ 

 जीवन युद्ध में निपुण बना कर, दूर कहाँ अब जाओगे ,
 द्रिड निश्चय है पितृ पक्ष में मुझसे मिलने आओगे 

 मृत्यु भी है अश्व मेघ कह देना अब देवो से , 
विश्व विजयी तो बन ही गए हो स्वर्ग विजय भी कर लेना/ 

 स्वर्ग विजय कर विजय पताका जैसे ही फहराओगे,
मुझे याकि है पुनर्जन्म में मेरा साथ निभाओगे.

अब निर्माणों की और चलो /


छोड़ त्रासदी के घावों को उम्मीदों के ओर चलो ,
 संत्रासों के कुंठा के भावों को पीछे छोड़ चलो ,

 नहीं अनंत ये जीवन तो, लोभ क्यूँ रहे जीने का
 संतापों के सागर को तज उल्लासों की ओर चलो ,

 कौन रहा अब कोई तपस्वी, कहाँ गयी वो दैविक शक्ति,
व्यर्थ कर रहा समय राजीव कहाँ कृष्ण और कैसी भक्ति ,

 स्वतः सम्ब्भाला है मानव ने अपने मानव जीवन को,
 छोड़ विनाश के प्रतिफल को अब निर्माणों की और चलो /

कभी नहीं माँगा हमने जीवन के संत्रासो को /

कभी नहीं माँगा हमने जीवन के संत्रासो को / 
भुत भविष्य के मध्य रक्खा है अपनी मिटती स्वाशों को/ 

 जब भी चाहा, करुना के करुनाकर से रार किया /
 वक़्त बेवक़्त के मध्य रखा है दुर्बल इन प्रयाशों को/

 मेरी जड़ता का हे भंते न ऐसे उपहास करो / 
बुद्धिजीवी हो भाग्य उदित हैं बुद्धि का व्यापर करो / 

 कण कण मैं है रूप प्रभु का कैसे प्रभु को पाते हो / 
रोटी के टुकरों से हे प्रभु गायब क्यूँ हो जाते हो/ 

 भूख देवता के समक्ष स्वयं को नतमस्तक सा पाता हूँ / 
भीख भूख के मध्य रक्खा है गिरते पड़ते लाशो को /

क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/


भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों  से/ 

गाथाये निकली हैं जिनकी, मरुभूमि से बंजर से , 
राज्य सर्वथा किया स्थापित, अपने खुनी खंजर से / 

दसकों  तक कवियों ने भी हमको संशय में डाला था , 
कहते हैं चेतक से पड़ गया हवा का पाला था / 

ये राज व्यवस्था कैसी थी, पूछो ना क्रुद्ध अछूतों से. 
सूरा, सुंदरी, चकला के संरक्षक, वीर सपूतों से/ 

युद्धधर्म से, राज्यधर्म से या वेदों के अभिमानों से, 
कितनी सतियों को जीवित, लाये हो तुम शमशानों से / 

“गाथाओं की शिक्षा में कुछ और नहीं बस गर्जन है, 
साम्यवाद की हत्या कर ये अर्थ वाद का सृजन है /” 

भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/

गौ माता के नाम पर

हिदुस्तान में  सच्चे हिन्दू रह गए हैं चन्द, 
गौ माता के नाम पर रोज करiते बंद / 

 गोबर को अमृत कहते, चरणामृत गो मूत्र
 हे माँ तुमने क्या किया बिया गयी हो पुत्र / 

 लाख प्रार्थना किया न बछिया हमने पाई, 
भाग्य कर गया खेल ले गया उसे कसाई 

 सत्य सनातन भारत भगवा देखा ऐसा. 
 कमा रहे हैं हिन्दू बछड़ा बेच के पैसा /

मेरी गजलों की भी अपनी, इक कहानी है

ए खुदा तेरी मेहरबानी है 
मेरे भीतर जो सचबयानी है 
शाइरी रोज इक तमाशा है 
शाइरी रोज इक कहानी है

