ग़ज़ल
हुस्न रंगत जुल्फ शोखी नाज ओ नखरा देखकर।
छू के देखूं दिल में रख लूं तुझको चाहा देखकर।
रौशनी अब रात भर छत पर ही रहती हे मिरे।
चांद रुक जाता है हर शब तेरा चेहरा देखकर।
सबनमी होती है उस दिन की सुबह ए जानेजा
जागता हुं नीद से जब ख्वाब तेरा देखकर
खूब रोती हैं लिपट कर हमसे अब तनहाईयां।
थक गयीं हैं ये बेचारी तेरा रस्ता देखकर।
राजीव कुमार
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