ग़ज़ल
तन्हाई ने मेरे अन्दर इतनी जगह बना ली है।
दिल बैठा है आंख भरी है लेकिन कमरा खाली है।
बादल की काली चादर को ओढ़ के सूरज बैठ गया।
इस मंजर को गौर से देखो बारिश होने वाली है।
दौलत शोहरत इश्क इबादत बेतर्तीबी खुदगर्जी।
एक बुरी लत की दुनियां में सबने आदत डाली है।
सोच रहा हूं बैठ के अपने कमरे के इक कोने में।
सिगरेट के इस शौक में अपने घर में आग लगा ली है।
इक-इक मुजरिम कौन पकङता इस मुश्किल में हाकिम ने।
पूरे शह्र को जेल बनाने की तरकीब निकाली है।
होटल कैफे माल सिनेमा चौराहे और घंटाघर।
वीरानो ने इनके भीतर बस्ती एक बसा ली है।
दोष किसी का नहीं है लेकिन सबकी लापरवाही से।
गांव की रौनक चली गयी है शह्र में सबकुछ खाली है।
राजीव कुमार