दर्द ने दिल ने हिज्र औ गम ने 
कल बिठा करके कह रहे थे कि
बार बार हम को न सताया करो 
रोज दुखती है इन रगों को तुम 
वक्त बे वक्त न दबाया करो, 
दर्द हमको भी बहुत होते हैं
तेरी गज़लों में हम ही रोते है

कल तो अहसास ने भी खूब यूँ गजब ढाया,
बेवजह उसने मेरे गम को बहुत धमकाया/ 
हर घडी सुध जो खो के रहता है , 
रात अहसास मुझ से कहता है , 

फूल पत्तों की परिन्दों की जबां सुनता हूं 
रोज गमगीन पहाङों की जबां सुनता हूं 
क्या कहूं मुझसे नदी बोल रही है क्या क्या 
एक लम्हे से सदी बोल रही है क्या क्या 
मुझको बारिस की घटाओं ने पकङ रक्खा है
मुझको सबनम की सदाओं ने पकङ रक्खा है।
तीरगी मेरी तबीयत को समझ लेती है 
रौशनी मेरी जरूरत को समझ लेती है 
शह्र की भीङ से अब दूर मुझे ले जाओ
मुझसे वीरानीयां कहती हैं की अब आ जाओ 

चलो बस भी करो अब दिल से आओ बात करें. 
दिल की हर एक जरूरत से मुलाक़ात करें 
फिर मेरे दिल ने मेरा हाथ पाकङ करके कहा, 
मुझको तुम माफ करो मैं भी तुम्हारा न रहा।


दिल की दुनिया को हिफाजत से रखा जाता है 
दिल की दुनिया में शराफत से रहा जाता है।
दिल की दुनिया में अजीयत का सबब दिल ही है 
दिल की दुनिया में मलामत का सबब दिल ही है 
दिल की दुनिया में महब्बत की जगह होती है 
दिल की दुनिया में इबादत की जगह होती है
दिल कि दुनिया में हर इक गम का बसेरा है पर 
दिल की दुनिया मे मसर्रत की जगह कोई नही 

एक ही दर्द से तकलीफ से मैं डरता हूं 
प्यार जिससे है उसी शख्स को अखरता हूं
रोज मैं ही हूँ वो जो टूटता बिखरता हूँ, 
तेरे सीने में हूँ पर उसे पे रोज मरता हूँ

दिल की बातों को सुन के इश्क़ ने कहा "अच्छा" 
तू तो झूठा है बड़ा आया तू नहीं  सच्चा 
तेरी बातों में आ के इश्क़ मेरा नाम हुआ , 
हर गली चौक चोराहे पे मैं बदनाम हुआ 

इश्क से बढ़ के बर्गूजीना क्या 
इश्क दिल में नहीं तो जीना क्या 
इश्क दीवार भी है दर भी है। 
इश्क दुनिया है एक घर भी है 
इश्क में हर तरफ ही बंधन है 
इश्क का हर कोई ही दुश्मन है 
इश्क़ का दोस्त एक पंखा है
इश्क़ आखिर में उस पे लटका है
ये है अंजाम फिर भी जिंदा हूं 
खत्म जो ना हो ऐसा किस्सा हू
मै तबाही भी हूं दुआ भी हू 
आग हूं और मैं हवा भी हूं 
मुझसे ज्यादा अमीर कोई नही 
मेरे जैसा फकीर कोई नहीं 

अब तो हर रोज का ये किस्सा है , 
मेरी गजलों में इनका  हिस्सा है 
बात ये है तो कर रहा हूं मैं
हर घडी इनसे लड़ रहा हूं मैं 
मुझको पागल बनाये रहते हैं 
मुझको ख्वाबों में रोज दिखते हैं 
ये हकीकत भी ख्वाब जैसा है 
अब तो कांटा गुलाब जैसा है

सच है इनसे ही जिंदगानी है 
आप हैं मैं हूं और जवानी है
ये मेरे जहन की रवानी है।
मेरी गजलों की ये कहानी है।

राजीव कुमार 

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...