Saturday, January 17, 2015

इस समंदर की तिस्नगी देखो।

बस यूं ही ___________
इस समंदर की तिस्नगी देखो।
दिल में कोई तो है कमी देखो।

जिससे मिलती है वो खुशी देखो।
अपने अन्दर की रौशनी देखो।

बात मजहब की कर रहे हो तो।
आग मजहब की फिर लगी देखो ।

दर्द की हद भी और क्या होगी।
लाश बच्चों की गिर गयी देखो।

जिनके रौशन चराग बुझ जाये।
घर में उनके भी तीरगी देखो।

खुशनुमा इक ख्याल है कोई।
कोई आंखों में है नमी देखो।

जब भी उल्फत में तुम कदम रक्खो।
इस जमाने की बेदिली देखो ।

चांद की चाह है सभी को पर ।
चांदनी कोख में मरी देखो।

राजीव कुमार

साथ जब तक रहेगी मेरी जिन्दगी।

साथ जब तक रहेगी मेरी जिन्दगी।
तू रहेगी मेरी हर घङी जिन्दगी।

तू नहीं थी तो कुछ भी नहीं था यहां।
थी हर इक शै में कोई कमी जिन्दगी

मेरी किस्मत भी तू मेरी चाहत भी तू।
मेरे ख्वाबों की तू है परी जिन्दगी ।

तेरा रिश्ता है मुझसे पूराना सनम ।
दिल है सागर मेरा तू नदी जिन्दगी

उङती हैं तितलियां जो लबों पर तेरे।
तेरी मुस्कान खिलती कली जिन्दगी ।

मुझपे इतनी इनायत तो कर दे खुदा ।
यार दे दे या दे फिर नयी जिन्दगी ।

मैं तङपता रहूं तू तङपती रहे ।
किस लिये इतनी ये बेबसी जिन्दगी ।

दिल में तन्हाईयों के अंधेरे न कर ।
है मुहब्बत की तू रौशनी जिन्दगी।

मेरा कुछ भी नहीं ये गजल है तेरी
तू ही गम हे तूही हे खुशी जिन्दगी।

राजीव कुमार

जब मिलो तो जरा मूस्कूरा कर मिलो ।

जब मिलो तो जरा मूस्कूरा कर मिलो ।
आओ बैठो जरा पास आ कर मिलो।

दिल में इक दर्द है दूरीयों का मगर ।
दिल दिया है तो दिल को मिला कर मिलो।

हो गयी है ये दिलकश फिजा सबनमी।
इन गुलों से भी तो खिलखिला कर मिलो ।

खार हमने जमाने के देखे हैं सब ।
खार से यार बाहें उठा कर मिलो ।

दिल का अब तक खुला है दरीचा मेरा ।
आ भी जाओ सनम आज आ कर मिलो।

राजीव कुमार

चाहता मैं नहीं लोग जहमत करें।

गजल

चाहता ही  नहीं लोग जहमत करें।
लोग मुझसे न यूं ही मुहब्बत करें।

जिनको सच बात सुनने की आदत नहीं।
इल्तजा है कि वो मुझसे नफरत करें।

आज सहरा भी दरिया से कहने लगा।
आ भी जा कब तलक तेरी मिन्नत करें।

दीन , ईमान , गैरत, वफा, जिन्दगी ।
तेरी खातिर बता किसको रुक्सत करें।

टूटा फूटा सही पर तेरा घर है ये।
तू जो आये तो दिल की मरम्मत करें

राजीव कुमार

दिलों की बङ रहीं ये दूरियां अच्छी नहीं लगती।

ग़ज़ल

दिलों के बीच बढ़ती दूरियां अच्छी नहीं लगती।
नये इस दौर की ये ख़ामियाँ अच्छी नहीं लगती।

हमें मालूम है ज़ीने की ख़ातिर है ज़रूरी पर।
हमें फेकी हुई ये रोटियां अच्छी नहीं लगती।

हमेशा डूब ही जाती हैं उल्फ़त के समंदर में।
महब्बत की शिकस्तां कश्तियां अच्छी नहीं लगती

संदेशे में मेरी माँ ने यही लिक्खा था कि बेटा।
तुम्हारी राह तकती खिड़कियां अच्छी नहीं लगती।

मैं अक़्सर सोचता हूँ  देख कर रोती हुई बच्ची ।
न जाने क्युं किसी को तितलियां अच्छी नहीं लगती।

इसी बस्ती के कारीगर बनाते हैं महल लेकिन।
महल वालों को झुग्गी बस्तियां अच्छी नहीं लगती।

जहां इन्सान जलता है अना की आग से खुद के।
वहां माचिस की जलती तीलियां अच्छी नहीं लगती।

नहीं मिलती है जिनको गर्मियां वादों की गर्मी से।
उन्हें अच्छे दिनों की सर्दियां अच्छी नहीं लगती।

राजीव कुमार

बहुत लोगों से यारी हो गयी है।

पेश हे आभार स्वरूप एक ताजा गजल बिल्कुल अभी कही आप सभी मित्रों के नाम
दोस्तों आज मेरे जन्म दिवस पर आप सबके बधाई स्वरूप प्रेम मिला इस के लिये आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया

बहुत लोगों से यारी हो गयी है।
के दुनिया अब हमारी हो गयी है।

दुआ इतनी मिली कि सोचता हुं ।
मेरे दिल पर उधारी हो गयी है।

कहां इसकी दवा मिलती है यारों।
मुहब्बत की बिमारी हो गयी है।

सियासी बात वो अच्छे दिनो की ।
बङी ही बे मिय्यारी हो गयी है।

तेरी वो दुश्मनी जो थी मुझी से।
मेरे आगे बेचारी हो गयी है।

वो बचपन जिन्दगी का था सुनहरा
मगर अब जंग जारी हो गयी है।

गजल में जिक्र यारी का किया है।
गजल यारों तुम्हारी हो गयी है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...