Thursday, September 27, 2018

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।

ग़ज़ल

किसी के कहने में सुनने में यार थोङी हूं।
मेरे खिलाफ कोई भी नहीं है मैं ही हूं।

वही हवस है वही वहशतें वही लालच।
मैं आदमी हूं मगर आदमी भी वहसी हूं।

मिरी उङान से गुमराह तुम नहीं होना।
मै आसमान में उङते हुए भी मिट्टी हूं।

मेरे ख़याल मेरी वुसअतों से हैं बाहर
कोई न समझे मैं अपने बदन का कैदी हूँ

ये लोग जश्न मनाते हैं रोज क्युं आखिर।
मरा नहीं हूं अभी तक मैं सिर्फ जख्मी हूं।

खुशी मिलेगी नहीं तुमको जीत कर मुझसे।
मै जीतने का नहीं हारने का आदी हूं।

हमारा दिल ही नहीं जान-वान सब ले लो।
मगर कभी तो कहो जान मैं तुम्हारी हूं।

राजीव कुमार

वुसअतों - फैलाव

Sunday, September 23, 2018

रंग नज़ाकत हुस्न की चाहत का उन्वान महब्बत है

ग़ज़ल

रंग नज़ाकत हुस्न की चाहत का उन्वान महब्बत है
इसका मतलब सबके भीतर का शैतान महब्बत है

वहसत तङपन राहत हिम्मत कभी कभी तो पागलपन।
अच्छा अच्छा समझ गया मैं ये सामान महब्बत है

अश्क खमोशी शोर तबाही एक मुसलसल बर्बादी।
यारों सबकी जान को आफत ये तूफान महब्बत है

दिल की चोरी जान पे कब्ज़ा नींद उङा लेने वाला
लोग समझते मुझको पर ये शैतान महब्बत है

उम्र की बंदिश शर्म की सरहद इसको कुछ मालूम नहीं
रंज हिकारत और मलामत से अन्जान महब्बत है।

मयखाने में शाम को साकी और हमारा टूटा दिल।
हम जैसों की ख़ातिर शायद जीवनदान महब्बत है

छोङ दिये है इस दुनिया में जिसने मज़हब जात अना।
सच कहता हूं यार कसम से वो ईन्सान महब्बत है

मीर कबीर या ग़ालिब दिनकर इनको पढ़कर देख तो लो।
तुम्हीं कहोगे लिखने वालों का भगवान महब्बत है

राजीव कुमार

Monday, September 17, 2018

भूखें हैं लोग इनके निवाले कहां गये।

ग़ज़ल

भूखें हैं लोग इनके निवाले कहां गये।
ऐसे सवाल पूछने वाले कहां गये।

सब ठीक हो गया तो बदन कह के रो पङा।
सीने के ज़ख्म पांव के छाले कहां गये ।

अब तक जो तीरगी के मुक़ाबिल रहे यहाँ
जाने वो रोशनी के रिसाले कहाँ गये

सच लिखने बोलने की रवायत को छोङ कर।
अपने कलम के सच्चे जियाले कहाँ गये।

हावी हैं नफरतों का अंधेरा दिलों पे क्युं।
दिल से महब्बतों के उजाले कहां गये।

राजीव कुमार

जियाले- brave
रासाले -squad of soldiers

Monday, September 10, 2018

किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।

ग़ज़ल

किस्से को मैं किताब की दुनिया में ले चलूं।
अश्कों को इन्कलाब की दुनिया में ले चलूं।

खुद को तुम्हारे ख्वाब की दुनिया मे ले चलूं
जुगनू को आफताब की दुनिया में ले चलूं

तुझको तेरे सवाल पर कितना यकीन है।
आ चल तुझे जवाब की दुनिया में ले चलूं  ।

उनके दयारे लब से चुरा कर कुछ एक बूंद
शबनम को अब गुलाब की दुनिया में ले चलूं

बतलाउंगा तुम्हे भी बुरा क्या है क्या भला।
खुद को तो इन्तेखाब की दुनिया में ले चलूं

चेहरा तुम्हारा देख के आता है ये ख्याल
तुमको भी माहताब की दुनिया मे ले चलूं।

सिद्दत की तिश्नगी को दिखाउगां साथ आ।
दरया तुझे सराब की दुनिया मे ले चलूँ।

किस्सा ए जिन्दगी है सिफ़र से सिफ़र तलक
सांसों को किस हिसाब की दुनिया में ले चलूं

राजीव कुमार

Tuesday, September 4, 2018

रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।

ग़ज़ल

रूह बन कर जिस्म में जो मोजिजा मौजूद है।
अस्ल में हर शक्स के भीतर खुदा मौजूद है ।

इक महब्बत की कहानी इक मुसलसल आशिकी
मिट गये है लोग लेकिन आगरा मौजूद है।

चाहतों को दफ्न करके क्या मिला कुछ भी नहीं।
आज भी दिल में किसी का मकबरा मौजूद है।

इक सिवा खुद के सभी को देखता है दोस्तों
हर किसी की आंख में वो आईना मौजूद है

लोग कहते हैं हमारे दर्द को सुनने के बाद।
मसखरे की शक्ल में इक गमजदा मौजूद है।

जानवर इन्सां परिन्दे फूल पत्ते तितलियां।
हर किसी में शाइरी का सिलसिला मौजूद है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...